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Saturday, October 13, 2012

पर भाव तो निरा निरक्षर है...


               वर्णमाला के बिखरे-बिखरे
                 बस थोड़े से ही अक्षर हैं
                कुछ और मैं कहना चाहूँ
             पर भाव तो निरा निरक्षर है

             क्षर-क्षर को लिखा बहुत है
             पर वह अक्षर रहा अलेखा
             अदेखे को मैं लिखना चाहूँ
              जो इस अंतरदृग ने देखा

               ऊर्ध्व वेग कोई उठता है
              भेद कर बुद्धि सूक्ष्म तार
          मुक्ताभ मुक्तक मैं बहना चाहूँ
             तन -मन के क्षितिज पार

            खोजती खोकर उसे खोने हेतु
             यह कैसी पागल प्यास है ?
             उस जिस को मैं गहना चाहूँ
             क्या मेरा अछूता उल्लास है ?

             मैं सांवरिया बनी किसी की
              बनाकर वेदना को वरदान
           अब तिल-तिल मैं सधना चाहूँ
             अनोखी आस की लिए भान

            जिह्वा पर मधु-बूँद गिराकर
            कोई छाया बना है मेरा छाज
              गपक गरल मैं पीना चाहूँ
              इतना ह्रदय भरा है आज

              इतना ह्रदय भरा है आज
             पर बिखरे-बिखरे अक्षर हैं
           बस उसको ही मैं भजना चाहूँ
            पर भाव तो निरा निरक्षर है .

33 comments:

  1. इतना ह्रदय भरा है आज
    पर बिखरे-बिखरे अक्षर हैं
    बस उसको ही मैं भजना चाहूँ
    पर भाव तो निरा निरक्षर है .

    गूंगे के गुड़ सा निर्गुणिया ब्रह्म सा स्वाद है इस रचना का .पीड़ा का अतिरेक है रचना में .एक पीर सी एक हूक सी उठती है कवियित्री कहने की कोशिश ज़रूर करती है -बीन मैं तेरी बनूंगी बीन की झंकार भी ,राग मैं तेरा बनूंगी और गायन हार भी पर कह नहीं पाती गरल पान करती रह जाती है रसना पीर का ..

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  2. भाव को गढ़ना यानी ख्वाब के दर पर खड़े होकर मौन हो जाना है....
    --------------------------------------------------
    वेदना को वरदान बनाकर जब आप शब्दों का प्राण फूंकती है तो वही निरक्षर भाव कालजयी हो जाते हैं......

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  3. जहां भाव हो वहाँ शब्द कोई मायने नहीं रखते .... गहन अनुभूति

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  4. जिह्वा पर मधु-बूँद गिराकर
    कोई छाया बना है मेरा छाज
    गपक गरल मैं पीना चाहूँ
    इतना ह्रदय भरा है आज,,,,,,,,भावमय सुंदर पंक्तियाँ,,,,

    MY RECENT POST: माँ,,,

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  5. बहुत ही प्रभावी, भावों को बाँधना बहुत कठिन हो चला है।

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  6. निरक्षर भावों की संरचना भी अद्भुत होती है ....

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  7. कुछ और मैं कहना चाहूँ
    पर भाव तो निरा निरक्षर है

    सच बात है अमृता जी ...भाव निरक्षर ही है ....हम उसमे कितने ही शब्द क्यूँ ना डाल दें ...फिर भी कुछ अनकहा रह ही जाता है ...!!
    बहुत सुंदर रचना ....

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  8. वर्णमाला के बिखरे-बिखरे
    बस थोड़े से ही अक्षर हैं
    कुछ और मैं कहना चाहूँ
    पर भाव तो निरा निरक्षर है

    मन के भावों की बेहद गूढ अभिव्यक्ति।

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  9. आपकी लेखनी से एक और उत्कृष्ट समर्पण की कविता -शब्द भाव बिलकुल अलग नहीं!

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  10. जिह्वा पर मधु-बूँद गिराकर
    कोई छाया बना है मेरा छाज
    गपक गरल मैं पीना चाहूँ
    इतना ह्रदय भरा है आज
    अमृता जी, गरल भी जब अमृत बन जाता है कोई मीरा क्षण होता है वह..

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  11. गरल भी जब अमृत बन जाता है कोई मीरा क्षण होता है वह..
    aabhar.....

