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Saturday, February 26, 2011

क्लोनिंग


हिटलर जीन के
आदेश पर
प्रतिकृतिकरण
भ्रष्ट मानव का........
अनियंत्रित विभाजन
कैंसरयुक्त कोशिका की तरह
मेटास्टैसिस की
भरपूर क्षमता लिए हुए...
हाँ ! कुछ-कुछ
हवा से फैलने वाला
संक्रामक रोग सा.........
आह !
इस कलयुगी प्रयोगशाला में 
परीक्षण मानव पर ही   
जो छलांग लगा रहे हैं
विकास के चरम बिंदु से
पशु-रेखा के नीचे 
और शुभचिंतक बन
स्वजनों को साथ लिए ...
वाह !
भौतिक उपभोग का
सबसे सरल तथा 
उपयोगी विधि  
आत्मा का घोटाला कर
सबकुछ अपने पेट में डालना
जो तोंद दिखने लग जाये तो
कालिख में मुँह छुपा लेना .......
हाय !
स्वपोषण के लिए
मानवता का ऐसा दोहन....
आज हर तरफ दिख रहा है
भ्रष्ट मानव का
प्राकृतिक क्लोनिंग
सौ फीसदी शुद्धता वाला......
परिणाम
बुरी तरह से घिरे हैं हम
व्यभिचार और भ्रष्टाचार के बीच
जो खुले बाज़ार में नंगा हो
दिखा रहा है अपना
विध्वंसक तांडव.


एक तड़क तड़का और .......

भ्रष्टाचार के गर्म तवे पर
कुछ ज्यादा रोटी सिंक रही है
लूट सको तो लूट लो भाई
यह मुफ्त में ही बिक रही है .







Thursday, February 17, 2011

स्फिंक्स

वक़्त-बे-वक़्त
मेरी आतंरिक आवश्यकताएँ
करने लगती है
सुरसा से प्रतिस्पर्धा.....
चतुर-बहवे की चतुराई को भी
सूक्ष्मता से शिकस्त देते हुए...
सोने की लंका की क्या बिसात
आकाश-महल बनाने की
जिद लिए हुए ...............
देखते-ही-देखते 
मेरी महत्वाकांक्षा
पिरामिड का शक्ल
लेने लगती हैं............
आधार इतना बड़ा कि
उसकी संतति भी
रह सके सदियों तक........ 
लेकिन ऊपरी छोर
इतना नुकीला कि
वो भी टिक न पाए ............
और मैं स्फिंक्स बन 
करती रहती हूँ रखवाली
कहीं मेरे ममी पर ही
ये खड़ी न हो जाए.
चतुर-बहवे ---हनुमान

Monday, February 7, 2011

दबंग यादें

मुई यादें हमेशा
पीठ पीछे करती हैं वार....
कई-कई तीर बिंध जाते हैं 
छाती में और
उसके अन्दर का यन्त्र
कुछ पल के लिए
टीस के मारे 
अपना काम भूल जाता है...
अतीत के चाक पर
समय बेतरतीब नाचने लगता है
घटनाएँ दर्शक बन
अगली पंक्ति में बैठने को
करने लगती हैं मारामारी
कुछ दबंग यादें
अपना रौब दिखाकर 
चाक के बीचो-बीच
बैठ जाती हैं
जहाँ से कोई भी 
माई का लाल उठा न पाए...
उसकी खुशामद में 
दासानुदास बन जाते हैं
सोच के यन्त्र
अब चढावा चढ़ाओ
सारी सोच का
तब तक चढाते रहो
जब तक वे खुश न हों ...
आत्म शोषण का
एक रोमांचक खेल
भावनाएं एक अति से
दूसरे अति पर कूदती हुई
हम निरीह होकर
सिर्फ देखते रहते हैं....
दबंग यादें -इतनी बाहुबली कि
अतीत को भी
वर्तमान बनाने का
दम- ख़म रखती हैं....
और हम
उसी यंत्रणा-काल जनित
सुख-दुःख के भंवर में
उलझते चले जाते हैं . 
   
आइये ...इस बसंती -बयार में कुछ मिजाज़ बदला जाये ......................