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Saturday, December 29, 2018

संतों ! संत हुई मैं .......

रोआँ - रोआँ हुआ कवि
साँस - साँस कविता
अब तुझको कैसे मैं कहूँ ?
आखिर , अकिंचन आखर की
है अपनी भी , कुछ विवशता !

ये विवशता भी बड़ी निराली है
जिसको जी कर , जीती ये शिवाली है
चाहो तो , मौन से आखर महकाओ
या आखर को मूक बनाओ
ये समरसता तुझपर बलिहारी है !

बना कर अपनी पोगड़िया
ले लिया सब लकुटी - कमरिया
धड़कन के मँजीरा पर अब
नचाओ , मुझे खूब नचाओ
पहना अपनी धानी लहरिया !

चतुर हुई , निश्चिंत हुई मैं
ना डोलूँ अब , संत हुई मैं
संतो ! समझ सको तो समझ लो
मेरे अकिंचन आखर की विवशता
कह कर , ना कह कर भी अनंत हुई मैं !

संतों ! संत हुई मैं .

Sunday, April 29, 2018

स्वार्थ ........

मेरे लिए मेरी हर रात महाभिनिष्क्रमण है
और मेरा हर दिन महापरिनिर्वाण है
स्वअर्थ में अपना दीप मैं स्वयं हूँ
बस इतना ही ध्यान है , इतना ही भान है ...

जहाँ सस्ती से सस्ती बोली में बिकती स्वतंत्रता है
चारों ओर एक गहन संघर्ष है , खींचातानी है
वहाँ जीवन में स्वयं का बड़ा भाव भी बड़ा न्यून है
और परतंत्रता में ही सबसे बड़ी बुद्धिमानी है ....

कल तक उधार में जो मैंने लिया था
वो बहुत ही सुंदर शब्दों का भरा- पूरा संसार है
पर अब हर क्षण अपने ही स्वार्थ में ही सधना
मेरे मौलिक होने का मूल आधार है ...

दूसरों को कारण बना स्वयं विचलित होना
अब मेरे लिए अहितकारी है , अशुभ है
आत्मानुभूति और आत्माभिमान के आलोक में रहना
परम दुष्कर तो है पर मेरे लिए शुभ है ....

केवल अपने अर्थ की महत्ता को समझकर ही
सहज रूप से स्वयं के सत्य को पाना है
उसी स्वार्थ में ही तो परार्थ का प्रज्वलित दीप है
अपना दीप स्वयं होकर ही मैंने जाना है .


*** अपना अर्थ स्वयं पाना है ***
*** अपना दीप स्वयं जलाना है ***
*** अपना बुद्ध स्वयं जगाना है ***
      *** शुभकामनाएँ ***

Wednesday, April 18, 2018

तुझको सौंपे बिना ....

तुझसे ही है क्यों अनलिखा अनुबंध ?
तुझको सौंपे बिना जो जिऊं
मुझको है सौगंध !

जब केसर रंग रंगे हैं वन
सुरभि- उत्सव में डूबा है उपवन
गंधर्व- गीतों से गूँजे ये धरती- गगन
दूर कहीं अमराई में जो कोयल कूके
तो क्यों न गदराये मेरा सुंदर तन- मन ?

तुझसे ही है क्यों अनजाना आबंध ?
तुझको सौंपे बिना जो रहूं
मुझको है सौगंध !

पुलकमय हर अंग है होने को समर्पित
देखो , प्राण का यह दीप है प्रज्वलित
अंतर पिघल हो रहा आप्लावित
कान अपना ध्यान हर आहट पर लगाये
तो क्यों न पलक पांवड़े बिछाऊं ओ ! चिर- प्रतीक्षित ?

तुझसे ही है क्यों अनकहा उपबंध ?
तुझको सौंपे बिना जो झड़ूं
मुझको है सौगंध !

स्वीकार करो ओ ! मनप्रिय अज्ञात प्रीतम
अंगीकार करो ओ ! तनप्रिय अतिज्ञात प्रीतम
उद्धार करो ओ ! हृतप्रिय अभिज्ञात प्रीतम
तुझे छू हुआ मन धतूरा , सुरती धड़कन व कर्पूरी तन
तो क्यों न सौगंध लूं ओ ! आत्मप्रिय ज्ञात प्रीतम ?

तुझसे ही है क्यों अनदेखा संबंध ?
तुझको सौंपे बिना जो मरूं
मुझको है सौगंध !


Wednesday, April 4, 2018

जो थोड़ा- सा .........

जो थोड़ा- सा
संसार का एक छोटा- सा कोना
मैंने घेर रखा है
वहाँ मेरे बीजों से
नित नये सपने प्रसूत होते हैं
मेरी कलियों में
नव साहस अंकुरित होता है
तब तो मेरा फूल
पल प्रति पल खिलता रहता है .......

जो थोड़ी- सी
मेरी सुगंध है , वो उड़ती रहती है
जो थोड़ा- सा
मेरा रंग है , वो बिखरता रहता है
जो थोड़ा- सा
मेरा रूप है , वो निखरता रहता है
तो और बीजों को भी
थोड़ी- सी स्मृति आती है
और उनकी कलियाँ
उत्सुक हो साहस जुटाती हैं
और फूल भी पंखुड़ियों को
थोड़ा और , थोड़ा और फैलाते हैं
जो थोड़ा- सा
मेरा संसार है , उसमें
कितने ही फूल खिल जाते हैं .......


बाँध हृदय का तोड़ कर
बह चलती है एक प्रेमधारा
और जल भरे सब मेघ काले
मुझ पर झुक- झुक कर
पाते हैं सहर्ष सहारा
थोड़े चाँद- तारे भी
खिल- खिल जाते हैं
थोड़ा धरा- अंबर भी
भींग- भींग जाते हैं
जो थोड़ा- सा
मेरा संसार है , उसमें
सुख की वर्षा होती है .......

जो थोड़ा- सा
संसार का एक छोटा- सा कोना
मैंने घेर रखा है
वहाँ मैं ही अंतः रस हूँ
और मैं ही हूँ अंतः सलिला
मैं जो स्वयं को सुख से मिली
तो सब सुख सध कर स्वयं ही मिला
तब तो
मेरे फूल के संक्रमण से
और फूल भी
स्वतः सहज ही है खिला .

Monday, January 1, 2018

यदि मैं भी कभी गुनगुना दूँ .......

बड़ा सुख था वीणा में
पर उत्तेजना से
फिर पीड़ा हो गई ......
संगीत बड़ा ही मधुर था
सुंदर था , प्रीतिकर था
हाँ ! गूँगे का गुड़ था
पर आघात से
फिर पीड़ा हो गई .....
तार पर जब चोट पड़ी
कान पर झनकार था
शब्दों के नाद से
हृदय में मदभरा हाहाकार था
पर चोट से
फिर पीड़ा हो गई .......
अनाहत का संगीत
अब सुनाओ कोई
चोट , आघात से भी
अब बचाओ कोई .....
न उँगलियाँ हो , न ही कोई तार हो
न ही उत्तेजना का कोई भी उद्गार हो
उस नाद से बस एक ओंकार हो
शून्य का , मौन का वही गुंजार हो .....
अनंत काल तक जिसे मैं
सुनती रहूँ , सुनती रहूँ
यदि मैं भी कभी गुनगुना दूँ
तो तुम्हें भी
उसी झीना - झीना ओंकार में
अनंत काल तक मैं
बुनती रहूँ , बुनती रहूँ .