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Saturday, November 3, 2012

क्षणिकाएँ ...


क्षणों की लहरों ने तो
विभीषिकाओं का पाठ पढ़ाया है
पर मैंने भी हर लहर के लिए
डांड तोड़ कर डोंगा बनाया है

           ***

अमानुषिक ऊँचाइयों की परछाईयाँ
मैंने चतुराई से चापा है
और हरेक चीज़ों को बस
अपने सिर के हिसाब से नापा है

           ***

धीरे-धीरे सरक कर
सपनों के छोरों को जोड़ा है
और अस्तित्व के गिने पन्नों में
मैंने चोरी से कुछ को मोड़ा है

           ***

दो जोड़ दो को हरबार
मैंने तीन या पाँच कहा है
और निन्यानवे का फेरा लगा-लगाकर
शून्य से ही तिजोड़ी को भरा है

           ***

आईने में जैसी भी तस्वीर मिली
मैंने बस उसी को जाना है
ओर पीछे पुता कलई ने जो कुछ कहा
उसी को आँख बंद करके माना है .



52 comments:

  1. दो जोड़ दो को हरबार
    मैंने तीन या पाँच कहा है
    और निन्यानवे का फेरा लगा-लगाकर
    शून्य से ही तिजोड़ी को भरा है

    जीवन सत्य सहज ही अभिव्यक्त किया है आपने इन पंक्तियों में ....!

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  2. But what is ultimate result of all this jugad?

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  3. अमानुषिक ऊँचाइयों की परछाईयाँ
    मैंने चतुराई से चापा है
    और हरेक चीज़ों को बस
    अपने सिर के हिसाब से नापा है
    समाज में जीने के लिए जो जद्दोजहद होती है, उसमें अपने लिए एक राह बनाते जाना भी बहुत बड़ी चुनौती है, हमारे सामने। इन्हें संघर्षों को कवयित्री ने अपने मनोभाव के अनुसार इन क्षणिकाओं में गढ़ा है।

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  4. बहुत उम्दा पोस्ट । बहुत सुन्दर ।
    मेरे ब्लॉग में स्वागत है आपका ।

    मेरा काव्य-पिटारा

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  5. दो जोड़ दो को हरबार
    मैंने तीन या पाँच कहा है
    और निन्यानवे का फेरा लगा-लगाकर
    शून्य से ही तिजोड़ी को भरा है ... शून्य में ही समस्त है

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  6. दो जोड़ दो को हरबार
    मैंने तीन या पाँच कहा है
    और निन्यानवे का फेरा लगा-लगाकर
    शून्य से ही तिजोड़ी को भरा है

    बेहद गहन

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  7. अमानुषिक ऊँचाइयों की परछाईयाँ
    मैंने चतुराई से चापा है
    और हरेक चीज़ों को बस
    अपने सिर के हिसाब से नापा है

    क्या बात है, सभी क्षणिकाएं एक से बढ़कर एक
    बहुत सुंदर

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  8. अमानुषिक ऊँचाइयों की परछाईयाँ
    मैंने चतुराई से चापा है
    और हरेक चीज़ों को बस
    अपने सिर के हिसाब से नापा है

    क्या बात है, सभी क्षणिकाएं एक से बढ़कर एक
    बहुत सुंदर

    ReplyDelete
  9. क्षणों की लहरों ने तो
    विभीषिकाओं का पाठ पढ़ाया है
    पर मैंने भी हर लहर के लिए
    डांड तोड़ कर डोंगा बनाया है

    ***

    अमानुषिक ऊँचाइयों की परछाईयाँ
    मैंने चतुराई से चापा है
    और हरेक चीज़ों को बस
    अपने सिर के हिसाब से नापा है

    जीवन की सच्चाई बयान करती क्षणिकाएं .

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  10. सभी क्षणिकाएं एक से बढकर एक हैं ..

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  11. अलग अंदाज़ है नापने का ... अच्छी क्षणिकाएं

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  12. बहुत सुन्दर...
    धीरे-धीरे सरक कर
    सपनों के छोरों को जोड़ा है
    और अस्तित्व के गिने पन्नों में
    मैंने चोरी से कुछ को मोड़ा है

    लाजवाब...
    अनु

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  13. दो जोड़ दो को हरबार
    मैंने तीन या पाँच कहा है
    और निन्यानवे का फेरा लगा-लगाकर
    शून्य से ही तिजोड़ी को भरा है

    ***

    आईने में जैसी भी तस्वीर मिली
    मैंने बस उसी को जाना है
    ओर पीछे पुता कलई ने जो कुछ कहा
    उसी को आँख बंद करके माना है .

