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Monday, January 31, 2011

विजिगीषा

घनघोर बियाबान
घुप्प अँधेरा
घातक जीव-जन्तु
घड़ी-घड़ी घुटन से  
घिघियाती हुई........  
मैं -एक ठूँठ
अपने आखिरी पत्ते को 
कसकर......पकड़ी हुई
पास पड़े एक
पत्थर को देखकर 
मन-ही-मन
सोचती हुई कि--
कभी तो
किसी के पैर से छूकर
शापमुक्ति संभव है ....
पर मुझे तो
अपने उसी आखिरी
पत्ते के सहारे ही
वसंत की राह देखनी है
ताकि मैं फिर से
हरी -भरी हो सकूँ
उस बियाबान में भी
जिजीविषा से भरी हुई
विजिगीषा का
सन्देश देते हुए .........
 
जिजीविषा -अदम्य जीने की इक्क्षा
 विजिगीषा -विजय पाने की इक्क्षा.

44 comments:

  1. अज्ञेय जी की "सोन मछली" नामक कविता याद दिला दी ...बहुत खूब लिखा है आपने ....जिजीविषा रहती जीवन में विजिगीषा के साथ ..सुंदर भाव सम्प्रेषण ...शुक्रिया

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  2. बहुत ही सादगी से अपनी बात कहती हुई कविता.

    सादर
    ------
    बापू! फिर से आ जाओ

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  3. अमृता जी,

    सुभानाल्लाह......वाह...वाह....क्या बेहतरीन रचना है......कितने सुन्दर बिम्बों का इस्तेमाल किया है आपने......अन्दर तक झंकझोर देने वाले शब्दों का इस्तेमाल बखूबी किया है.......बहुत ही सुन्दर......शुभकामनायें|

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  4. bahut achchha likha hai aapne amrita ji............

    jo kabhi haar nahi maanta..jeet khud aa kar uske kadam chumti hai....

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  5. अमृता जी…

    बहुत अच्छी लगी रचना। "विजिगीषा" का सन्देश देती हुई जीवट अभिव्यक्ति।

    दो-एक संदेह आये मन में पढते समय…
    "वसंत का राह देखना है"…… "वसंत की राह देखनी है" लिखा जाना था शायद।
    "जन्तुयें"…… इसके प्रयोग के विषय में निश्चित नही हूँ पर शायद "जन्तु" दोनों वचनों (एक और बहु)में एक सा ही प्रयोग होता है।

    सन्देह थे तो आपके समक्ष रख दिये, आशा है आप अन्यथा नहीं लेंगी।

    सादर!

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  6. अमृता जी , आप कैसे साधारण से साधारण शब्दों में इतना जान डाल देतीं हैं ...आपके कलम को दिल से सलाम ...बहुत अच्छी रचना ..

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  7. सुंदर सशक्त भावनात्मक कविता -
    बहुत अच्छी लगी

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  8. आज आपको पहली बार पढने का मौका मिला...आपकी लेखनी ने बहुत प्रभावित किया है..बधाई स्वीकारें,...
    नीरज

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  9. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 01- 02- 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  10. बहुत सशक्त भावपूर्ण प्रस्तुति..

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  11. amruta ji

    antim panktiyo tak aate aate yahi lagne laga tha ki meri hi man ki baatoko aapne apni kavita me daala hai ... hamesha ki tarah ..man me bas jaane wali rachna ....

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  12. सधे हुए शब्दों के साथ आशावादी दृष्टिकोण लिए हुए सुन्दर कविता.

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  13. बहुत ही उम्दा अभिव्यक्ति .आप की कलम को सलाम

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  14. अमृता जी
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है जिजीविषा और विजिगीषा की... दो शब्दों ने अटकाव दिया है ... "जन्तुएं" नहीं जंतुओं होना चाहिए जंतु का बहु वचन शायद .. और वसंत कि राह ..या वसंत का रास्ता ... यहाँ लिंग दोष लग रहा है... एक बार देखिएगा

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  15. ..विजिगीषा का संदेश तो आपने दे दिया।
    .....बहुत खूब।

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  16. बहुत सुन्दर अमृता जी.....
    बहुत ही आशावादी बात....
    ये शब्द ही कितना सुन्दर है......जीना सिखाने वाली...