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  12. जिह्वा पर मधु-बूँद गिराकर
    कोई छाया बना है मेरा छाज
    गपक गरल मैं पीना चाहूँ
    इतना ह्रदय भरा है आज

    इतना ह्रदय भरा है आज
    पर बिखरे-बिखरे अक्षर हैं
    बस उसको ही मैं भजना चाहूँ
    पर भाव तो निरा निरक्षर है .

    वेदना को बांधना अद्भुत प्रयास .

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  13. बहुत सुन्दर रचना है बधाई।

    क्षर-क्षर को लिखा बहुत है
    पर वह अक्षर रहा अलेखा
    अदेखे को मैं लिखना चाहूँ
    जो इस अंतरदृग ने देखा

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  14. ऊर्ध्व वेग कोई उठता है
    भेद कर बुद्धि सूक्ष्म तार
    मुक्ताभ मुक्तक मैं बहना चाहूँ
    तन-मन के क्षितिज पार

    अनुभव-ज्ञान की अभिव्यक्ति और यह भाव हाथ से निकल-निकल जाता है. क्षर, अक्षर में से होकर निरक्षर होने की अनुभूति को कहने वाला साक्षी, शब्दों से परे जा कर कह रहा है- 'भाव तो निरा निरक्षर है'. इस कठिन भावाभिव्यक्ति के लिए बधाई.

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  15. जिह्वा पर मधु-बूँद गिराकर
    कोई छाया बना है मेरा छाज
    गपक गरल मैं पीना चाहूँ
    इतना ह्रदय भरा है आज,, बहुत सुन्दर भाव अनुपम शब्द योजना.....

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  16. वाह...
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (14-10-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  17. Amrita,

    KAYI BAAR BHAV KO BATAANAA KATHIN HOTAA HAI KYOKI HUM THEEK SHABAD NAHIN SOCH PATE, KE BAARE BAHUT SAHI BATAAYE APNE.

    Take care

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  18. लेखनी में शब्दों का जादू ...

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  19. भावों की अभिव्यक्ति शब्दों में करना कवि के ही बस की बात है...

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  20. बहुत सुंदर रचना
    क्या बात है

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  21. इस निरे निरक्षर भाव को भी शब्दों में बाँधने का अद्भुत प्रयास... बहुत सुन्दर रचना

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  22. भाव को बाँध कर सीमित अक्षरों में,अनुभूति को विस्तार दे दिया आपने !

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  23. निरक्षर भाव ही शायद उर्ध्वगामी होते हैं क्योंकि वे शब्दों की बोझिलता से मुक्त होते हैं

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  24. सुंदर रचना के लिए बहुत बधाई आपको

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  25. भावों की अभिव्यक्ति भावों के ही सामर्थ्य का है, शब्द तो असमर्थ ही हो जाते हैं वहाँ। गहरा चिंतन व सुंदर प्रस्तुति।

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  26. भावों से सजी बहुत ही सुंदर रचना |

    इस समूहिक ब्लॉग में आए और हमसे जुड़ें :- काव्य का संसार

    यहाँ भी आयें:- ओ कलम !!

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  27. भावों की अभिव्यक्ति कभी शब्दों की मोहताज़ नहीं रही. बेहद मर्मस्पर्शी कविता.

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  28. सचमुच.......
    जादूगरी आती है आपको शब्दों की..
    मैं सांवरिया बनी किसी की
    बनाकर वेदना को वरदान
    अब तिल-तिल मैं सधना चाहूँ
    अनोखी आस की लिए भान

    बहुत सुन्दर..

    अनु

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  29. वाह,.... .....बहुत ही सुन्दर लगी पोस्ट ।

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  30. इतना ह्रदय भरा है आज
    पर बिखरे-बिखरे अक्षर हैं
    बस उसको ही मैं भजना चाहूँ
    पर भाव तो निरा निरक्षर है .
    वाह ... बहुत ही अनुपम भाव

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  31. इतना ह्रदय भरा है आज
    पर बिखरे-बिखरे अक्षर हैं
    बस उसको ही मैं भजना चाहूँ
    पर भाव तो निरा निरक्षर है .

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  32. बेहतरीन कविता और सीख भी कि भाव तो निरा निरक्षर हैं....स्वागत है।

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