    बेहतर....बेहतरीन....

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  14. है कुछ ऐसा के जैसे ये सब कुछ
    अब से पहले भी हो चुका है कहीं.......

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  15. behtareen आईने में जैसी भी तस्वीर मिली
    क्षणों की लहरों ने तो
    विभीषिकाओं का पाठ पढ़ाया है
    पर मैंने भी हर लहर के लिए
    डांड तोड़ कर डोंगा बनाया हैने बस उसी को जाना है

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  16. अमानुषिक ऊँचाइयों की परछाईयाँ
    मैंने चतुराई से चापा है
    और हरेक चीज़ों को बस
    अपने सिर के हिसाब से नापा है,,,,,

    उम्दा भावभिव्यक्ति,बहुत सुंदर क्षणिकाएँ,,,,अमृता जी....बधाई,,,
    RECENT POST : समय की पुकार है,

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  17. बहुत ही सुंदर रचनाये जी,बधाई स्वीकारें |

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  18. दो जोड़ दो को हरबार
    मैंने तीन या पाँच कहा है
    और निन्यानवे का फेरा लगा-लगाकर
    शून्य से ही तिजोड़ी को भरा है
    जीवन की सच्चाई का गहन लेखा जोखा... सभी क्षणिकाएं एक से बढ़कर एक हैं

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  19. सुंदर क्षणिकाएं
    जीवन दर्शन भी

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  20. सुंदर अभिव्‍यक्तियां।

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  21. Amrita,

    JO SAMAY KE SAATH APNE AAP KO DHAL LE WOH MAN KI SHANTI KO PAATAA HAI.

    Take care

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  22. सभी क्षणिकाएं गहन भाव लिए है..बहुत सुन्दर..अमृता जी..आभार

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  23. अमानुषिक ऊँचाइयों की परछाईयाँ
    मैंने चतुराई से चापा है
    और हरेक चीज़ों को बस
    अपने सिर के हिसाब से नापा है

    अर्थपूर्ण , प्रभावित करती क्षणिकाएं

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  24. सुन्दर और गहन .. शायद मुझे कुछ और बार पढनी पड़ेगी अच्छे से समझने के लिए ..
    सादर
    मधुरेश

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  25. वाह दीदी, सभी क्षणिकाएं बेहतरीन हैं!!

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  26. दो जोड़ दो को हरबार
    मैंने तीन या पाँच कहा है
    और निन्यानवे का फेरा लगा-लगाकर
    शून्य से ही तिजोड़ी को भरा है

    भावनाओं को शब्दों में ढालना आसान नहीं है किंतु इन क्षणिकाओं को पढ़कर ऐसा लगता है जैसे शब्द आपके इशारों पर नृत्य करते हैं।

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  27. गहरे भाव में उतरती क्षणिकायें..

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  28. धीरे-धीरे सरक कर
    सपनों के छोरों को जोड़ा है
    और अस्तित्व के गिने पन्नों में
    मैंने चोरी से कुछ को मोड़ा है

    गहन भाव लिये सुंदर क्षणिकाएँ.

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  29. बहुत ही सुन्दर क्षणिकाएं |

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  30. दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है
    सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला...

    बहुत खूब क्षणिकाएं...

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  31. शानदार और सराहनीय क्षणिकाएं.

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  32. निन्यानबे के चक्कर में डाले रहिये . अद्भुत सम्प्रेषण वाली क्षणिकाएं .

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  33. "धीरे-धीरे सरक कर
    सपनों के छोरों को जोड़ा है
    और अस्तित्व के गिने पन्नों में
    मैंने चोरी से कुछ को मोड़ा है"

    सुन्दर क्षणिकाएं...

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  34. सच को हरपल है झुठलाता ,
    है असत्य को गले लगाता ।
    यही दुर्नियति मनुज है रचता,
    निज हाथों है निज को छलता।

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  35. निन्यानवे का फेर हर शून्य के साथ बढ़ता जाता है !
    खूबूसरत क्षणिकाएं !

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  36. बहुत गहराई लिए कुछ साहसिक क्षणिकाएँ...

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  37. सभी सुन्दर लगीं ये वाली सबसे बढ़िया -

    अमानुषिक ऊँचाइयों की परछाईयाँ
    मैंने चतुराई से चापा है
    और हरेक चीज़ों को बस
    अपने सिर के हिसाब से नापा है

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  38. हम मन (माया) के जगत में यही तो करते हैं. हर चार पंक्तियों के बाद लगे तीन सितारे कविता को क्षणिकाएँ नहीं बना सके. यह भरे-पूरे रंगों वाली पूरी कविता है और बहुत ही खूबसूरत.