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  17. अच्छी इच्छा दृढ निश्चय के साथ ....... शुभकामनायें !!

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  18. यह आशापूर्ण भाव, सकारात्मक दृष्टिकोण तथा विजय से ओतप्रोत हृदय ही काल विजयी होता है। सकारात्मकता की एक सशक्त कविता।

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  19. बेहद उम्दा और सधी हुयी कविता ज़िन्दगी जीने को प्रेरित करती है। सुन्दर प्रस्तुतिकरण्।

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  20. लाजवाब............बहुत ही सुंदर रचना...

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  21. बहुत सशक्त भाव लिये हुये बहुत अच्छी रचना .. ।

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  22. सादगी के साथ अपनी बात कह दी आपने ...वीना जी , कुछ ऐसे ही पलों को मैंने भी लिखा है ..
    तुम्हारा इन्तिज़ार अब तक हरा है
    सूखी नहीं हैं टहनियां , कोई अब तक खड़ा है ....

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  23. सुन्दर कविता,
    सुन्दर कल्पना...

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  24. अमृता जी,
    बहुत सुन्दर कृति है ... आपकी भाषा और भाव दोनों की दाद देनी चाहिए ...

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  25. ahilya ka reference kai aur rachnaon se jodta hai,
    stri purush samvad ko ek feminine tone dete hoe femalecentric na banana ek uplabdhi hai.

    badhia. likhti rahein

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  26. बहुत लाजवाब कविता,जीवन का सच और सार्थक सन्देश

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  27. हर पत्ते के सहारे बसंत की राह देखना .... कमाल की आशावादी पंक्तियाँ हैं....बहुत सुन्दर

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  28. बहुत सुन्दर और सकारात्मक रचना । बधाई स्वीकारे ।

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  29. वाह ,जीवन की उत्फुल्लता से भरी अभिव्यक्ति -

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  30. आपकी कविता मन के संवेदनशील तारों को झंकृत कर गयी। भाव एवं शिल्प दोनो ही अच्छा लगा।

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  31. शीर्षक से ही आकर्षण हो जाता है इस कविता को पढ़ने का. 'आखिरी पत्‍ता' शब्‍द आते ही 'द लास्‍ट लीफ' कहानी का बिंब याद आता है.

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  32. अमृता जी ,
    बहुत ही सुंदर कविता लिखी है |
    आपके ब्लॉग पर पहली बार आ कर और आपकी रचनाएं पढ़ कर बहुत प्रभावित हूँ |

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  33. जिजीविषा रहती जीवन में विजिगीषा के साथ....
    सुंदर भावाभिव्यक्ति.

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  34. आपकी ये कविता जब पढ़ रहा था उस समय घर पे ही था...बहन शादी के बाद पहली बार घर आई हुई थी...और माँ और बहन दोनों को ये कविता सुनाया था मैंने पढ़ के...
    दोनों ने बहुत तारीफ़ की.
    (ये अलग बात है की बहन को समझाना पड़ा)
    वैसे आप फेमस हो गयीं हैं मेरे बहन और मेरी माँ के बीच(आपको तो कारण पता ही होगा न ;) )

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  35. Jijiwisha aur Vijigisha dono ke bina jeevan bilkul nirarthak hai...basant ka intezaar kaun nahi karta par ek thoonth ko pakar apni shapmukti ka intezaar wahi kar sakta jiski jijiwisha ke garv mein vijigisha ankurit ho rahi ho...

    Adbhut rachna...bahut bahut shubhkamnayen...

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  36. आपके शब्द जादू करते हैं, बहुत अच्छा लिखती हैं आप!!
    सुन्दर कविता, सम्बल देती हुई...

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