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Sunday, September 22, 2013

मोक्ष-मोह में ....

फिर पितर लोक में
उत्सवी चहल-पहल है ...
अगस्त्य मुनि पत्नी लोपामुद्रा के साथ
पिंडदानियों के सुन्दर स्वागत में
जी-जान से लग गये हैं
उनके लिए विशेष पैकेज की
विशेष रूप से व्यवस्था करवा रहे हैं...
पितृपक्ष मेला दुल्हन की तरह
सज-संवर रहा है....
प्रेतशिला पर्वत से लेकर तलहटी तक
पिंडवेदी पर कौवे मंडरा रहे हैं
और आत्माएं आस्था के ब्रह्मकुंड में
लगातार लग रही डुबकियों से
सांस नहीं ले पा रही है....
देवघाट के सामने बहती फल्गु
शापित होकर भी मोक्षदायिनी है...
गाय , तुलसी और ब्राह्मण
सबका मार्ग रोक- रोककर
बता रहे है मुक्ति का मार्ग
और असली नक्शा लिए बरगद
गद-गद है गर्दन हिला-हिला कर
पर उसका सच सुनने वाला कोई नहीं......
इस तर्पण-अर्पण में
सर्वकुल , नाम-गोत्र आदि
नोट से ही अपनी पहचान दे रहे हैं
उसी में भूल-चुक , क्षमा-प्राप्ति आदि का भी
प्रमुख प्रावधान सुरक्षित है
और सबके लिए स्वर्ग तो
बेटा पैदा होने के साथ ही आरक्षित है.....
जो होशियार व हाईटेक हैं
वे अपने घर में ही जीते-जी
माँ-बाप को नर्क-भोग करा रहे हैं....
वैसे भी आज न कल
इस पतित धरती का मोह
सबको छोड़ना ही होता है
इसलिए समय रहते ही वे
व्यावसायिक रूप से
अमानवीय व्यवहार को कैश करा कर
उन्हें जमीन-जायदाद आदि से
बेरहमी से बेदखल करके
गया का महात्म्य समझा रहे है.....
माँ-बाप भी हैं कि
अपने ही बच्चों की नजरों में
सबसे पहले नकारा होकर
अपने मोक्ष-मोह में
न जाने किस स्वर्ग के लिए
सीढ़ी पर सीढ़ी बना रहे हैं .

26 comments:

  1. अब समझी पितृ पक्ष का महात्म्य.....

    पैनी रचना..

    अनु

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  2. बस पेंशनधारी माँ-बाप को कुछ त्राण मिल जाता है. यहाँ तो बेटा-बेटी के हाथों स्वर्ग प्राप्ति की धारणा नहीं है लेकिन फिर भी स्वर्ग चाहना के जो हथकंडे अपनाये जाते हैं वो देखकर हतप्रभ हो जाता हूँ (हास्यास्पद भी है). स्वर्ग चीज ही है ऐसी.चाह है कि जाती नहीं.

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  3. पितृमोक्ष से मृतआत्मा को शांती मिलती है,,,

    RECENT POST : हल निकलेगा

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - सोमवार - 23/09/2013 को
    जंगली बेल सी बढती है बेटियां , - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः22 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra





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  5. पितृ श्राद्ध्य कैसे होंगे जब जीवित बड़े-बूढ़ों की अनेक प्रकार से उपेक्षा हो रही हो।

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  6. बाजार में सब बिक रहा है, मुमुक्षु लोगों के लिए मोक्ष भी बिकता है !

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  7. बाजार में सब बिक रहा है, मुमुक्षु लोगों के लिए मोक्ष भी बिकता है !

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  8. आज की कर्म कान्डिय व्यावसायिकता पर बेहतरीन टिपण्णी।

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  9. आज की कर्म कान्डिय व्यावसायिकता पर बेहतरीन टिपण्णी।

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  10. संयुक्त परिवार का टूटना, बाजारीकरण और आधुनिकता या ऐसे ही अनेक कारणों से हमारा समाज अधपतन के रास्तों से गुजर रहा है। 'मोक्ष-मोह' के माध्यम से आपने वास्तव पर प्रकाश डाला है।

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  11. मोक्ष एक काल्पनिक तत्त्व है ,इसपर धंधे बहुत होता है - सटीक रचना
    Latest post हे निराकार!
    latest post कानून और दंड

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  12. पूरी कविता के बाद बरबस हँसी छूट गई. क्योंकि इस कविता में ऐसी सच्चाई ब्यान की गई है जो हम बूढ़े लोगों के मन के बहुत अनुकूल बैठती है- आशाओं और आशंकाओं दोनों के मामले में. बहुत खूब.

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  13. अमृता जी हैट्स ऑफ..... हैट्स ऑफ..... हैट्स ऑफ …… और शब्द नहीं है :-)))

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  14. बहुत सारगर्भित और सटीक चिंतन....

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  15. सार्थक एवं समसामयिक प्रस्तुति ।

    मेरी नई रचना :- चलो अवध का धाम

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  16. मूर्ख लोग मोक्ष की कामना करते हैं स्वर्ग में जाने अपनों के चले जाने की बात करते हैं स्वर्ग में जाना आवागमन के चक्कर में फंसे रहना है मुक्ति है भगवान् को प्राप्त होना। उसके गोलोक में दिव्य शरीर धारण कर गोपी भाव में रहना। बने रहना। ॐ शान्ति। बेहतरीन पोस्ट।

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  17. jite ji log apne mata pita ki seva kare to unko sukhad moksh milegi aur seva karne vaale ki agli pidhi bhi seva ka gun virasat me legi

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  18. देवघाट के सामने बहती फल्गु
    शापित होकर भी मोक्षदायिनी है...
    .........
    गया का महात्म्य समझा रहे है.....

    धारदार !!!!

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  19. शापित होकर भी मोक्षदायिनी है...
    बेहद गहन भाव लिये सशक्‍त अभिव्‍यक्ति

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  20. जीवित माता- पिता बोल सुनने को ही तरसे , बाद में जिमाये पकवान सारे !

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  21. कितना सटीक व्यंग्य है ...!!गहन एवं धारदार ....

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  22. आपके रचना पढने के बाद कुछ पंक्तियाँ याद आ गयीं ..कभी प्यासे को पानी पिलाया नहीं बाद अमृत पिलाने से क्या फ़ायदा ...महज एक रस्म रह गया है सब कुछ ...स्वर्ग तो धरती पर ही ..कुछ लोग इसका सुख भी भोग रहे हैं ,,,,बड़ी ही धारदार रचना ..अंदर तक झाँकने को बिबश करती है ..आपकी अगली रचना के इंतज़ार के साथ

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  23. जैसे जीवन यहाँ प्रताड़ित,
    कैसे माने, वहाँ सुखद हैं।

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  24. सटीक व्यंग्य.....

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