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Friday, September 27, 2019

तो जाओ , तुम पर छोड़ा ..........

जब जाना ही है तो
विदा न लो , सीधे जाओ
हम रोये या गाये
पत्थर- सा हो जाओ
चुप रहो , कुछ नहीं सुनना
लो , प्राण खींच ले जाओ
अब हमारा ही है भाग्य निगोड़ा
तो जाओ , तुम पर छोड़ा ......

छोड़ो भी , इन आहत आहों को
कस के बाहों में न भरो
असह , असहाय अँसुवन से
बह- बह के बातें न करो
सिसकी का मन जैसे सिसके
न बोलेगी कि तुम ठहरो
सब वचन भुला तुमने मुख मोड़ा
तो जाओ , तुम पर छोड़ा .....

क्यों बोले थे
इस तरह से छोड़ कर
कभी तुम न जाओगे
पल -पल के उपहार को
सारी उमर लुटाओगे
सप्तपदी के सौगंधो को भी
जन्मों - जन्मों तक निभाओगे
सारा भरम तुमने ऐसे तोड़ा
तो जाओ , तुम पर छोड़ा .....

जब जाना ही था तो
बिन बताए चले जाते
न ऐसे तुम भी रोते
न ही हमको रुलाते
इस विदाई बेला की पीड़ा पर
तनिक भी तो तरस खाते
हम नहीं बनते राह का रोड़ा
तो जाओ , तुम पर छोड़ा ......

क्यों हमसे विदा लेकर
तुम्हें दूर जाना है
या दूर जाने का
कोई और बहाना है
जल्दी ही आओगे कह कर
बस यूँ ही फुसलाना है
चलो माना , विरह विपुल है मिलन थोड़ा
तो जाओ , तुम पर छोड़ा ....

बरबस भींचोगे ओठों को
मचलेगा जब अंगारा- सा चुंबन
झुठला देना , जब दहकेगा
ज्वाला- सा अलज्ज आलिंगन
पर कैसे रोकोगे जब
रति- रस चाहेगा तन- मन
कुछ इतर ही ने है हमें जोड़ा
तो जाओ , तुम पर छोड़ा ......

उड़ो , ऊँचाई पर उड़ो
अपने सारे पंख पसार कर
जग को जीत भी गये तो
यहीं आओगे स्वयं से हारकर
हमारा क्या , इन चलती साँसों के संग
रहना है बस तेरे लिए , मन मार कर
निष्ठुर , निर्दय , मिर्मम , निर्मोही , निखोड़ा
तो जाओ , तुम पर छोड़ा .



Thursday, September 19, 2019

मत करो विवश .......

मत करो विवश
कहने को
झिझक की कँटीली राह की
लड़खड़ाती हुई कहानी
गहरे अँधियारे को चीर कर
अतल तक डुबाती है
स्मृतियाँ नई - पुरानी ......

मत जगाओ
हृदय में सुप्त है
व्यग्र , व्यथातुर व्याकुलता
विषम संघर्ष है
है बूझहीन
अनायत आतुरता ......

मत बतलाओ
तुमसे ही
कल्पित , अकल्पित जो सुख मिला
मेरे जीवन की
सहज ही
विकसित हुई हर कला .....

मत दोहराओ
मधुमय अधरों से
बहती रही जो मधुर धारा
मिलन के अमर क्षणों का
वो सुहावना गीत प्यारा .....

अब अपने
इसतरह होने का
क्या आशय बताऊँ
या क्षितिज पर
अटकी साँसों का
केवल संशय सुनाऊँ .....

न जाने
जीवन ही
क्यूँ इसतरह मौन है
और सन्नाटे के
टूटे छंदो को
सुनता कौन है ?

व्यर्थ की दुष्कल्पनाओं से
अनमनी हूँ मैं
मत झझकोरो मुझे
अपनी ही चुप्पी से
कनकनी हूँ मैं .....

जानती हूँ मैं
मेरा ये निष्ठुर व्यवहार है
क्या तुम्हें
ये अति स्वीकार है ?

तुम तक
जो न पहुँचे
कुछ ऐसी ये पुकार है
भूल मेरी है
ये प्रतिकूल प्रतिकार है ....

मत करो विवश
कहने को
इस चुप्पी की
विरव कहानी
नहीं कहना मुझे
कि कैसे सोखे रखा है
मैंने अपने ही
समंदर का सारा पानी .