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Wednesday, February 20, 2013

जरा पूछना तो ...


जरा पूछना तो
बनजारिन-सी बसंती बयार से
कि यूँ लट लहराकर ,बलखाकर
बिंदिया , कजरा , महावर रचाकर
जोर-जोर से चूड़ियाँ खनकाकर
खुशबू-सा यौवन लुटाती हुई
अपने मोहक क्वांरी जाल में
किसे फंसाए फिर रही है ?

जरा पूछना तो
फगुनाई-सी फागुनी फुहार से
कि क्यों कभी आती-पाती खेलती है
तो कभी लुका-छिपी करती है
कभी फाहा-सा फहर-फहर कर
किससे हंसी-ठिठोली कर कर के
किसके बांहों को दहका जाती है ?

जरा पूछना तो
उन तितलियों के तकरार से
कि चुपके-से पनघट पर
जो गुलाबी धुप उतर आती है
तो ऐसा क्या कर जाती है कि
चुटकी में ही उनकी चुगली
क्यों उन्हें ही लड़ा देती है ?

जरा पूछना तो
इन फूलों के इकरार से
कि किसके लिए वे
पंखुड़ियों से पथ बुहारते हैं
और मंदिम-मंदिम मादक गान से
किसको पास बुलाते हैं
कि किरन-किरन चीर उतार कर
क्यों सबको ही लजा जाती है ?

जरा पूछना तो
हर साँझ के मनुहार से
कि किस मौन पाहुन से
मोरपंखी चाह लगा लेती है
चौंक-चौंक कर कभी चौक पूरती
कभी नये-नये बंदनवार बनाती
और सौंधी-सौंधी धानी पीर लिए
किसका बाट जोहती जाती है ?

जरा पूछना तो
हर सुबह के इनकार से
कि रात की बेचैन सिलवटों पर
क्यों है सतरंगी सपन खुमारी
कुछ कहती आँखें पर पलकें हैं भारी
और होंठों पर जो धरी उंगलियाँ
हौले-हौले हलचल करके
क्यों भोलेपन को भड़का जाती है ?

जरा पूछना तो
अपने भी इस हाल से
कि किसके लिए बौराया ,फगुनाया सा है ?
क्यों तिलमिल तारों पर टकटकी है ?
क्यों आतिश-अनारों सा कुछ फूटता है ?
क्यों कोई जादू-सा घेरे रहता है ?
क्यों वही मन में ही फेरे लेता है ?
क्यों हाल ऐसे बेहाल होता है ?
जरा पूछना तो .

40 comments:

  1. बसंतागमन पर एक बेहतरीन स्वागत गीत-मन आह्लादित तन पोर पोर उद्वेलित -पूछने की जरुरत ही नहीं :-)

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  2. सवाल बिलकुल वाजिब है :)

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  3. पुछने पर शायद जवाब मिले कि बसंत का असर है :):) सुंदर भावप्रवण रचना

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  4. बसंत का प्रभाव है,
    उसी के प्रवाह में बह रही है प्रकृति।

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  5. अमृता जी दिल बाग -बाग हो गया |आपकी कलम में वाकई अमृत है |

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  6. वाह-वाह बसंत की बयार का असर पूरी तरह शब्‍दों पर भी हो ही गया
    अनुपम प्रस्‍तुति

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  7. बहुत ही सुन्दर बसंत की बयार.

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  8. वसंत में सभी का मन उल्लसित रहता है ........अनुपम प्रस्‍तुति............

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  9. किससे पूछें.....कैसे पूछें....
    सभी तो बावले हुए जा रहे हैं.......
    :-)

    अनु

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  10. अद्भुत भाव ....गहराते रंग शब्दों के ...बसंती अमृतमई रचना ....

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  11. पंखुड़ियों से पथ बुहरे हुए हैं, बसंत अनुभव सुनहरे हैं।

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  12. जरा पूछना तो
    हर सुबह के इनकार से
    कि रात की बेचैन सिलवटों पर
    क्यों है सतरंगी सपन खुमारी
    कुछ कहती आँखें पर पलकें हैं भारी
    और होंठों पर जो धरी उंगलियाँ
    हौले-हौले हलचल करके
    क्यों भोलेपन को भड़का जाती है ?
    कविता पड़ने की समाप्ति के बाद ....कविता के समाप्त होना अच्छा नहीं लगता है .ऐसा लगता है की कोई धुन सपने में ले जाकर कहीं गूम गयी हो ....भाव की इस धरातल से लौटना अप्रिय सा लगता है.बहुत ही मधुर भाव sampresion . एक यादगार काब्य .बधाई.

