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Monday, March 23, 2015

क्या हर्ज है ?

कोई मंजिल मिल जाती कोई मुकाम मिल जाता
जिंदगी की जानलेवा अदाओं को काबिल नाम मिल जाता

मुसाफ़िराना गुफ़्तगू के महज मुश्किल से इशारे हैं
मतलब जो समझे वो कुछ जीते वर्ना सब तो हारे हैं

कागज़ का एक उड़ता टुकड़ा है जिसपर कुछ लिखा है
ये जिंदगी ! बेऐतबारी में ही तो तेरा पता दिखा है

बदखती का ये आलम है तो तुझे लापता ही कहना है
समझी हूँ तुझे न समझी थी न ही कभी समझना है

तुझे जीना न आया तो तुझसे बेज़ोश क्यों होऊं ?
बस ख़्वाब है तू सोच कर अपना होश क्यों खोऊं ?

दर्द का फ़लसफ़ा है तू या फ़ुरक़त का कोई फ़साना है
ये जिंदगी ! तू जिंदगी ही है तो क्यों ये शोख़ वीराना है ?

जहां ज़िंदा दफ़न होकर जिंदाँ से रस्में यूँ जोड़ लेते हैं
वहां साया भी सरफ़रोशी की कसमें यूँ तोड़ देते हैं

अपनी मदहोशी में कभी शेर होकर जिलाओ तो मैं मानूं
ये जिंदगी ! कभी शराबे-सेर होकर पिलाओ तो मैं जानूं

लगी रह तू जिंदगी अपना अलग ही गुल खिलाने में
ये माशूकाना बेखबरी है तो क्या हर्ज है तुझपर मुस्कुराने में ?

Wednesday, March 11, 2015

ज्वालामुखी तो ज्वालामुखी है.....

ज्वालामुखी तो ज्वालामुखी है
चाहे वह अलसाई रहे या सोई रहे
चाहे अपनी चुप्पी को ही चुप कराती रहे
या फिर ओढ़ी रहे बर्फ के ठंडापन को
या सिर्फ फैलाती रहे स्वाद के हरियालीपन को
या कि बहाती रहे सोतों से मीठापन को.....
जैसे वह अपने गर्भ में
उबलते असंख्य लावा के बीच भी
बचाये रखती है ज़िंदा बीजों को
वैसे ही बचाये रखती है
और भी मुर्दा-सा बहुत कुछ को......
जैसे अपने अंदर उठते बवंडर से
धार का भी जंगलीपन छुड़ाती है
वैसे ही चक्रवाती-तूफानी आवाज पर
हर सैलाब का साज भी बिठाती है.....
पर उसके ऊपर पसरी शान्ति का
मतलब ये नहीं होता है कि
उसे हिलना नहीं आता है
या अपने अंदाज से
कोई करवट लेना नहीं आता है
या कि उसे जंग छुड़ाकर
पूरी तरह जागना नहीं आता है......
बस कोई उसे
मन लगाने के लिए ही सही
यूँ ही बेतहाशा थपकियाँ न देता रहे
या उँगलियों पर घुमाने के लिए ही सही
यूँ ही बेहिसाब उँगलियाँ न करता रहे......
ज्वालामुखी तो ज्वालामुखी है
जब वह बेतरह टूटती है
तो बेबस होकर फूटती है
और जब बेजार सी फूटती है
तो उससे निकलती हुई
आग के सलाखों के पीछे
बेहिसाब चीखों को भी
चुपचाप दफ़न होना पड़ता है .

Tuesday, March 3, 2015

भीतर तक रंगीली हो गयी ......

पपीहा से तो
किसी ने बस इतना ही पूछा
कि मधुमास क्या है ?
जवाब में वह
पी कहाँ , पी कहाँ की रट से
नये-नये पापों को नेहाने लगा

मधुकंठ से तो
किसी ने बस इतना ही पूछा
कि फगुनाहट क्या है ?
जवाब में वह
सौंधा-सौंधा सा
मंजराकर झरझराने लगा

मैना से तो
किसी ने बस इतना ही पूछा
कि जिद्दी जादू क्या है ?
जवाब में वह
चहक-चहक कर
ढाई आखर की पाती
पढ़ने और पढ़वाने लगी

तितली से तो
किसी ने बस इतना ही पूछा
कि मन का उड़ना क्या है ?
जवाब में वह
महक-महक कर
अपना गुलाबी गाल छुपाने लगी

बुलबुल से तो
किसी ने बस इतना ही पूछा
कि गुलाल क्या है ?
जवाब में वह
बहक-बहक कर
बौराये हास-परिहास को ही
बादलों में घोल फहराने लगी

भौंरा से तो
किसी ने बस इतना ही पूछा
कि रंग क्या है ?
जवाब में वह
फूलों से झट भींगकर
भर दम ऊधम मचाने लगा

और मुझसे तो
किसी ने पूछा भी नहीं
कि फाग क्या है ?
पर आप से ही मैं
सब रंगों में गिरकर
भीतर तक रंगीली हो गयी .