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Wednesday, November 17, 2010

औचित्य

खोजती रही मैं ..
अपने पादचिह्न
कभी आग पर चलते हुए
तो कभी पानी पर चलते हुए
खोजती रही मैं ..
अपनी प्रतिच्छाया
कभी रात के घुप्प अँधेरे में
तो कभी सिर पर खड़ी धूप में
खोजती रही मैं ..
अपना परिगमन -पथ
कभी जीवन के अयनवृतों में
तो कभी अभिशप्त चक्रव्यूहों में
खोजती रही मैं..
अपनी अभिव्यक्ति
कभी निर्वाक निनादों में
तो कभी अवमर्दित उद्घोषों में
खोजती रही मैं ..
अपना अस्तित्व
कभी हाशिये पर कराहती आहों में
तो कभी कालचक्र के पिसते गवाहों में
हाँ ! खोज रही हूँ मैं ........
नियति और परिणति के बीच
अपने होने का औचित्य ....

Monday, November 8, 2010

अज्ञात नदी

ऐसा नहीं हो सकता कि
कोई अज्ञात नदी
पृथ्वी तले चुपचाप बहती हुई
समंदर की तरफ बढ़ी जा रही हो
हालाँकि उसका सफ़र
थोड़ा मुश्किल भरा होगा
उसे कुछ ज्यादा
वक्त लग रहा होगा
फिर भी बहती चली जा रही है
धीरे -धीरे , धीरे -धीरे
अपनी व्यथा को
स्वयं में ही समेटे हुए
हाँ प्रिय !
वो नदी मैं ही हूँ और
बाँहें फैलाये हुए तुम - समंदर
मुझमें ठंडा उन्माद है
तो तुममें उतप्त धैर्य
समय के साथ एकाकार होकर
मैं आ रही हूँ , आ रही हूँ ....
राहगीरों की प्यास बुझाते हुए
तुम भी अपनी सीमाओं को
और फैलाओ , और फैलाओ ....
ताकि जब हम मिलें तो
क्षितिज भी शेष न रहे .

Wednesday, November 3, 2010

सोचती हूँ ........

दीवाली है
सोचती हूँ
सबों के साथ
उत्सवी उमंग में डूब जाऊं
संभृत समस्याओं को छोड़
सफाई पुताई में लग जाऊं ....
मन के कचड़े को
कहीं दूर ले जाकर
सुरक्षित निपटान करूँ
कुछ चटकीले रंगों से
नए कलेवर में
रंग रोगन करूँ ......
खुशियों की रेवड़ियाँ
जी भर के खाऊं खिलाऊं...
सभी तो
घर से बाहर तक
दीपों से रोशनी फैलाते हैं
अपने अन्दर के शोर को
पटाखों से दबातें हैं
अतृप्त तृष्णा को
छप्पन भोग लगाते हैं
सोचती हूँ ......
कभी किसी भी
प्रदुषण से मैं
पूर्णतः मुक्त होकर
एक ह्रदय दीप भी
जला लूँ तो
हो जाए
दीवाली .