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Tuesday, December 31, 2013

चलो याद करते हैं......

इस आत्म विसर्जक युग में
कुछ पल के लिए ही सही
चलो भूलते हैं
कल की सारी बातों को
व हर गहरी अँधेरी रातों को
और क़दमों को मिली हर मातों को.....
चलो भूलते हैं
अपने सजाये प्लास्टिक के फूलों को
व भेस बदल कर चुभते शूलों को
और पीछे पछताते सारे भूलों को......
चलो भूलते हैं
दीवारों में दबे अपने संसार को
व आँगन में उग आई हर बाड़ को
और धूप-छाँव से पड़ती हुई मार को.....
चलो भूलते है
दुःख के अपने सारे प्रबंधों को
व आधुनिकता से हुए अनुबंधों को
और बिखरे से हर संबंधों को....

इस उत्सव अनुप्रेरक युग में
कुछ पल के लिए ही सही
चलो याद करते हैं
आंसुओं में छिपे मधुर गीत को
हर मुश्किल में भी थामे मीत को
और उनका आभार प्रकटते रीत को....
चलो याद करते हैं
बेरुत ही फागुनी फुहारों को
उसमें झूमते-गाते खुमारों को
और प्यार के नख-शिख श्रृंगारों को.....
चलो याद करते हैं
उस शुद्ध सच्चे उल्लास को
व उसी से बंधी हर आस को
और चिर-परिचित हास-विलास को....
चलो याद करते हैं
प्राण से उठती शुभ पुकार को
व शुभैषी कामनाओं के उपहार को
और प्रणम्य सा सबों के स्वीकार को.....
चलो याद करते हैं .


         *** शुभकामनाएं ***

Monday, December 23, 2013

इतनी अकल तो....

आदमी में
इतनी अकल तो
जरूर है कि
जंगल होकर भी
आदमी की खाल
आसानी से
पहन सकता है
और अपनी
सभ्यता के बढ़ते
जंगली घास में
छोटा सा ही सही
बाड़ लगा सकता है
या इंसान बनकर
सभ्येतर दहाड़ों को
आगे बढ़कर खुद ही
पछाड़ लगा सकता है......
आदमी में
इतनी अकल तो
जरूर है कि
खून से सने
अपने जबड़ों को
कोमल पत्तियों से
बहला सकता है
और किसी
खरोंच की खोज में
झपटने को बेचैन
भीतर छिपे सारे
सांप-सियार
भेड़िया-गिद्ध को
किसी भी लोथड़े पर
यूँ ही टूट पड़ने से
बहुत हद तक
बचा सकता है.....
लगता तो है कि
आदमी में
इतनी अकल तो
जरूर है कि
वह स्वार्थ को
साधते हुए भी
पुरुषार्थ का खाल
आसानी से
पहन सकता है
और मन-ही-मन
अपना नाम
सिद्धार्थ रखकर
दिखावे के लिए
थोडा-बहुत ही सही
परमार्थ तो
जरूर कर सकता है
फिर अपने अनुसार
शब्दों का
शब्दार्थ भी
बदल सकता है........
तब आदमी क्या ?
और जंगल क्या ?
बस मौके-बे-मौके
पोल-पट्टी न खुले
इतनी उम्मीद तो
अब आदमी
अपने अकल से
जरूर लगा सकता है
और अपनी खाल में
पूरे जंगल को
किसी भी बाजार में
आसानी से
जरूर चला सकता है.......
आदमी में
इतनी अकल तो
जरूर है कि.......

Tuesday, December 17, 2013

क्षणिकाएँ ......

जैसे इस विराट अस्तित्व में
खोये को खोज लेने की
कोई युक्ति नहीं होती
वैसे ही जीवन को
समग्रता से जीने के लिए
सर्वमान्य कोई सूक्ति नहीं होती .

         ***

जैसे हजारों फूलों को
निचोड़-निचोड़ कर
उत्तम इत्र बनाया जाता है
वैसे ही जीवन की चुनौतियों को
बड़े ही प्यार से
मचोड़-मचोड़ कर
अपना मित्र बनाया जाता है .

         ***

जैसे सागर तक पहुँचने के लिए
नदी को किनारे से
बंधा रहना पड़ता है
वैसे ही लक्ष्य पाने के लिए
प्रत्येक कदम को
हर अगले कदम से
जोड़े रखना पड़ता है .

         ***

जैसे भूख मर जाती है तो
सुन्दर से सुन्दर भोजन भी
देखते-देखते मर जाता है
वैसे ही समय को
मलहम बना लेने पर
हरा से हरा घाव भी
पूरा ही भर जाता है .

         ***

जैसे धूल तलहटी में बैठती है
तो झरना फिर से
स्वच्छ और साफ़ हो जाता है
वैसे ही बौद्धिकता का
रंगीन आवरण हटाते ही
वही बुद्धू बच्चा सा मन
अपने आप हो जाता है .

Thursday, December 12, 2013

यह अंतर्वेदना कैसी है ? ....

यह अंतर्वेदना कैसी है ?
यह अनुताप कैसा है ?
वाणी-विहीन रंध्रों से फूटता
यह आकुल आर्द्र आलाप कैसा है ?

असाध्य क्लेश सा पीर क्यों है ?
नैन-कोर में ठहरा नीर क्यों है ?
अनमनी व्यथा की छटपटाहट
कुछ विरचने को अधीर क्यों है ?

