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Friday, August 11, 2017

काफी हो ..........

जितने मिले हो
मेरे लिए , तुम उतने ही काफी हो
ख्वाहिशें जो गुस्ताखियां करे तो
तहेदिल से मुझे , शर्तिया माफी हो

बामुश्किल से मैंने
तूफां का दिल , बेइजाज़त से हिलाया है
कागज की किश्ती ही सही मगर
बड़ी हिम्मत से , उसी में चलाया है

जरूरी नहीं कि , जो मैंने कहा
तेरे दिल में भी वही बात हो
पर मेरी तकरीर की लज्जत में
मेरे वजूद के जज़्ब जज़्बात हो

तेरे चंद लम्हों की सौगात में मैंने
इत्तफ़ाक़न इल्लती सौदाई को जाना है
गर इरादतन खुदकुशी कर भी लूं तो
ये मेरे शौक का ही शुकराना है

सोचती हूँ , कहीं तो तेरे दिल से मिल जाए
ये सहराये - जिंदगी के गुमशुदा से रास्ते
तो पूरी कायनात के दामन को निचोड़ दूँ
बस तेरी बदमस्त बंदगी के वास्ते .

10 comments:

  1. इस प्यार को क्या नाम दें, बस इसे होते जाने दें।

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  2. रचना बहुत ही अच्छी है ,सुन्दर !

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  3. बरसों से सोंचे शब्द भी उस वक्त तो बोले नहीं
    जब सामने खुद श्याम थे तब रंग ही घोले नहीं !

    कुछ अनछुए से शब्द थे, कह न सके संकोच में,
    जानेंगे क्या छूकर भी,हों जब राख में शोले नहीं !

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  4. तेरे चंद लम्हों की सौगात में मैंने
    इत्तफ़ाक़न इल्लती सौदाई को जाना है
    गर इरादतन खुदकुशी कर भी लूं तो
    ये मेरे शौक का ही शुकराना है

    वाह! यह बात कहने के लिए तगड़ा बांकपन चाहिए जो 'इल्लती सौदाई' दो शब्दों में भरा हुआ है.

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  5. सोचती हूँ ------/-----
    क्या लिखा है आपने।सोचता ही रहे तो बंदगी को भी एक नई पहचान मिल जाये। ख्वाहिशें खो जाए तो बंदगी भी बेमतलब सी हो जाये।जिंदगी तो होती ही है फना होने के लिए।और सारे मतलब वाकई में बेमतलब ही हैं।
    आप की कविता जीवन के जिस अनछुए अंधेरे को रोशन करती है वह दुर्लभ है।तभी तो किसी ने लिखा है।
    प्रेम न बाड़ी उपजे प्रेम न हाट बिकाये ।राजा प्रजा जेहि रुचे शीश दई ले जाये।

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  6. दमदार रचना...उर्दू के कुछ शब्द कठिन हैं..ख्वाहिशों पर कब किसका बस चला है..बिन बुलाये भी उठती हैं दिल में उठा एक हल्का सा अहसास भी किसी ख्वाहिश की खबर देता है..

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  7. बरसों से सोंचे शब्द भी उस वक्त तो बोले नहीं
    जब सामने खुद श्याम थे तब रंग ही घोले नहीं !
    बहुत अच्छी लगी यह लाजवाब प्रस्तुति... दिल में उतर गई.....

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  8. बहुत खूब ! प्रभावशाली ....

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  9. ज्यादा से ज्यादा जिद्दी जज्बात इतने सरल ह्रदय से.. ????

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