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Monday, February 24, 2014

उसकी मुक्ति तो...

वह प्रकृति के
ज्यादा करीब है
थोड़ी प्राकृतिक है...
शास्त्रों/सिद्धांतों से
थोड़ी दूर है
कम शिक्षित है...
बुद्धि की भाषा
पढ़ना नहीं चाहती
कम बौद्धिक है...
तर्को/झंझटों से
भागती रहती है
कम सभ्य है...
इसलिए उसे
रोना होता है
तो रो लेती है
हॅंसना होता है
तो हँस लेती है
थोड़ी जंगली है...
बोलना होता है
तो बोल देती है
चुप रहना होता है
तो चुप रहती है
थोड़ी मूर्ख है...
सामाजिकता के हर
कठोर नियम को
बार-बार तोड़कर
वह मुक्त होती है
व अप्राकृतिक सभ्यता को
बार-बार अंगूठा दिखा
सबको मुक्त करती है
क्योंकि वह मुक्त है ...
जो बँधे हैं
बाँधते रहे उसे
अपने किसी भी
सही-गलत उपाय से
पर उसकी मुक्ति तो...

Wednesday, February 19, 2014

तो क्या हुआ ?

अगर तेरे बहते पवन से
थोड़ा आगे उड़ लेती हूँ तो क्या हुआ ?
या तेरे जलते अगन से
थोड़ा ज्यादा दहक जाती हूँ तो क्या हुआ ?
या तेरे उठते लहर से
थोड़ा ऊपर उछल लेती हूँ तो क्या हुआ ?

तुम उन्मादिनी कहो
या उद्रिकत मर्दिनी कहो मुझको
मदमादिनी कहो
या तारुण्य की तरंगिनी कहो मुझको
कम्पित विडम्बिनी कहो
या विच्युत पंकिनी कहो मुझको
निर्विशंक लुंठिनी कहो
या विधि-वंचिनी कहो मुझको
निर्हेतु नहीं है तेरा कुछ भी कहना
और निर्वाक होकर
तेरे उत्तापित स्वरों को मुझे है सहना
पर तेरे अदेह की विभा में मुझे
बस औचक झलक बन है रहना
क्योंकि आज मिट्टी में गड़ी हुई
मैं तुम्हारी ही मूल हूँ
ओ! मेरे आकाश-फूल
तुम कहीं भी खिले रहो
पर तेरे सौरभ की ही तो मैं
वही सुकुमार भूल हूँ.....

सोचती हूँ
जो-जो मैं तुमसे कह नहीं पाती
या कहना ही नहीं चाहती
वह मेरा रहकर रहस्य हो जाता है
अपने इस संकल्प या संयम से
मेरी निगूढ़ निधि बढ़कर
निरतिशय विकल्प बन जाता है
पर तुम तो अपने
उन अरक्षित क्षणों में ही
मुझसे वो-वो कहला लेते हो
मैं गहराई से अपनी मिट्टी को
पकड़ी रहूँ तो भी मुझे
इधर-उधर टहला देते हो
और मुझमें क्षण-सा झलक कर
मुझे ही ऐसे बहला देते हो.......

तब तो बड़ा कठिन है
तेरे मौन से साक्षात्कार करना
उससे भी कठिन है
तेरे निराकार निशब्दों में
अपने शब्दों का आकार देना
और अत्यंत कठिन है
अपनी क्षुद्र सुखों में रहकर
तुझे अपना ही विकार देना.....

जब तेरी एक किरण को पकड़ कर
मैं तुझ तक कैसे भी आ सकती हूँ
उन्मादिनी , मदमादिनी , मर्दिनी होकर भी
तुझे मैं कैसे भी गा सकती हूँ
तो उलझाये रहो अपने बादलों से
या भागते रहों चाहे दूर-दूर
तुझे पाना है तो पाना है
और मुझे पता है
मैं पंकिनी , वंचिनी या लुंठिनी होकर भी
तुझे बस तुझे पा सकती हूँ .


Saturday, February 8, 2014

अँधेरे का एक टुकड़ा...

जो कभी
अपनी विस्मरणशीलता को
स्मृत करके
और अपने दीया-स्वरुप से
क्षीण ज्योति ले करके
चलना चाहती हूँ तो
नींद से उठकर मेरी ही सक्रियता
मुझे ही कभी तेज चलाकर
या बंद आँखों में ही भगाकर
अपने स्वभावगत सहजता को
गहरे नशे में खोती है....
तब मुझे अहसास होता है कि
वो दीया या ज्योति
वास्तविक नहीं बल्कि आभासी है
और सुनी-सुनाई या रटी-रटाई
आप्त-ज्ञान की बातें
एकदम से विपर्यासी(झूठा ज्ञान) है ....
इसलिए मैं
अपने ह्रदय में
अँधेरे का एक टुकड़ा
सदा साथ लिए चलती हूँ
फिर तो दिन क्या रात क्या
सपनों के साम्राज्य में भी हर समय
जागकर देखना पड़ता है
कि मेरे किये से कुछ नहीं होता है
और तो और मैं
बस करवट पर करवट ही बदलती हूँ....
जब उतेजना की हालत में
चारों ओर की स्थितियों को
चुपचाप सहने में
बिलकुल समर्थ नहीं होती हूँ
या प्रशंसा से अपमान तक के
हर छोर पर विक्षिप्त होकर
उग्र प्रतिक्रया करने लगती हूँ तो
साकार होकर मेरा अन्धेरा
थोड़ा सा मेरा प्रकाश बन जाता है
और सम्भव होकर
मुझसे उघड़ता हुआ मेरा अन्धेरा
मुझे ही ऐसे उघाड़ देता है कि
तत्क्षण ही खुद को ढ़कने का
मेरा छोटा सा ही प्रयास ही
अपना छोटा सा ही प्रकाश का
बड़ा आड़ देता है.....
इसलिए तो
वो अन्धेरा भी मेरा है
और वो उजाला भी मेरा ही है....
तब तो
अपने ह्रदय में
अँधेरे का एक टुकड़ा
सदा साथ लिए चलती हूँ
और सहज रूप से उसे ही
पलट कर अपना प्रकाश भी
बना लेती हूँ .