कौन सी इच्छा भाँवरे भर
ऐच्छिक गति से होती मुखर
हत ह्रदय को मड़ोरता हुआ
क्यों टेर देता है कोई स्वर ?

कसकते हूक को शब्दों में कैसे ढालूं ?
या जी को बहलाने को क्या मैं गा लूं ?
बस मेरा वश मुझे ही बता दे
क्या मेरा है जो आज किसी को दे डालूं ?

विह्वल-सा यह वायु क्यों बहता ?
बिंध-बिंधकर मुझको कुछ कहता
गलबहियां दे उसे रोक जो पाती
क्या बैठ पहर भर मुझ संगति करता ?

क्यों कजरा धो-धोकर होता सवेरा ?
क्यों सूरज भी बन जाता है लूटेरा ?
संझा भी झंझा सी रुककर
क्यों करती दग्ध बाहों का घेरा ?

आज अति शोकित धरा-आकाश क्यों है ?
मलिन मुख में क्षितिज भी उदास क्यों है ?
टूटा-सा प्यारा सुख सपना लेकर
सिर टेके बिसुरती आस क्यों है ?

क्यों असंयत हो दहकता है तन-मन ?
क्यों विरह-प्रपीड़ित है ये दृढ आलिंगन ?
तड़प-तड़पकर ही रह जाता है
क्यों विकल अधर युगल का चुम्बन ?

जब लपट ह्रदय से लिपटी हो ऐसे
तो मूढ़ अगन बुझेगी भी कैसे ?
तब जल का आगार भी आक्रान्त होकर
बढ़ाता संताप है निज वड़वानल जैसे.....

तो भी असम्भव सी आकांक्षा भटकती क्यों है ?
निराशाओं के बीच भी अटकती क्यों है ?
शून्य से सुनहरा चित्र खींचकर
शंकित हो उसे ही तकती क्यों है ?

इतनी दारुण दुर्बल अवस्था में
औ' प्रीत की बलबती भावुकता में
क्यों प्राण भी सहज नहीं छूटता
न जाने किस अक्षय विवशता में.....

फिर विवशता की यह अंतर्वेदना कैसी है ?
फिर विवश सा यह अनुताप कैसा है ?
वाणी-विहीन रंध्रों से फूटता
फिर यह विवश आलाप कैसा है ? 

Sunday, December 8, 2013

मेरा एक काम .....

                                     फूल भी तुम्हारा
                                    चरण भी तुम्हारा
                                     शीश जो चढ़ाऊँ
                                    शरण भी तुम्हारा

                                     चलूँ तो तुममें
                                      बैठूँ तो तुममें
                                      रूक जाऊँ तो
                                     ऐंठूँ भी तुममें

                                      खाऊँ तो तुम्हें
                                      पियूँ तो तुम्हें
                                       श्वास भी लूँ
                                      तो जियूँ तुम्हें

                                        चुप तो तुम
                                        बोलूँ तो तुम
                                        रूठूँ तुम्हीं से
                                        मानूँ तो तुम

                                       ओढ़नी भी तू
                                      बिछौनी भी तू
                                      सोऊँ तो उसमें
                                      मिचौनी भी तू

                                      आकाश भी तेरा
                                       सागर भी तेरा
                                        मिट्टी का सब
                                        गागर भी तेरा

                                          हवा भी तू
                                         आग भी तू
                                      सब को पिरोता
                                         ताग भी तू

                                       माया भी तुम
                                       मोह भी तुम
                                      मिलन तुम्हीं से
                                      बिछोह भी तुम

                                       दुविधा भी तुम
                                      सुविधा भी तुम
                                        विष के बीच
                                        सुधा भी तुम

                                        प्रश्न भी तुम
                                       उत्तर भी तुम
                                        पूछूँ कुछ तो
                                      निरुत्तर भी तुम

                                       मिथ्या भी तुम
                                        सांच भी तुम
                                      रस से पिघलाते
                                        आंच भी तुम

                                        नया भी तू
                                       पुराना भी तू
                                      बाँचने के लिए
                                       बहाना भी तू

                                      कोई भी नाम
                                       तेरा ही नाम
                                     पुकारा तुम्हें ही
                                       मुझे तू थाम

                                      तुम्हें ही रोया
                                      तुम्हें ही गाया
                                      तड़प को चैन
                                     तनिक न आया

                                      ना दो आराम
                                     पर लो प्रणाम
                                     तुझे ही जपना
                                     मेरा एक काम .

Tuesday, December 3, 2013

मैं कालिदास बन जाती.......

कल की रात
थोड़ा सा और जोश आ जाता तो
या थोड़ा सा और होश खो जाता तो
निधड़क ही मैं कालिदास बन जाती
और उनके जैसा बहुत सारा तो नहीं
पर कम-से-कम एक काव्य तो
निश्चित ही लिख पाती....

झटके से उठकर मैं मंदिर भागी और
माँ के मुख पर थोड़ा कालिख लगा आई थी
रास्ते में मिले छोटे-बड़े झाड़ियों पर चढ़कर
दो-चार कोमल टहनियाँ भी गिरा आई थी
फिर घर के अखबार से लेकर बिल तक
हर कागजनुमा पदार्थ को सहला दिया था
मानती हूँ कि इस फिरे हुए सिर को
श्री कालिदास ने और भी फिरा दिया था....

