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Tuesday, March 5, 2013

सुनवाई चल रही है ...


अर्थ है
तब तो अनर्थ है
जिसपर
व्याख्याओं की परतें हैं
और उन परतों की
कितनी ही व्याख्याएं हैं ...
कहीं शून्य डिग्री पर
उबलता-खौलता पानी है
तो कहीं बर्फ की जिद है
सौ डिग्री पर ही जमें रहने की ...
उँगलियों की सहनशीलता
गेस-पेपर को फाड़ कर
चिट-पुर्जियां बना रही है
तो कहीं बचा-खुचा सच
समझौतावादियों से
सांठ-गांठ में है
जहां वाद-प्रतिवाद
सुरक्षाकर्मी बने हैं ...
और तो और
सभी रडार से ही फ्यूज को
निकाल दिया गया है
उसी की टोह में
मिसाइल-ड्रोन भी हैं ...
खुला समझौता के तहत
खुले हाथों पर
कर्फ्यू लगा दिया गया है
और आत्मसमर्पण करके अर्थ
मुट्ठियों में बंद होकर
कुछ ज्यादा ही सुरक्षित हैं ...
तब तो
प्रतिबंधित नारों की
बंद कमरे में ही
सुनवाई चल रही है .

31 comments:

  1. बर्फ की जिद के आगे आत्मसमर्पण करते अर्थ..खुले हाथों पर लगे कर्फ्यू --मानना पड़ेगा कि कितने द्वन्द और उलझन को झेलते हुए इस उम्दा पोस्ट का जन्म हुआ होगा .....और क्या कहें ??

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  2. बंद कमरे में "सुनवाई" होती है और गोर से "बहिश्त" का रास्ता छोटा हो जाता है. हमआवाज़ जो ना हो, शायद बंद कमरों में ही ठीक से सुने जा पाते हैं. उद्वेलित ह्रदय की जोरदार आवाज़. हर बार की तरह , बहुत अच्छी कृति.

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  3. और यूँ सुनवाई चलती रहेगी .... निष्कर्ष कुछ नहीं निकलेगा ... गहन अभिव्यक्ति

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  4. उम्दा अभिव्यक्ति
    शुभकामनायें !!

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  5. मंगलवार 02/04/2013 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं .... !!
    आपके सुझावों का स्वागत है .... !!
    धन्यवाद .... !!

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  6. बढ़िया है आदरेया- -
    शुभकामनायें आपको-

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  7. ये सुनवाई तो हर युग में होती रही है ... ओर सब कुछ चलता भी रहता है ... जिद्द भी अपनी जगह कायम रहती है ...

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  8. प्रतिबंधित नारों की
    बंद कमरे में ही
    सुनवाई चल रही है .............नतमस्तक हूँ ।

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  9. तब तो
    प्रतिबंधित नारों की
    बंद कमरे में ही
    सुनवाई चल रही है .

    ऐसा ही होता आया है

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  10. खुला समझौता के तहत
    खुले हाथों पर
    कर्फ्यू लगा दिया गया है
    और आत्मसमर्पण करके अर्थ
    मुट्ठियों में बंद होकर
    कुछ ज्यादा ही सुरक्षित हैं...!

    अब इससे ज्यादा और क्या चाहिए...
    सब कुछ यहीं तो है...

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  11. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
    KAVYA SUDHA (काव्य सुधा)

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  12. प्रतिबंधित नारों की
    बंद कमरे में ही
    सुनवाई चल रही है ... और चलती रहेगी ... बर्फ सी जिद,अर्थ का अनर्थ करती रहेंगी

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  13. आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (06-02-13) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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  14. कहीं शून्य डिग्री पर
    उबलता-खौलता पानी है
    तो कहीं बर्फ की जिद है
    सौ डिग्री पर ही जमें रहने की ...

    गहन भाव
    बेहतरीन !

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  15. सुंदर अभिव्यक्ति अमृताजी
    साभार ..........

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  16. बन्द कमरे की सुनवाई बड़ी ही पीड़ादायक होती है, हम सबके लिये।

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  17. व्याख्या की नयी परतें खोलती रचना!

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  18. प्रासंगिक और विचारणीय..... बहुत उम्दा

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  19. कुछ यक्ष प्रश्नोत्तर से चिंतन

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  20. बहुत ही सुन्दर कविता अमृता जी |

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  21. सुप्रभात
    इसी उहापोह में सरकता जीवन और अनमोल समय संग पीढ़ी लेकिन परवाह किसे?

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  22. कितना सटीक ,सच्ची , तस्वीर ...परिस्थितियां इससे बेहतर नहीं ....!!!!

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  23. सुनवाई चलती रहती है,फ़ैसले की नौबत कभी आएगी क्या !

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  24. बहुत सुन्दर .उम्दा पंक्तियाँ .

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  25. बन्‍द कमरे का दरवाजा...........

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  26. बन्‍द कमरे की परतें खोलती रचना

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  27. आज के समाज पर गहरा कटाक्ष..कुछ समझ में आया कुछ ऊपर से निकल गया..पर पढकर अच्छा लगा..

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  28. वाह .. बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति ...ये बड़ा अजीब सा द्वन्द है और सच्चा भी

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  29. सशक्त अभिव्यक्ति

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  30. जिसपर
    व्याख्याओं की परतें हैं
    और उन परतों की
    कितनी ही व्याख्याएं हैं ...
    कहीं शून्य डिग्री पर
    उबलता-खौलता पानी है
    तो कहीं बर्फ की जिद है
    सौ डिग्री पर ही जमें रहने की ...

    मन को उद्वेलित करता विरोधाभास

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  31. बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति! मेरी बधाई स्वीकारें।
    कृपया यहां पधार कर मुझे अनुग्रहीत करें-
    http://voice-brijesh.blogspot.com

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