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Tuesday, June 10, 2014

उस 'शायद' में......

हो सकता है
मेरे फैले फलक पर
रंगबिरंगे बादलों का
छोटा-छोटा टुकड़ा सा
मेरा लिखा हुआ
सिर्फ काले अक्षर हों
या बस काली स्याही हो
और उसके चारों तरफ
बढ़ता हुआ
हो अनंत खाई.....
उसे खोज-खोज कर
या जोड़-जोड़ कर
पूरा पढ़ने के बाद भी
जटिल बुनावट वाली
ढरकते कगार ही मिलें
जिसपर सीधी रेखा में
चढ़ने के बाद भी
शब्दों से बाहर होने का
कोई उपाय न हो
और मुझे कांट-छांट करके
कहीं से भी दोहराते हुए
बस यूँ ही
समझने का उपक्रम भर
किया जाता रहे
साथ ही
मुझसे सहमत हुए बिना ही
असहमत शब्दों को छीन कर
भर दिया जाए
कोई और अर्थ.....
पर मैं
इस आशा में
लिखती हूँ / लिखती रहूँगी
कि 'शायद' कोई-न-कोई
कभी-न-कभी
शब्दों के खिलाफ होकर ही
उसे शास्त्र बना दे....
हो न हो
उस 'शायद' में
कहीं 'मैं' ही तो नहीं ?

20 comments:

  1. इस आशा में
    लिखती हूँ / लिखती रहूँगी
    कि 'शायद' कोई-न-कोई
    कभी-न-कभी
    शब्दों के खिलाफ होकर ही
    उसे शास्त्र बना दे....
    यह पंक्तियाँ ..बहुत सुन्दर .
    कुछ खास है आपकी लेखनी में जो बिना पढ़े रहा नहीं जाता .

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  2. सार्थक प्रस्तुति...

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  3. लिखते रहें...आस बनी रहे.....
    सार्थक रचना..

    अनु

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  4. इस आशा से लिखती ही रहूंगी !
    बिलकुल लिखते रहना चाहिए चीखने की तरह जब तक आवाज न पहुंचे !
    प्रेरक सन्देश !

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  5. यह तलाश ही काफ़ी है मंजिल की राह में...बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

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  6. यह विश्वास ही तो सम्बल है पथिक का..

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  7. .....कि 'शायद' कोई-न-कोई शब्द/कोई न कोई कविता/ या फिर कोई न कोई आशा.... हमें हम तक पहुंचा दे ..

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  8. प्रत्येक व्यक्ति का आचार, विचार, लेखन अभिव्यक्ति स्वातंत्र होता है। उसकी जिंदगी जीने एक पद्धति होती है - शास्त्र जैसी। और कवि जो तपस्या करता हैं वह शब्दों के उपयोग से उसके खिलाप नवीन शास्त्र का निर्माण है। शायद क्यों उसमें हर व्यक्ति का समावेश होता ही है।

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  9. यही संबल है जो आगे चलने को प्रेरित करता है .

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  10. सृजन-प्रसूत भावों की दुनिया के एकांत का मंथन प्रस्तुत करती यह कविता अच्छी लगी.

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  11. वाह ,,बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

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  12. प्रभावपूर्ण प्रस्तुति !

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  13. शायद के अर्थों लिपटे ये शब्‍द ..... एक उम्‍मीद यूँ ही साथ लिये चलते हैं

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  14. आजकल साहित्‍य से अरुचि हो गई है। दिल-दिमाग से खाली हूँ इसलिए यहां टिप्‍प्‍णी हेतु समय पर नहीं आ सका। आप की कवितामयी शास्‍त्रीय रचनाएं किसी के लिए हो न हों, पर पाठकों के लिए तो शास्‍त्र जैसे किसी निर्धारित विद्व शिखर की खोज करने के समान ही हैं। उस शायद में रचनाकार के रूप में आप तो हैं ही पाठकों के रूप में भी कई हैं। यह उधेड़बुन कहीं न कहीं समतल, सुयोग्‍य, संस्थित तो होगी ही।

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  15. बस यही आकाँक्षा ही तो है जो कि शब्द बुनकर भी अर्थ अपने सीधे मायनों से कहीं और स्वयं को तलाशती है। सुन्दर रचना।

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  16. आप तो बस लिखती रहे .....यूँ ही ...वाह

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  17. जिसने 'काट-छांट', 'खिलाफ', 'असहमत' को परखा है वही 'मैं' 'शायद' से परिपूर्ण है. बहुत सुंदर.

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  18. साल भर से ज्यादा होने को आया होगा. इसलिए सोचा बिना कहे तो नहीं ही जाऊँगी. अभी शुरू किया है इस कविता से. कविता अच्छी है या इस तरह का कुछ लिखने का मतलब ही नहीं है. लाजवाब से है, और बस अभी इतना ही सोच रहे है अपने सोने के समय को और कितना आगे खिसका सकते है.

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