मेरे आस-पास मेरी लेखनी थी , मसि थी
मेरी इच्छा की मुट्ठी भी सच में बहुत कसी थी
स्वर्णपत्र , ताम्रपत्र , भोजपत्र आदि का
अच्छा खासा लगा अम्बार था
और रत्न जड़ित पीठिका पर
उत्तेजित हर एक उच्चार था
एक कोने से पर्याप्त प्रकाश करता हुआ
मेरा दिया भी कितना सुकुमार था
शायद मुझसे ज्यादा उसको ' मुझ-रचित '
एक चिर जीवन्त काव्य का इन्तजार था.....

मेरी कल्पनाशीलता भी कुछ
दिव्य दिग्दर्शन करके शब्दातीत थी
और सर्वश्रेष्ठता के शिखर पर पालथी मारकर
बैठी मेरी चेतना भी कालातीत थी
ऊपर से मेरा ' सख्य-भाव ' सबसे मिलकर
अपनी श्रेष्ठ भूमिका का उल्लेख चाहता था
और एक उत्कट प्रकृति प्रदत्त प्रेम का
मुझसे उल्लिखित लेख चाहता था.....

प्रसंगों-उपाख्यानों का समन्वयन के लिए
विहंगम अवलोकन का स्थापित आधार था
और अलकापुरी से रामगिरि की यात्रा के लिए
मेरा बोरिया-बिस्तर भी तैयार था
जब पूरे राग-रंग में बुरी तरह से डूबा हुआ
अलकेश्वर का राज्य और दरबार था
और भोगी चाटुकारों के बीच रहते-रहते
कुछ ऐसा शाप देने से उन्हीं को इनकार था....

फिर यक्ष-यक्षिणी को भी तो अलकेश्वर का
कोई भी फरमान कहाँ स्वीकार था ?
और विरह-वियोग का पुराना चलन
अब उनके लिए भी बेकार था
पद-प्रमादवश गलतियां किससे नहीं होती ?
उनका यही सीधा सरल सवाल था
वैसे भी आज के उपद्रवों के बवंडर में
उनका तो बहुत छोटा सा बवाल था.....

साथ ही इस गुनगुनी-कुनकुनी ठण्ड में
मेरी बादलों से हुई सारी वार्ताएं विफल रही
और लपलपाती हुई लेखनी उन पत्रों को
बस छेड़छाड़ करने में ही सफल रही
फिर अपने काव्य में किसी नये चरित्र को
पात्र बनाती , मुझमें कहाँ इतना दम था?
और सच कहने में लाज या संकोच कैसा
कि मुझमें ही वो पानी कम था .....

अकस्मात ही मेरी स्मृति-पटल को सूझा
कि एक ही कालिदास हैं नास्ति दूजा
तब तो सौंदर्य-वियोग , वैराग्य-वेदना आदि का
स्व्प्न सा ही सही फैला हुआ वितान था
उनको थोड़ा-बहुत अनुभूत करने के लिए
मेरे पास उपलब्ध सारा अनुमान था
पर मेरी भाषा में कहाँ उतना प्राण था ?
न ही देववाणी संस्कृत का ही मुझे ज्ञान था.....

अब इस दिन के उजाले में
आदरणीय कालिदास जी के आदरणीय भूत जी को
अति सम्मान के साथ भगा रही हूँ
और अंदर बैठे हीन भाव से ग्रस्त कवि को
ऐसी ही चलताऊ कविता के लिए जगा रही हूँ
और तो और आँख खोलकर इस साधना-स्थली को
किसी कबाड़खाना सा देख रही हूँ
और उन पत्रों की रद्दियों को
टोकड़ी में भर-भरकर बाहर फेंक रहीं हूँ
उनके साथ ही मेरा सारा शौक , सारा अरमान
ख़ुशी-ख़ुशी मुझे छोड़ कर जा रहा है
और श्री कालिदास जी मुझे कह रहे हैं कि
भई! चलताऊ कवि जी , हमें तो बड़ा मजा आ रहा है .


Thursday, November 28, 2013

शुक्रिया ! बोलती हूँ .....

इससे ज्यादा
बेचारगी का आलम
और क्या होता है
कि बेतरतीब से बिखरे
बेजुबान हर्फों को
बड़ी तरकीब से
सजाने के बावजूद
मतलब की बस्ती में बस
मातम पसरा होता है....

वो उँगलियों के सहारे
कागज़ पर खड़ी कलम
इस हाले-दिल को
खूब जानती है
और अपनी मज़बूरी पर
कोई मलाल न करते हुए
घिसट-घिसट कर ही सही
दिए हुकुम को बस मानती है....

कोई तो आकर
मुझको समझाए
कि महज दिल्लगी नहीं है
उम्दा शायरी करना
गर करना ही है तो पहले
इक दर्द का दरिया खोदो
फिर उसमें कूद-कूदकर
सीखो ख़ुदकुशी करके मरना ....

शायद हर्फ़-दर-हर्फ़
महल बनाने वालों ने ही
मुझे इसतरह बहकाया है
व मेरे नाजुक लबों पर
उस 'आह-वाह' का
असली-नकली जाम लगाकर
हाय! किसकदर परकाया है....

असलियत जो भी हो
पर ये कलमकशी भी
फ़ितरतन मैकशी से
जरा सा भी कम नहीं है
और ये बेखुदी
आहिस्ता-आहिस्ता ही मगर
इस खुदी को ही पी जाए
तो कोई ग़म नहीं है....

अब बस
इतनी सी ख्वाहिश है कि
इस महफ़िल की आवाज में
हर किसी को सुनाई देती रहे
अपनी आवाज
वैसे भी क्या ज़ज्ब करने पर
कभी छुपा है किसी का
शौके-बेपनाह का राज ?

