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Thursday, July 24, 2014

अमृता में तन्मय ...

                   हाँ ! पंख लगे मेरे सपनों को
                   सिर पर ही पैर लिए दौड़ी मैं
                   ऐसी झलक दिखी है उसकी
                  कि सदियाँ जी ली क्षण में मैं

                  क्षण में ही जीकर सदियों को
                 जीवन के अर्थ को जान लिया
                 अक्षय-प्रेम का आभास पाकर
                गर्त के शीर्ष को पहचान लिया

                 मैं चौंकी , मेरी कुंठा जो टूटी
               अमृता से ही सब कुछ खो गया
               चित्त- चंदन को घिस- घिसकर
               एक सौरभ भर गया नया- नया

                धन्य हुई , आभार फिर आभार
               भाव में भासित उस चिन्मय को
                डुबकी मारी जो तो डूब ही गयी
               बचा न पाई , मैं इस तन्मय को

                 अर्द्धोच्चारित से शब्द हैं सारे
                उच्चार में भी वो न समाता है
                पर इतना प्रीतिकर है वह कि
                 बिन उच्चारे रहा न जाता है

                 सांस में भीतर,सांस में बाहर
                 वही तो आता है औ' जाता है
                 पर जब मैं उसे बुलाती हूँ तो
                 अमृता में तन्मय हो जाता है .

Wednesday, July 9, 2014

कोई दिलनवाज़ ही बचाये ....

दिल को तो बड़ा ही सुकून मिलता है
जब अपना इल्जाम गैर के सर चढ़ता है

दर्द के नासूर का भी इतना ही है इशारा
गर चोट न हो तो कहीं उनका नहीं गुजारा

हरतरफ शातिराना शिकायतों की सरगोशियाँ है
मुआफ़िक़त ज़ख़्मों की जुनूनी दस्तबोसियाँ है

मवाद मजे से मशग़ूल है महज बहने में
इल्लती दस्तूर को क़तरा-क़तरा से कहने में

लबे-खामोश से कुछ पूछने से क्या फ़ायदा ?
नामुनासिब मजबूरियों का भी अपना है क़ायदा

बिरानी साँसों में भी अब न वैसी खनखनी है
जैसे ये दुनिया बस ग़म के वास्ते ही बनी है

शौक़ से ख़ुशी दर्दो-आह में गुजरी जाती है
सारी उम्र यूँ ही गुनाह में गुजरी जाती है

दर्द का काफिला है और दिल की नादानियां है
भरोसा है , ठोकरें है और उनकी कहानियां है

जहां पर हर आगाज ही इसकदर तक बुरा हो
तो कोई दिलनवाज़ ही बचाये अंजाम जो बुरा हो .