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Thursday, December 18, 2014

दो मिनट के मौन में ......

दो मिनट के मौन में
सब कह दो
वो सब कुछ कह दो
जो कहना चाहते हो
कुछ भी मत सोचो
कोई भी चुप न रहो
या कोई भी इन्तजार मत करो
किसी भी अगले
दो मिनट के मौन का.......
क्योंकि हो सकता है
कुछ-कुछ कहने के बीच
वो सब कुछ कहने का
कोई अर्थ ही न रह जाए
दो मिनट के मौन में
और सबके जिस्म में
चिपके हुए खूनी राख से
खौलती हुई सुर्ख उम्मीदें
कहीं सोचने न लगे
कि आग की तलाश व्यर्थ है........

दो मिनट के मौन में
चुप नहीं रहना चाहिए
किसी भी चीत्कार को
इसतरह मची हाहाकार को
और व्यर्थ नहीं जाना चाहिए
किसी भी एक धिक्कार को......
हरतरफ से
इतनी आवाजें आनी चाहिए
इतनी आहें उठनी चाहिए
और इंसानियत को भी
फूट-फूट कर
इतना रोना चाहिए कि
इसतरह से न भरने वाला ज़ख्म
और कभी ख़त्म न होने वाला दर्द
कोई भी देता है वो
पूरी तरह से ख़ाक हो जाए
दो मिनट के मौन में .

14 comments:

  1. दो मिनिट का मौन .......... सटीक रचना

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  2. पाकिस्‍तान हो या वहां का आतंक या वहां की अार्मी सब के सब अपने आप में इतने वीभत्‍स विरोधाभासी हैं कि उनके लिए दो क्‍या एक मिनट का मौन भी नहीं निकलता इस मन से।

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  3. काश के दो मिनट के इस मौन में इतना शोर हौ ... कि एसा करने वालौं को मौत आ जाए ... सटीक रचना ....

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  4. और कभी ख़त्म न होने वाला दर्द
    कोई भी देता है वो
    पूरी तरह से ख़ाक हो जाए
    दो मिनट के मौन में ....nishbad karti rachna

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  5. इसतरह से न भरने वाला ज़ख्म
    और कभी ख़त्म न होने वाला दर्द
    कोई भी देता है वो
    पूरी तरह से ख़ाक हो जाए
    दो मिनट के मौन में .
    ...आमीन...काश ऐसा ही हो जाए...

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  6. काश ! इस मौन से दहशतगर्दों को सबक मिले.
    नई पोस्ट : आदि ग्रंथों की ओर - दो शापों की टकराहट

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  7. "क्योंकि हो सकता है
    कुछ-कुछ कहने के बीच
    वो सब कुछ कहने का
    कोई अर्थ ही न रह जाए"


    सार्थक हो बस यह दो मिनट का मौन!

    सादर
    मधुरेश

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  8. और व्यर्थ नहीं जाना चाहिए
    किसी भी एक धिक्कार को......
    हरतरफ से
    इतनी आवाजें आनी चाहिए
    इतनी आहें उठनी चाहिए
    और इंसानियत को भी
    फूट-फूट कर
    इतना रोना चाहिए कि
    इसतरह से न भरने वाला ज़ख्म
    और कभी ख़त्म न होने वाला दर्द
    कोई भी देता है वो
    पूरी तरह से ख़ाक हो जाए
    दो मिनट के मौन में ......

    वाकई इसमौन को मुखरित होना ही चाहिए ....स्तुत्य रचना

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  9. हैवानियत से पीडित घटना की सार्थक प्रतिक्रिया पर आवाहन दायित्वबोध का।

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  10. दो मिनट के मौन में
    सब कह दो
    वो सब कुछ कह दो
    जो कहना चाहते हो

    सब कहकर भी कुछ नहीं कहा जाता..और कह भी दिया तो सुनने वाला कौन है..

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  11. मौन से उपजी चीत्कार सियासत की गलियों में गूंजनी चाहिए, तभी कुछ प्रतिध्वनि जालिमों-हत्यारों तक पहुँच सकेगी...........

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  12. दो मिनट के मुखर मौन ने मुठ्ठी तान दी है.

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