आज वही राज जो खुला ही है
उसे फिर से मैं खोलती हूँ
कि इस महफ़िल को
गुलजार करने वालों !
आप सबों को दिल से
इन बेतरतीब हर्फों के सहारे ही
शुक्रिया ! शुक्रिया ! शुक्रिया !
शुक्रिया ! बोलती हूँ .
 

Thursday, November 21, 2013

कुछ भी हो सकता है ...

अब नट-नटी बहुत खुश हैं
जैसे उन्हें किसी खजाने का
कोई खोया रास्ता मिल गया हो
और वे अपने पुरखों को
मन ही मन करम अभागा कह कर
रस्सी और बांस से करतब करते हुए
देसी-विदेशी बैंकों में खाता खुलवाने के लिए
एक्सपर्ट से कांटेक्ट करने के साथ-साथ
खुद भी नेट पर सर्च कर रहे हैं....

अब अकड़ू बन्दर भी खुश है
वह पहली बार गले में पड़े पट्टे से
बड़ा सम्मान का अनुभव कर रहा है
और मदारी अनएस्पेक्टेड सम्मान को
कल्पना में ही सही
अपने गले में पट्टे सा लगाकर
कुछ विशेष विनम्रता और शालीनता का
विशेष परिचय दे रहा है
और अंदर ही अंदर
डमरू के डंके को थैंक्यू भी कह रहा है...

अब सांप भी अपने सेंसेक्स की
परवाह न करते हुए
बहक-बहक कर बावला हुआ जा रहा है
और सपेरा को बार-बार
ऐसे चूम रहा है कि वह अपने सपने में ही
किसी प्रतिष्ठित पत्रिका में छापा हुआ
अपना लेख पढ़ने लगा है ....

पर सबसे ज्यादा खुश तो
अपने सर्कस का जोकर लग रहा है
पहले वह दस फीट उछलता था
अब बिना ताली के ही
बीस-बीस फीट उछलने लगा है
ये सोच-सोचकर कि
शायद कभी कहीं उससे खुश होकर
कोई पांच साल के लिए ही न सही
उसे गद्दी न दे दे
और वह अपने मुकुट के डिजायन को लेकर
अभी से ही बहुत टेंसन में है ....

पर बेचारे विदेशी
च: ..च: ..च: ...च: ...च: ....
हमसे कुछ ज्यादा ही डर गये हैं
और अपने सम्मानों का
जल्दी से जल्दी देशी पेटेंट करा रहे हैं
क्या पता हममें से कोई
कभी अति देशभक्त होकर
उनके सम्मानों को भी
उपहारों के रैंकिंग लिस्ट में
टॉप पर न सजा दे
और मनोरंजन के काउंटर पर
उनके करेंसी को भी
अपने टिकट में न भजा ले....

मतलब साफ़ है कि
अगर समय खुद ही आगे बढ़कर
ट्विस्ट करना चाहे तो
उसका सरप्राइज
कुछ भी हो सकता है
और रही बात अपने प्राइज की तो
वो भले ही अपना वैल्यू खो दे
पर अपना कॉन्ट्रोवर्सि
कभी भी नहीं खो सकता है .

Saturday, November 16, 2013

प्रशस्ति-गान...

सब तरफ से
भलभल करता हुआ
प्रशस्ति-गान को सुन-सुनकर
आज मेरा मन भी
भाट हुआ जा रहा है.....
जैसे कोई रूमानी रेशम
टट्टर को देख-देखकर
खुद ही टाट हुआ जा रहा है....
अब तक के इतिहास का
आह! क्या रोमांचक पल है
इसलिए तो छलियन शब्दों से
आज छँटा हुआ सारा छल है
और अपनी छटकती अनेकता में
असली एकता का नारा लगाते हुए
सब भावुक हो-हो कर
कुछ- न-कुछ कहे जा रहे है
साथ ही उनमे से कुछ तो
प्रशंसकों की खुली प्रतियोगिता में
अव्वल आने की लिए
अजीबों-गरीब हरकत भी किये जा रहे हैं....
क्या महावीर के कैवल्य का
या बुद्ध के निर्वाण का
ऐसा लुभावना दृश्य रहा होगा ?
जो आज के इस अवतारी भगवान के
महाभिनिष्क्रमण का दृश्य है ...
आजतक के सारे रिकार्ड को तोड़कर
नया रिकार्ड बन रहा है
और जिनका कार्ड लकी है उन्हें
मीडिया भी बड़ा से बड़ा फुटेज दे रहा है ...
जो सिरे से नास्तिक हैं
वे अपने शक-शुबहा को
गधे के सिंग से तुलना कर रहे हैं
और जो आस्तिक हैं
वे अपने नये क्रीड़क भगवान के
इस क्रांतिकारी क्रीड़ा को
अविश्वसनीय बनाने का बीड़ा उठा रहे हैं.....
सच में धन्य हुई जा रही है धरती
उससे भी कहीं ज्यादा
धन्य हुए जा रहे हैं हम
और सामूहिक प्रशस्ति-गान से
जैसे-तैसे नये भगवान का
स्तुति पर स्तुति किये जा रहे हैं....
वैसे भाटों के भाड़ में भरभरा कर
अबतक मैंने कोई
विशेष महारथ तो हासिल नहीं किया है
लेकिन मेरी भी यही तमन्ना है कि
मेरा ये प्रशस्ति-गान ही
चारो तरफ से उठता हुआ शब्द-भाटा में
सब गान को कोरस में धकेल कर
सबसे ऊँचा तान हो जाए
और अपने इस अनजान प्रशंसक से
अपनी इतनी सुन्दर प्रशंसा को सुनकर
सबका नया भगवान भी
न चाहते हुए ही हैरान हो जाए .

