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Wednesday, October 18, 2017

मन रे !

मन रे , भीतर कोई दीवाली पैदा कर !
अँधेरा तो केवल
उजाला न होने का नाम है
उससे मत लड़
बस उजाला पैदा कर !

कभी दीया मत बुझा
हर क्षण जगमगा कर
आँखों को सुझा !
जो दिखता है
कम - से - कम उतना तो देख
और मत पढ़ अँधेरे का लेख !

कर हर क्षण उमंग घना
बसंत सा - ही उत्सव मना !
मत रुक - क्योंकि तू तो
गति के लिए ही है बना !

मत देख - आगत या विगत
तू ही है संपूर्ण जगत !
जगत यानी जो गत है
जो जा रहा है
जो भागा जा रहा है
उत्सव मना , उत्सव मना
अर्थ अनूठा बतलाये जा रहा है !

हर क्षण बसंत हो !
हर क्षण दीवाली हो !
मंद - मंद ही मगर
हर क्षण , हर क्षण
तेरी लौ में लाली हो !

अँधेरा तो केवल
उजाला न होने का नाम है
मन रे , भीतर कोई दीवाली पैदा कर !


*** दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

8 comments:

  1. बहुत सुन्दर भाव। दीप पर्व शुभ हो ।

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  2. हर क्षण बसंत हो !
    हर क्षण दीवाली हो !
    मंद - मंद ही मगर
    हर क्षण , हर क्षण
    तेरी लौ में लाली हो !..........Wah!!! Sadaiw aapke jeewan mein aisa hi deepotsav rahe.

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    1. "मन रे, भीतर कोई दीवाली पैदा कर!"
      अपना दीपक खुद बनना ही रोशनी की सार्थक तलाश है. बहुत सुंदर कविता.

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  3. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ...

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  4. एक दीप बन राह दिखाए
    मन जुड़ जाए परम् ज्योति से,
    अंधकार की रहे न रेखा
    जगमग पथ पर बढ़े खुशी से !
    ऐसा ही तो कुछ लिखा था दीवाली के दिन..आपके शब्दों से मेल खाता हुआ..शुभकामनायें !

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  5. मन रे भीतर कोई दीवाली कर....बहुत सुंदर

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  6. हर कदम, हर क्षण जीवन उत्सव हो, यही ज्यादा मुनासिब है. बगैर अँधेरा उजाला कहाँ बिखर सकता है...

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  7. अति अति सुंदर ।

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