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Tuesday, May 6, 2014

आग चाहिए ......

                  और ये चिलम सुलगता रहे
                  इसके लिए तो आग चाहिए
                   होश पूरी तरह से खोना है
                   तो भी एक जाग चाहिए

                   ये न जन्नत में मिलती है
                    न ही जलूम जहन्नुम में
                   न ही मदहोश महफ़िल के
                तराशा हुआ किसी तरन्नुम में

                  गर तरस कोई खाये भी तो
                   कर्ज़ बतौर दे नहीं सकता
                 कमबख़्त चीज ही ऐसी है कि
                 कसम दे कोई ले नहीं सकता

                  ये एक तल्ख़ तलब है हुजूर
               जो तबियत लगाने से मिटती है
                 जब तबियत कहीं लग जाए
                  तो ये खुद-ब-खुद जलती है

                   फिर तो ये जली हुई आग
                    किसी को क्या बुझाएगी
                    खुद धुआँ को जज्ब कर
                    बस रोशनी ही सुझाएगी

                  ये चिलम बस सुलगता रहे
                  उसके लिए तो आग चाहिए
                   होश पूरी तरह से खो जाए
                    तो भी एक जाग चाहिए.

28 comments:

  1. वाह !
    बहुत गहरी गहराई है
    बस चिलम सुलगाने
    के लिये आग लाई है
    फलसफा इतने तक
    बहुत अच्छा होता है
    कोयला ये ना कह बैठे
    सारी हो गई सफाई है । बहुत उम्दा ।

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  2. ये एक तल्ख़ तलब है हुजूर
    जो तबियत लगाने से मिटती है
    जब तबियत कहीं लग जाए
    तो ये खुद-ब-खुद जलती है

    बहुत खूब..जो खुद बखुद जले वही टिकती है..

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  3. ये आग बस अपने अन्दर ही होती है ... इसे जलाना भी खुद ही होता है ... और ये सच है की उसके लिए जागना पढता है ... लड़ना होता है ...

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  4. This comment has been removed by the author.

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  5. ये तल्ख़ तलब लगने में सदियों लग जाते हैं... बस जागने भर की देर है .....................

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  6. हो श पूरी तरह से खोना है
    तो भी एक जाग चाहिए
    ................. क्‍या बात है बहुत सही कहा आपने

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  7. ये एक तल्ख़ तलब है हुजूर
    जो तबियत लगाने से मिटती है
    जब तबियत कहीं लग जाए
    तो ये खुद-ब-खुद जलती है



    और वो सुलगती है तंबाकू की तरह
    ठूंस कर दबाई गई तल्खियां
    जिनका नशा ही दर्द से निजात दिलाता है
    नीम बेहोशी में लगता है कोई बुलाता है

    बेहतर अभिव्यक्ति

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  8. फिर तो ये जली हुई आग
    किसी को क्या बुझाएगी
    खुद धुआँ को जज्ब कर
    बस रोशनी ही सुझाएगी

    बहुत खूब ....दमदार अभिव्यक्ति

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  9. इस चिलम की सुलगन उस आग की देन ही तो है - धुआँ जज़्ब कीजिए , जगाए रहिए बराबर !

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  11. उद्वेलित करते भाव.......

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  12. चिलम के शौक़ीन तो बस यही कहेंगे कि आग जलती भी रहे, धुआँ भी उठता रहे..बस एक ‘साफी’ का इंतज़ाम हो जाये.

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  13. मिचमिचाये आँख कि बन्द हो मुठ्ठियाँ , आग जलती रहनी चाहिए !
    प्रेरक !

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  14. जब तबियत कहीं लग जाए
    तो ये खुद-ब-खुद जलती है

    बहुत खूब.....!!

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  15. http://bulletinofblog.blogspot.in/2014/05/blog-post_7.html

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  16. आग लगी है चिलम को खींचा जा रहा है पर जागरण में कमी दिखती है।

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  17. वाह-वाह क्या बात है। उम्दा रचना।

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  18. वाह बहुत लाजवाब रचना.

    रामराम.

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  19. बहुत खूब.....लाजवाब रचना.

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  20. वाह ! क्या बात है ! यह आग हर सीने में जलनी चाहिये जो हर दिमाग को रोशन कर सके ! एक बहुत ही सशक्त रचना !

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  21. ये एक तल्ख़ तलब है हुजूर
    जो तबियत लगाने से मिटती है
    जब तबियत कहीं लग जाए
    तो ये खुद-ब-खुद जलती है
    बहुत खूब। ये आग ही है जो कुछ कर गुजरने का जज्बा देती है।

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  22. वाह रे चिलम की आग !!

    सुंदर !! बेहतरीन !!

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  23. Waah waah kya nshe ki aalam hai mubarak
    .........

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  24. आग न हो तो शायद दुनिया के किसी भी शिखर को हासिल नहीं किया जा सकता..आपकी इस कविता को पढ़ दुष्यंत कुमार की कविता की पंक्तियां भी बरबस याद आ रही हैं- मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही..हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिये।। सुंदर प्रस्तुति।

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  25. तबियत से भी तल्ख तलब लगती है जिसका रूपक आपकी कविता में है.

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  26. आग तो है पर शायद उसे भड़काने के लिए हवा की कमी सी लगती है।

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  27. अच्छी रचना।

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