Monday, November 11, 2013

रचनाकर्म ....

भाषिक अभिव्यक्ति के स्तर पर रचनाकर्म
सादृश्यता में मधुमक्खी के छत्ते की प्रतिकृति है
एक बहुआयामी रसास्वाद की व्यापकता
और सौंदर्यानुभूति ही इसकी प्रकृति है.....

क्या ये निज मधु मापने की
कोई मौनाबलम्बित मिति है ?
या दिग्ध-दंश से विक्षत होने की
कोई व्यग्र पटाक्षेपी वृति है ?

न ही जीवन की यथार्थ भूमिका से
यूँ ही तटस्थ रहा जाता है
न ही प्रयोजन-निष्प्रयोजन का ही
कोई स्थूल भेद कहा जाता है.....

विरोधाभासों की विक्षुब्धता तो
और भी सहा नहीं जाता है
पर मन को कितना भी रोको तो भी
सबके सुख-दुःख में बस बहा जाता है.....

तिसपर घटनाओं और भूमिकाओं की
अपनी-अपनी परिस्थितियां हैं
साथ ही भावनाओं और व्यंजनाओं की
विशेष अनाधिकृत व्युतपत्तियां हैं.....

क्या ये आनंद और आंतरिक पीड़ा से
क्षणिक भावावेश में मोहाछन्न मुक्ति है ?
या हर्षोल्लास और वेदना की
अपने दृष्टिनिक्षेप में व्यर्थ व्यासक्ति है ?

तब तो व्यक्तित्व से अस्तित्व तक का विस्तार
सबको विचित्र व्यथा से भर देता है
और कोई उपलब्ध क्षण पसर कर
मानवीय मूल्यों को घर देता है..........

एक यही घर तो हमारे जीवित होने का
श्वास से भी अधिक प्रमाण देता है
और शब्दों-भावों का एक संसार सजकर
रचनाकर्म को निरंतर विधान देता है......

निस्संदेह सर्जन-प्रक्रिया में विलक्षण चमत्कार सा
नितांत नया युग भी स्वयं को व्यंजित पाता है
इसलिए तो सामान्य मानसिक स्थितियों से अलग
रचनाकर्म की मनोभूमि को अतिविशिष्ट माना जाता है . 

Thursday, October 31, 2013

कवित्व-दीप ....

सत्य को सत्यता की सत्ता से भी
उपलक्षित करने के लिए
श्रेष्ठ को श्रेष्ठता की श्रेणी से भी
उपदर्शित करने के लिए
और सुन्दर को सुंदरता की समृद्धि से भी
उपपादित करने के लिए
विभिन्न रूपों और विभिन्न स्तरों पर
शब्दों एवं अर्थों के सहभावों व समभावों की
अभिनव अभिव्यक्ति अनवरत होते रहना चाहिए
और चिर प्रतिद्वंद्वी अन्धकार मिटता रहे
इसलिए कवित्व-दीप सतत जलते रहना चाहिए....

आदि काल से ही कवि को
कालज्ञ , सर्वज्ञ , द्रष्टा अथवा ऋषि
अमम आत्मनिष्ठा से कहा जाता है
प्रमाणत: उसकी रचनात्मक कल्पनाशीलता में
आकाश की व्याप्ति भी वाङ्मुख होकर
निर्बाध बहा जाता है
इसलिए तो भिन्न-भिन्न आयामों से
सम्पूर्ण मानवीय ज्ञान को
कवित्व के आलोक में पढ़ा जाता है
इस स्वयं प्रकाशित एवं आप्त उद्घाटित
सहजानुभूति के लिए
हर ह्रदय में प्रेमानुराग प्रज्वलित होते रहना चाहिए
और ये चिर प्रतिद्वंद्वी अन्धकार मिटता रहे
इसलिए कवित्व-दीप सतत जलते रहना चाहिए....

मन उद्दाम भाव-भूमि से लेकर
उद्दिष्ट अनुभव-आकाश तक कुलांचे भरता है
अपने ही चाल की विशिष्टता से विस्तार पा
चमकृत होता रहता है
और अकथ आनंद-आस्वाद को
पल-प्रतिपल पुन: पुन: पाता रहता है
इस प्रेय उद्गार एवं गेय मल्हार की
अभिव्यक्ति के लिए
अप्रतिम तथा अमान्य संवेग
सदैव प्रस्फुटित होते रहना चाहिए
और चिर प्रतिद्वंद्वी अन्धकार मिटता रहे
इसलिए कवित्व-दीप सतत जलते रहना चाहिए....

अत: अतिशयोक्ति नहीं है कि
कवित्व ही
समस्त वस्तुओं का मूल है
अमृत-सा ये अमर फूल है
ये चेतना का चिंतन है
तो अस्तित्व का ये कीर्तन है
प्रेम का ये समर्पण है
तो विरह में भी मिलन है
ये समृद्धि का प्रहसन है
तो दरिद्रों का भी धन है
दुःख में ये धैर्य है
तो सुख का शौर्य है
हर पाश का ये प्रतिपाश है
तो अन्धकार में प्रकाश है.....