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  13. ज़रा बताना तो शब्दों में इतना जादू कैसे आता है, क्या ऋतुराज ने सारे बासंती रंग आपकी कलम से बरसा दिए हैं ...मनभावन रचना... बहुत-बहुत शुभकामनायें

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  14. सिल्ली सांवली सी शबनमी हवा में सफ़ेद दुपट्टे पर रुई के फाहों जैसी गुलाबी धूप ...जरा ...

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  15. ्बासंती बयार का पूरा असर छाया है …………बहुत प्यारी रचना

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  16. बहुत सुन्दर अलंकारिक प्रस्तुति !

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  17. वाह वाह ...बहुत सुन्दर ...बेहद खूबसूरत चित्र तैयार किया है शब्दों के द्वारा।

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  18. फगुनाई की सुंदर छटा बिखेरती बेहतरीन कविता.

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  19. जरा पूछना तो
    हर साँझ के मनुहार से
    कि किस मौन पाहुन से
    मोरपंखी चाह लगा लेती है
    चौंक-चौंक कर कभी चौक पूरती
    कभी नये-नये बंदनवार बनाती
    और सौंधी-सौंधी धानी पीर लिए
    किसका बाट जोहती जाती है ?

    सुन्दर रचना
    साभार !

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  20. जरा पूछना तो मेरे मन से, इस बासंती असर ने कितना बावला कर दिया है इसे. :) बहुत सुन्दर..

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  21. वसंत का ही नाम आएगा , पूछना क्या है !
    मीठी - मधुर कविता !

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  22. वासंतिक छटा में डूबा परिवेश .....बहुत सुंदर

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  23. कविता के भाव एवं शब्द का समावेश बहुत ही प्रशंसनीय है

    हर शब्द शब्द की अपनी अपनी पहचान बहुत खूब

    बहुत खूब

    मेरी नई रचना

    खुशबू

    प्रेमविरह

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  24. बहुत प्यारी कोमल कविता. वसंत की मदमस्त फिज़ा... बधाई.

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  25. अंतस की बे -चैनी ,मन की बे -कलि ,प्रेमी के इंतज़ार का प्रकृति के मिस बेहतरीन चित्रण .प्रियतमा के मन का रचाव मुखरित है इस रचना में .मन प्रेम आप्लावित हो तो प्राकृति के तमाम उपादान भी बे

    -करारी में दीखते हैं .

    बड़ी मुद्दत से दिल की बे -करारी को करार आया है ,

    के जिस ज़ालिम ने तड़पाया उसी पे मुझको प्यार आया .

    शुक्रिया आपकी टिपण्णी का .कभी राम राम भाई पे भी पधारिये -

    Virendra Sharma ‏@Veerubhai1947
    ram ram bhai मुखपृष्ठ शुक्रवार, 22 फरवरी 2013 The boy who has eaten his own bedroom http://veerubhai1947.blogspot.in/
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  26. वसन्त आया है..जर्रा जर्रा कुदरत का महकाया है..इस बासंती मौसम का जादू सर चढ़ कर बोलता है और रची जाती है इतनी मधुर रचना..आभार इस सुंदर कृति के लिए..

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  27. ये मौसम ही कुछ ऐसा है कि ढेर सारे प्रश्न मन में उठते हैं ... और इनका समाधान पाने को मन बेचैन भी रहता है।

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  28. अद्भुत......सुन्दर.....मनमोहक.....

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  29. जरा पूछना तो
    उन तितलियों के तकरार से
    कि चुपके-से पनघट पर
    जो गुलाबी धुप उतर आती है
    तो ऐसा क्या कर जाती है कि
    चुटकी में ही उनकी चुगली
    क्यों उन्हें ही लड़ा देती है ?

    भावपूर्ण अभिव्यक्ति। धन्यवाद।

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  30. धूप और खुश्बू ,धुप और खुशबू की जगह लिखने से कहीं भी मीटर भंग नहीं होता .कृपया गौर करें ,समझें, मुनासिब तो .शुक्रिया आपकी इस खूब सूरत अनुभूत रचना का जो बेहद भाव सांद्रता लिए है .आपकी राम राम भाई पर टिपण्णी का .

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  31. अहा! मधुमय गीत , भिगो गया तन मन

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  32. बहुत उम्दा पंक्तियाँ ..... वहा बहुत खूब
    मेरी नई रचना
    खुशबू
    प्रेमविरह

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  33. जरा पूछना तो
    उन तितलियों के तकरार से
    कि चुपके-से पनघट पर
    जो गुलाबी धुप उतर आती है
    तो ऐसा क्या कर जाती है कि
    चुटकी में ही उनकी चुगली
    क्यों उन्हें ही लड़ा देती है ?

    इस बासंती बयार ने वाकई पूछने पर मजबूर कर दिया

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  34. बहुत ही बढि़या
    सारी पंक्तियॉं अच्छी हैं

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