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  39. दो जोड़ दो को हरबार
    मैंने तीन या पाँच कहा है
    और निन्यानवे का फेरा लगा-लगाकर
    शून्य से ही तिजोड़ी को भरा है

    ...बहुत खूब! सभी क्षणिकाएं लाज़वाब..

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  40. kshanikaon ke dwara bahut hi sundar prastuti ....abhar Amrita ji

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  41. क्षणिकाएँ ...

    क्षणों की लहरों ने तो
    विभीषिकाओं का पाठ पढ़ाया है
    पर मैंने भी हर लहर के लिए
    डांड तोड़ कर डोंगा बनाया है

    ***

    अमानुषिक ऊँचाइयों की परछाईयाँ
    मैंने चतुराई से चापा है
    और हरेक चीज़ों को बस
    अपने सिर के हिसाब से नापा है

    ***

    धीरे-धीरे सरक कर
    सपनों के छोरों को जोड़ा है
    और अस्तित्व के गिने पन्नों में
    मैंने चोरी से कुछ को मोड़ा है

    ***

    दो जोड़ दो को हरबार
    मैंने तीन या पाँच कहा है
    और निन्यानवे का फेरा लगा-लगाकर
    शून्य से ही तिजोड़ी को भरा है

    ***

    आईने में जैसी भी तस्वीर मिली
    मैंने बस उसी को जाना है
    ओर पीछे पुता कलई ने जो कुछ कहा
    उसी को आँख बंद करके माना है .

    बहुत उत्कृष्ट भाव /विचार कणिकाएं .अमृता जी ईकारांत बहुवचन में इकारांत हो जाता है -भाई से भाइयों ,दवाई से दवाइयों ,परछाईं से परछाइयों हो जाएगा .

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  42. बहुत उत्कृष्ट भाव /विचार कणिकाएं .अमृता जी ईकारांत बहुवचन में इकारांत हो जाता है -भाई से भाइयों ,दवाई से दवाइयों ,परछाईं से परछाइयों हो जाएगा .


    आईने में जैसी भी तस्वीर मिली
    मैंने बस उसी को जाना है
    ओर पीछे पुता कलई ने जो कुछ कहा
    उसी को आँख बंद करके माना है .और पीछे पुता कलई ने जो कहा कर लें .

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  43. दो जोड़ दो को हरबार
    मैंने तीन या पाँच कहा है
    और निन्यानवे का फेरा लगा-लगाकर
    शून्य से ही तिजोड़ी को भरा है

    इसी फेर में दुनिया बाज़ार हुई जा रही है। हम केवल जोड़ तोड़ में ही लगे हैं। सत्य को अनावृत्त करती एक सामयिक रचना। मेरी बधाई अमृता जी।

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  44. सभी तो व्यवहार-कुशल नहीं होते न !

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  45. सराहनीय क्षणिकाएं सभी क्षणिकाएं एक से बढ़कर एक

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  46. आज आपके ब्लॉग पर बहुत दिनों बाद आना हुआ अल्प कालीन व्यस्तता के चलते मैं चाह कर भी आपकी रचनाएँ नहीं पढ़ पाया. व्यस्तता अभी बनी हुई है लेकिन मात्रा कम हो गयी है...:-)

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  47. दो जोड़ दो को हरबार
    मैंने तीन या पाँच कहा है
    और निन्यानवे का फेरा लगा-लगाकर
    शून्य से ही तिजोड़ी को भरा है..umda

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  48. व्यर्थ ही मिलती नहीं पीड़ा
    शैवाल तले बहती सदानीरा
    उपल के अवरोधों को सहती
    जल से ही जलधि है बनती
    अंजुली छोटी कर मत मन
    वेदना से तू , डर मत मन

    वाह, मन को सम्बल देती प्रेरक रचना. मन रे तू काहे न धीर धरे...

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  49. आ. अमृता जी आपकी क्षणिकाओं को
    एक शब्द में टिप्पण करने की जुर्रत की
    है ...

    1. पुरुषार्थ
    2. स्केल
    3. झिझक
    4. आंकड़े
    5. भक्ति

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  50. अमानुषिक ऊँचाइयों की परछाईयाँ
    मैंने चतुराई से चापा है
    और हरेक चीज़ों को बस
    अपने सिर के हिसाब से नापा है

    खूबूसरत, लाजवाब,सराहनीय.

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