दीपों के त्योहार से हमें और क्या चाहिए ?
बस ये चिर प्रतिद्वंद्वी अन्धकार मिटता रहे
इसलिए कवित्व-दीप सतत जलते रहना चाहिए .



( उपलक्षित---संकेतित , उपदर्शित---व्याख्या करना
उपपादित---सिद्ध करना , वाङ्मुख---ग्रंथ की  भूमिका
 उद्दाम---स्वतंत्र , उद्दिष्ट---चाहा हुआ )
 

Friday, October 25, 2013

अहं की व्यापारी हूँ ....

अहं की व्यापारी हूँ
आंतरिक संघर्ष से हारी हूँ
अत्यंत महत्वाकांक्षी हूँ
बस सम्मान की आकांक्षी हूँ ...

आस-पास के लोगों को
अपने हिसाब से गढ़ लेती हूँ
व उनकी असहमतियों को भी
सहमति की भाषा में पढ़ लेती हूँ...
कभी कुछ ऊँचे लोग दिखते हैं तो
उन्हें कुछ ही आदर दे देती हूँ
पर बराबरी वालों से बस
तुच्छतागर्भित सहिष्णुता बरत लेती हूँ
और निचले दर्जे की बात करने से ही
अपने-आप में अपमान अनुभव करती हूँ
वैसे भी उनकी औकात या बिसात क्या
कि उन्हें लोगों में भी गिनती करूँ
उनपर कभी गलती से जो
मामूली नजर भी पड़ जाती है तो
बहुत घृणा से भर जाती हूँ ....

बड़ी दुखकारी हूँ
उथली धूर्तता से खारी हूँ
अत्यंत असहनशील हूँ
सबसे ज्वलनशील हूँ ...

अबतक जो सिर मिलता रहा
उसी पर चढ़ कर चली हूँ
किसी भी तरह अपना कद बढ़ता रहे
इसी में जी-जान से लगी हूँ....
हर समय फन उठाये रहती हूँ
पूँछ से भी बिना कारण जहर छोड़ती हूँ...
जो मुझे गलती से भी दुःख पहुंचाते हैं
उनका तो जी दुखाने में
एक विचित्र सुख मिलता है
और पहुँच के बाहर वालों से
बस बदले का भाव पलता है.....
यदि किसी से मन मिल जाए तो
उनको जानबूझ कर सताती हूँ
कभी वे मुझसे निष्ठुरता बरते तो
उन्हें सुधरने का मौक़ा दिए बिना
उन्हीं के घर का रास्ता बताती हूँ ...

दम्भी और इच्छाचारी हूँ
बलात सबपर भारी हूँ
अत्यंत विध्वंसक हूँ
पर बड़ी आत्मप्रशंसक हूँ ....

सब दोषों की अजूबा दस्तकारी हूँ
इसलिए तो अहं की व्यापारी हूँ.

Friday, October 18, 2013

हे ! शिशिर-यामिनी

हे ! शिशिर-यामिनी
न जाने किस गुप्त ग्रास से
या किसी त्रपित त्रास से
या विरक्त हो अपने विलास से
कहो , तू फिर चली आई
क्यों प्रिय के बाहुपाश से ?

हे ! कंजाभी कामिनी
यदि आ ही गयी तो तुम्हें
अपने अभिसार-पथ पर
सूक्ष्म-संकेत नहीं छोड़ना चाहिए
व सबके सामने अंगराई ले-लेकर
अंग-अंग नहीं तोड़ना चाहिए.....

रुको , हे ! रम्य रागिनी
अपने प्रणयी पलकों को
अब ऐसे मत खोलो
व श्लथित श्वासों में समा कर
शीत-तरंगों को भी न घोलो...

अरी ! मृदुल मानिनी
मणियों-सा ये ओस-कण है
या तू ही लज्जा से पानी-पानी है
चल हट , कुछ कह या न कह
हर पात-पात पर तो
बस तेरी ही कहानी है.......

हे ! अखंड अभिमानिनी
यूँ अलक लटों को बिखरा कर
किसके लिए तुम मनहर सा
क्रीड़ा-मंडप सजा रही हो ?
व खद्योतों के मद्धम-मद्धम जोत से
मंजुल मंजिर बजा रही हो ?

हे ! सौम्य साक्षिणी
सुन ! तू तो है
अपने कर-कंकण की ताल पर
मोर-मनों को नचाने वाली
और गात-गात को गलबहियाँ दे कर
एक मदिर क्लेश भर जाने वाली......

जरा ठहर , हे ! भद्रा भामिनी
बस उन ठिठुरती कमलिनियों को
किंकणी धुन दे कर ऐसे ही मत जगाना
और कमल तो ठहरे कमल हैं
वे तो यूँ ही किंजल उड़ाते रहते हैं
उन्हें छेड़कर और मत उकसाना
नहीं तो तेरी चुनरी चेष्टातुर हो कर भी
उन्हें आवृत न कर पाएगी
और असफल किन्तु प्रिय प्रयास पर
तू खुद ही अनायास मुस्कायेगी......

अरी ओ ! शरत शालिनी
तू अब वहाँ जा जहाँ तेरे लिए
मिलन के मधुर-गान से
चहुँओर मंगल-असीस मंत्रित हो
जितना चाहे तू अंक फैलाकर उसे भर
पर उससे पहले तू वहाँ जा जहाँ
वियोगवश दुबलाई काया
दुसह्य दुःख से विदग्ध हैं
उस दुःख को जितना संभव हो सके
अपने कोमल स्पर्श से कम कर ....

