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Thursday, January 28, 2016

कल -कविता .......

इछुड़े - बिछुड़े से मेरे शब्द हैं सारे
अटक -भटक कर फिरे मारे -मारे
ना कोई ठौर है , रहे किसके सहारे ?
भड़क - फड़क कर बहे भाव भी हारे

कितनी ही कविता हर क्षण गाती हैं
मेरी व्याकुलता को ही बस बढ़ाती हैं
और मुझमें ही ऐसे क्यों खो जाती हैं ?
जो शब्दों को तनिक छू नहीं पाती हैं

बड़ा असमंजस है , क्यों ह्रदय है रोता ?
वही अस्फुट गूँज है ,ओ' नयन न सोता
हर सुबह सांवली साँझ में पुनः है खोता
पर कभी कविता से मेरा साक्षात न होता

छंद की बहु-श्रृंखंलाएं ऐसे क्यों हैं टूटी ?
ज्यों कि गगरिया चाक पर ही हो फूटी
ज्यों कि विरहिणी से लगन ही हो रूठी
ज्यों कि चातकी से रटन ही हो यूँ छूटी

जबसे मेरी कविता ने मुझसे है मुँह फेरा
अनंत सा बन गया है सब द्वंद्व ये मेरा
हाँ सीमित होकर मैंने ही है स्वयं को घेरा
हाय! कहाँ गया वो मदिर -मधुमय डेरा ?

तब तो कोंपल से कसक के कुम्हलाती हूँ
विहगों के विहसन से विकल हो जाती हूँ
क्यों विमूर्छित मन को मैं न समझाती हूँ ?
और बसंत के गंध को भी यूँ ही लौटाती हूँ
 
संभवत: कह रहा हो बसंत कि गंध को अब मत लौटाओ
मंजरियों के संग महक कर , मंद -मंद ही मगर मुस्काओ
कितने दिन हैं बीते , स्वयं बन कर एक प्रारम्भ फिर आओ
ओ' कल-कल करती कविता न सही 'कल -कविता' ही गाओ .