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Sunday, April 6, 2014

सौभाग्यशाली हूँ मैं...

मैंने पत्थरों को भी
ऐसे छुआ है जैसे
वह मेरा ही परमात्मा हो
उसके नीचे कोई दबा झरना
जैसे मेरी ही आत्मा हो
इस आंतरिकता में
मेरी चेतना का तल
सहज ही बदल जाता है
सौभाग्यशाली हूँ मैं
कि मुझे
उस पल का पता चल जाता है...

इस निर्मल बोध को
मुझमें प्रकटाने वाले
बिना धुंआ के ही
अपनी शिखा को जलाने वाले
और मेरे आधार पर ही
ऐसी ऊंचाइयां दिलाने वाले
अनन्य सहयोगी मेरे !
सौभागयशाली हूँ मैं
कि अब मेरी
तैरकर ऊपर आती आकांक्षा
अचेतन में डूबती जा रही है
सपनों की सजावट भी
मुझसे छूटती जा रही है
और कल्पना की निखार
जीवन-दृष्टि बन रही है...

सौभाग्यशाली हूँ मैं
कि मुझे
पत्थरों ने भी ऐसे छुआ है
जैसे मैं ही उनका परमात्मा हूँ
और मेरे नीचे मेरा दबा झरना
जैसे उनकी ही आत्मा हो
इस आंतरिकता में
चेतना के तल को
ऐसे बदलना ही था
और संवेदनशीलता के
सौंदर्य का पता चलना ही था...

अनन्य सहयोगी मेरे !
सौभाग्यशाली हूँ मैं
कि मुझे
चेतना का ऐसा तरल तल दे
अपने को छिपा लेते हो
और संकेतो में ही
सब कुछ कहलवा लेते हो
या तुम अपना पता
ऐसे ही बता देते हो....

अनन्य सहयोगी मेरे !
सौभाग्यशाली हूँ मैं...  

20 comments:

  1. जब कण कण में इश्वास का वास है तो हम भी तो उसी कण से उपजे हैं ... कौन किसके सहारे कहाँ तक आया ये तो माया है इश्वर की ...

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  2. विश्व से एकात्म होती चेतना।

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  3. मुझे तो खुद पता न था मैं इतनी खुशनसीब हूँ ....

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  4. विश्व के कण कण से तादात्म्य स्थापित कर लेना निश्चय ही सौभाग्य है...

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  5. विश्व के कण कण में ईश्वर है हम भी उसी का एक हिस्सा हैं..निश्चय ही हम सब भाग्यशाली हैं..

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  6. निर्मल मन संवेदनाओं से भरा होता है...बहुत सुंदर...

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  7. ओह. कितना सौन्दर्य, कितनी इच्छाएं, कैसा आत्मसंघर्ष, कितने भटकाव, कितनी व्यथायें, कितनी बंदिशें और क़दम-क़दम पर टूटे-बिखरे ख्वाब ! और इन सबके बीच एक चैतन्य निर्मल बोध.…

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  8. आनंदम आनंदम ...... अति सुन्दर

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  9. चेतना को ऊपर की ओर खिंचती कविता ।

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  10. ....
    और संवेदनशीलता के
    सौंदर्य का पता चलना ही था... साधो

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  11. अतिरेक की सुन्दर अवस्था जहाँ आत्मा और शरीर का एकीकरण हो जाता है, दोनों अविभाज्य हो जाते हैं । अति सुन्दर .सौभाग्यशाली हैं हम:)

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  12. सुन्दर भावाभिव्यक्ति । सुन्दर शब्द-विन्यास । प्रशंसनीय प्रस्तुति ।
    shaakuntalam.blogspot.in

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  13. कण-कण में चेतना की व्याप्ति का अनुभव ,उस महाचिति से जुड़ जाना ही तो है .

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  14. चेतना का द्वार, संवेदना का बड़ा एक उस पार संसार।

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  15. यूँ ही सातत्य बना रहे सौभाग्य का .

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  16. "सौभाग्यशाली हूँ मैं
    कि मुझे
    पत्थरों ने भी ऐसे छुआ है
    जैसे मैं ही उनका परमात्मा हूँ
    और मेरे नीचे मेरा दबा झरना
    जैसे उनकी ही आत्मा हो
    इस आंतरिकता में
    चेतना के तल को
    ऐसे बदलना ही था
    और संवेदनशीलता के
    सौंदर्य का पता चलना ही था..."

    सृष्टिक्रम का यह दर्शनगीत कई अर्थ छटाएँ देता है. ऐसी कविता कहना सबके बस की बात नहीं.

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  17. गहन और सुन्दर!

    सबकुछ तू है, सब विच तू, तेनू सब तो पाक पहचाना,
    मैं भी तू है, तू भी तू है, बुल्ला कौन न माना!
    मौका मिले तो बुल्लेहशाह का ये कलाम सुनियेगा, आपको पसंद आएगी।

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  18. कण कण में चेतना की व्याप्ति का भाव लिए अदबुद्ध रचना...

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