हे ! शिशिर-यामिनी .


Sunday, October 13, 2013

हे परमेशानि !

मेरे रोम-रोम से
तेरा आरव रँभित
रंच मात्र न
कोई रव दूजा हो
हे परमेशानि !
ऐसे तू मुझसे
प्रकट हो कि
मेरा हर कृत्य ही
तेरी पूजा हो !

मेरे आकुल ताप में
तेरी मधुर कल्पना हो
व उद्वेलित मन में
बस प्रिय भावना हो
और विह्वल तिक्तता में भी
तेरी आलंबित धारणा हो ......

कोई क्षुद्रोल्लास ही
जीवन-ध्येय नहीं हो
व कभी उग्राह्लाद
प्राप्य विधेय नहीं हो
और क्षणिक हर्षोल्लाद में
कुछ भी हेय नहीं हो ........

तेरे दुर्लभ योग की
प्रबल अभिलाषा हो
व गरिमान्वित गर्जन से
बँधती हर आशा हो
और तेरे रहस्यों को बस
पीने की उत्कट पिपासा हो .......

हर रुधिर में रंजित
तेरा आलोड़न हो
व श्वास-श्वास में
एक ही आन्दोलन हो
और विभोर तन-मन में
तुझसे दृढ आलिंगन हो .......

तेरी गति-कंपन से
प्राणों में कलरव
कल-कल कर
सुप्तराग सा गूँजा हो
हे परमेशानि !
ऐसे तू मुझसे
प्रकट हो कि
मेरा हर कृत्य ही
तेरी पूजा हो !


Monday, October 7, 2013

उठाओ कुदाल !

क्या बना रखा है
तुमने अपना ये हाल ?
ऐसे परती धरती न निहारो
उठाओ कुदाल !

माना कि सिर पर सजी धूप है
पल-पल बदलता
पसीने का छद्म-रूप है
तनिक सुस्ताने के लिए कहीं
कोई ठौर नहीं है
पर चकफेरी के सिवा चारा भी तो
कोई और नहीं है......

बदलो अपने हिसाब से
सूरज की चाल !
ऐसे परती धरती न निहारो
उठाओ कुदाल !

अबतक कितना पटका
तुमने पत्थरों पर सिर ?
तुम्हीं से पूछ रहा तेरा आँसू
बरबस नीचे गिर
कबतक अपने भाग्य को कहीं
गिरवी रख आओगे
और पसारे हुए हाथ पर
दो-चार मिश्रीदाना पाओगे ?

अपने आस्था के जोत को
अपने कर्म-दीप में सँभाल !
ऐसे परती धरती न निहारो
उठाओ कुदाल !

देखो ! कब से उदास बीज
मेड़ पर है खड़ा
प्राण से तुम छू दो उसे
तो हो जाए वह हरा-भरा
बीज को बिथरा कर जब
परती धरती टूटती है
तब अक्षत अंकुरी भी अनवरत
अगुआकर तुम्हीं से फूटती है......

चाहे कितना भी उलट कर
रुत हो जाए विकराल !
ऐसे परती धरती न निहारो
उठाओ कुदाल !

बादलों को चीर कर बिजली
क्या कहती है सुन
उठ ! तू भी परती की छाती पर
कुदाल से अपनी हरियाली बुन
तुम ही अपने बीज हो
और तुम ही तो हो किसान
अपने भूले-भटके भाग्य के
बस तुम ही हो भगवान.......

भ्रमवश किसी विषपात्र में
अपना अमृत न डाल !
ऐसे परती धरती न निहारो
उठाओ कुदाल !



Thursday, October 3, 2013

लोग जान जायेंगे....

इतना न लिखो मुझे
लोग जान जायेंगे
फिर अर्थों के अधीर अधरों पर
अपना कान लगायेंगे
व शब्दों में घुली सुरभि से ही मुझे
ऐसे पहचान जायेंगे
कि रिक्त स्थानों में भी
अबुध अनुमान लगायेंगे....

बेरोक-टोक फिर तो मैं
बह न पाऊँगी
कोई टोक दे तो कुछ
कह न पाऊँगी
उन चुभती नजरों को तब मैं
सह न पाऊँगी
और बिन चिढ़े भी तो
रह न पाऊँगी.....

मेरी चिढन की चिनक से भी
लोग जान जायेंगे
फिर प्रचल पीड़ा के पदचाप में भी
अपना कान लगायेंगे
और गुप-चुप रोती वेदना को भी
ऐसे पहचान जायेंगे
कि सुषुप्त साँसों के शुष्क-गान में भी
अयुक्त अनुमान लगायेंगे....

बोलने से उथली हो हर बात
बह जाती है
जो न भी कहना चाहो वो भी
कह जाती है
कौड़ियों के उलाहना को भी जाने कैसे
सह जाती है
और न कहो तो ही वह कीमती
रह जाती है....

इसलिए इतना न लिखो मुझे
लोग जान जायेंगे
फिर अर्थों के अधीर अधरों पर
अपना कान लगायेंगे .


    

Saturday, September 28, 2013

नव स्वाति-नक्षत्र...

