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Monday, January 20, 2014

जा सखी , अब तू अपने घर जा ! .....

                  लागे है मुझ को बड़ा आन सखी !
                उसको मत कहना तू पाषाण सखी !
               इस मंदिर का है वही भगवान सखी !
                उससे ही तो है मेरा ये प्राण सखी !

                    तू उसकी ऐसी हँसी न उड़ा
                 जा सखी , अब तू अपने घर जा !

                  लुटे-लुटे से पुलक है निशदिन
                  ठगे-ठगे से प्राण है पल-छिन
                 पर मेरे काँटों को तू न यूँ गिन
               औ' न ही अश्रु-पुष्पों को भी बिन

                 मेरी व्यथा से तू न तिलमिला
               जा सखी , अब तू अपने घर जा !

               कितने ही यत्न से छुपाये रखती हूँ
              इस जलते ह्रदय को बुझाये रखती हूँ
              भींगी पलकों को भी सुखाये रखती हूँ
             देख , अधरों को भी मुस्काये रखती हूँ

                  मेरे माथे पर तू हाथ न फिरा
               जा सखी , अब तू अपने घर जा !

                ऐसे मत दे उसको तू ताने सखी !
              मेरे होने का है वही तो माने सखी !
             बड़ी मीठी प्रीति है तू न जाने सखी !
             सच कहती हूँ मैं क्यों न माने सखी !

                 ये राग ही तो है कठिन बड़ा
             जा सखी , अब तू अपने घर जा !

                 इक मदिर अदह आग -सा वह
               अछूता सुमन का पराग -सा वह
             मधुमास में महकता फाग -सा वह
           औ' मन के मधुगान का राग -सा वह

                 कुछ कह कर तू मुझे न बहका
                जा सखी , अब तू अपने घर जा !

                 उसके आगे तो सब रंग हैं फीके
                तृप्त होती मैं उसी का जल पीके
                हाय! मर जाती मैं उसी में जी के
                पर चुप ही रहती अधरों को सी के

                  न बहलूं मैं , मुझे यूँ न बहला
                जा सखी , अब तू अपने घर जा !

                 मधु से मुझे नहलाता वही सखी !
                 मुझपर रस बरसाता वही सखी !
              इस देह-बंध को खुलकाता वही सखी !          
              औ' प्रेम-गंध से लिपटाता वही सखी !

                   जलन के मारे तू यूँ न बुदबुदा
                 जा सखी , अब तू अपने घर जा !

                  लागे है मुझ को बड़ा आन सखी !
                उसको मत कहना तू पाषाण सखी !
               इस मंदिर का है वही भगवान सखी !
                 उससे ही तो है मेरा ये प्राण सखी !

                  विरह की जली मैं और न जला
                 जा सखी , अब तू अपने घर जा ! 

31 comments:

  1. सखी के माध्यम से सुन्दर कविता |आभार

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  2. सन्देश में पिरोये मन के भाव......

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  3. सुन्दर मनोभाव-
    सखी को भी बधाई-
    आभार आदरेया-

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  4. उसके ऐसे-ऐसे आयाम तुममें, तो फिर विरह के क्‍या मायने!......झंकृत हुआ।

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  5. बहुत सुंदर विरह गीत की प्रस्तुति .....

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  6. अद्भुत भाव ...गहन पीड़ा ...बहुत सुंदर रचना अमृता जी

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  7. सुंदर अभिव्यक्ति...

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  8. जो ले दिल की बात सुन
    वो बहुत प्यारी है रे सखी

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  9. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति !

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  10. दिल को छू लेनेवाली रचना...
    अति उत्तम...
    http://mauryareena.blogspot.in/
    :-)

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  11. ऐसे मत दे उसको तू ताने सखी !
    मेरे होने का है वही तो माने सखी !
    बड़ी मीठी प्रीति है तू न जाने सखी !
    सच कहती हूँ मैं क्यों न माने सखी !

    ये राग ही तो है कठिन बड़ा
    जा सखी , अब तू अपने घर जा !
    वाह परमपिता को समर्पित सुंदर रचना न मानने वालों को न मानते हुए।

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  12. बहुत सुंदर भावों से गूंथा है अमृता जी आपने यह विरह गीत ....
    उतनी ही सुंदर अभिव्यक्ति

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  13. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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  14. विरह सहती, पर मन की कहती

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  15. जो पास रहकर भी दूरी का अहसास कराए वही तो है वह...

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  16. http://bulletinofblog.blogspot.in/2014/01/blog-post_21.html

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  17. हिमशैल क्या जाने तपने का गुण. अग्नि के पखारे जीवन की आभा सब देख भी नहीं सकते. अति सुन्दर सन्देश.

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  18. सखी री तूने तो कमाल कर दिया :-)

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  19. नहीं कहते पाषाण चलो !
    सुन्दर !

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  20. वाह ! बहुत ही सुन्दर रचना ! विरह, मिलन, पीड़ा, संताप, मान, अभिमान, भक्ति, आसक्ति, मन के हर भाव को समूर्त कर दिया आपने रचना में ! मर्मस्पर्शी एवं आत्मीय सी रचना ! आभार !

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  21. संध्या जी ने सच कहा .........

    सखी के बहाने सब कुछ समाहित कर के कह दिया !! सुंदरतम !!

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  22. ये तो पार्वती और सप्तऋषियों का संवाद हो गया -जो शंकर के प्रति पार्वती के अनन्य अनुराग की परीक्षा लेने गए थे -मगर पार्वती अटल और निश्चल थीं अपने शिव -अनुराग को लेकर !
    धन्य है कवयित्री का प्रेम ,उसका ईर्ष्या उपजाता आराध्य !

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  23. सुंदर अभिव्यक्ति...

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  24. मन के भावों को बहुत ही खूबसूरती से कविता रूप में पिरो दिया है आपने मन के हर एहसास हर जज़्बात से जुड़ी बहुत ही सुंदर रचना।

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  25. ढ़ेर सारे ईमानदार शब्दों के बीच... एक अबोध काव्य... न जाने क्यों ह्रदय को बेचैन करती हुई....पर आप पर गर्व पहले भी था.. अब भी है... हमेशा रहेगा....

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  26. ये आपकी सखी है कौन? अच्छा हुआ आपने उनकी बात नहीं मानी -भला हो आपकी सद्बुद्धि का अन्यथा एक सखी की बात कैकेयी ने मान ली थी और राम को वैन जाना पड़ गया था !

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  27. रोचक -प्रभावशाली
    बहुत सुंदर---!!!!!

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  28. नायिका के भावों के साथ सखी के भावों का सुंदर मिश्रण हुआ है. एक गीति नाटिका-सा रस आता है.
    "देख , अधरों को भी मुस्काये रखती हूँ"
    क्रिया का ऐसा प्रयोग पहली बार देखा है जो सीधी अभिव्यक्ति करता है. बधाई.

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