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Thursday, April 8, 2010

कोई फर्क नहीं पड़ता

कोई फर्क नहीं पड़ता
कि हम कहाँ हैं
हो सकता है हम
आँकड़े इक्कठा करने वाले
तथाकथित मापदंड पर
ठोक-पीट कर
निष्कर्ष जारी करने वाले
बुद्धिजीवियों के
सरसरी नज़रों से होकर
गुजर सकते हैं
हो सकता है कुछ क्षण के लिए
उनकी संवेदना  तीक्ष्ण जो जाये
ये भी हो सकता है कि
उससे संबंधित कुछ नए विचार
कौंध उठे उनके दिमाग में
समाधान या उसके समतुल्य
ये भी हो सकता है कि
बहुतों का कलम उठ जाये
पक्ष -विपक्ष में लिखने को
अपनी कीमती राय
कर्ण की भांति दान देते हुए
पर जिसका चक्रव्यूह
उसमें फंसा अभिमन्यु वो ही
महारथियों से घिरा
अपना अस्तित्व बचाने को
पल प्रतिपल संघर्षरत
आखिरी साँस टूटते हुए उसे
दिख जाता है
विजय कलयुग का .

7 comments:

  1. bheed me hokar bhi
    akela
    yahi niyati
    ban gayi aaj
    manushya kahe jane vale
    janvar ki
    sab lage hain apni-apni
    udar purti me
    koi fark nahi padta
    iske liye
    chahe katna pade
    sahodar ya
    sahodari ko

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  2. कल 13/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. तो यह है प्रस्थान बिंदु एक आशापूर्ण और ऊर्जित यात्रा का ....

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ..

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  5. यकीनन ...कोई फर्क नहीं पड़ता..

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  6. बुद्धिजीवी सिर्फ कलम उठा लें
    रथ के चके उठाने
    कोई ने कोई आयेगा
    और अभिमन्यु.......

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  7. बस ऐसा ही साधन हो कि चक्रव्यूह का फर्क न पड़े ..सुन्दर प्रस्तुति ..

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