खगोल शास्त्र के हुकुम की
नाफ़रमानी न करते हुए
नव स्वाति-नक्षत्र को आना ही है
अपने लेखा पर रोते हुए भी
दाँत निकाल-निकाल कर मुस्कुराना ही है...
पर उसका कई मन से भी भारी मन
और भारी-भारी पाँव को देखते हुए
मेरे जी में आ रहा है कि
मैं भी उसे एक बिलकुल मुफ़्त सलाह दे दूँ
कि वह चुपचाप अपना पथ बदलकर
उत्तरी या दक्षिणी ध्रुव जाए
और किसी बर्फ-घर के तहखाने में
छिपकर तबतक आराम फरमाए
जबतक कि संहिता के हिसाब से
सीपी सब सुधर न जाए.....
उन सीपियों का क्या ?
उन्हें तो यूँ ही अपना मुँह फाड़े रहना है
जो कुछ भी आ जाए उसमें
उसे बस निगलते जाना है
फिर गलती से भी डकार नहीं लाना है
क्योंकि गुप्त आँखों का भी तो जमाना है
साथ ही इधर-उधर डोलती-फिरती हुई
भद्दी-गन्दी बूंदों को भी
रोगन-पालिश कर-करके मोती बनाना है.......
हाय! इन अत्याधुनिकाएँ बूंदों की तो
हर अदा ही निराली होती जा रही है
एक तो पहले ही हूर सरीखी चाल थी
अब तो और भी मतवाली होती जा रही है.....
उनके पास अब तो एक-से एक चकाचक घोषणापत्र है
जिसमें शेखचिल्ली को मात करने वाला
एक-से-एक चौंकाऊ चुटकुले हैं
जैसे कि पिरामिड को पीट-पीट कर बराबर करना
या चीन की दीवार को खिसकाकर लाना
या फिर एफिल-टॉवर को बौना करना
या झुकी मीनारों के रीढ़ को खींचकर सीधा करना
ऐसे ही और भी बड़ी-बड़ी योजनायें हैं
जिसे सुनकर अब
न तो हँसी आती है न ही दिल से रोना
सही ही कहा जाता है कि
कुछ पाने की उम्मीद में ही
चेतावनी-सा लिखा होता है खोना.....
वैसे भी पञ्चवर्षीय संवैधानिक चाल से
नव स्वाति-नक्षत्र का आना हो या जाना
या सीपियों का ही हो सौतिया सोखाना
या फिर मोतियों का ही हो मनमोहक मनमाना
या बूंदों का ही हो येन-केन-प्रकारेण बिजली गिराना
पर हम कंकड़-पत्थरों का क्या ?
उस विशेष घड़ी में
घुड़क-घुड़क कर है एक ठप्पा लगाना
फिर बाकी दिन तो वैसे ही एक समाना
और अपनी ही उलझी अंतड़ियों में
थोड़ा और उलझ कर
सौ के बदले हजार तरह से मरते जाना .


Sunday, September 22, 2013

मोक्ष-मोह में ....

फिर पितर लोक में
उत्सवी चहल-पहल है ...
अगस्त्य मुनि पत्नी लोपामुद्रा के साथ
पिंडदानियों के सुन्दर स्वागत में
जी-जान से लग गये हैं
उनके लिए विशेष पैकेज की
विशेष रूप से व्यवस्था करवा रहे हैं...
पितृपक्ष मेला दुल्हन की तरह
सज-संवर रहा है....
प्रेतशिला पर्वत से लेकर तलहटी तक
पिंडवेदी पर कौवे मंडरा रहे हैं
और आत्माएं आस्था के ब्रह्मकुंड में
लगातार लग रही डुबकियों से
सांस नहीं ले पा रही है....
देवघाट के सामने बहती फल्गु
शापित होकर भी मोक्षदायिनी है...
गाय , तुलसी और ब्राह्मण
सबका मार्ग रोक- रोककर
बता रहे है मुक्ति का मार्ग
और असली नक्शा लिए बरगद
गद-गद है गर्दन हिला-हिला कर
पर उसका सच सुनने वाला कोई नहीं......
इस तर्पण-अर्पण में
सर्वकुल , नाम-गोत्र आदि
नोट से ही अपनी पहचान दे रहे हैं
उसी में भूल-चुक , क्षमा-प्राप्ति आदि का भी
प्रमुख प्रावधान सुरक्षित है
और सबके लिए स्वर्ग तो
बेटा पैदा होने के साथ ही आरक्षित है.....
जो होशियार व हाईटेक हैं
वे अपने घर में ही जीते-जी
माँ-बाप को नर्क-भोग करा रहे हैं....
वैसे भी आज न कल
इस पतित धरती का मोह
सबको छोड़ना ही होता है
इसलिए समय रहते ही वे
व्यावसायिक रूप से
अमानवीय व्यवहार को कैश करा कर
उन्हें जमीन-जायदाद आदि से
बेरहमी से बेदखल करके
गया का महात्म्य समझा रहे है.....
माँ-बाप भी हैं कि
अपने ही बच्चों की नजरों में
सबसे पहले नकारा होकर
अपने मोक्ष-मोह में
न जाने किस स्वर्ग के लिए
सीढ़ी पर सीढ़ी बना रहे हैं .

Tuesday, September 17, 2013

मैं प्रतीक्षा करूँ ....

                        तेरे ही बगल में मैं बैठ कर
                       तेरी ही कितनी प्रतीक्षा करूँ?
                         कभी तो थामेगा तू मुझे
                        बस इतनी ही इच्छा करूँ

                      दिवस-दिवस मधुर आशा में
                        हर एक दंश को चूमती हूँ
                      निराशा में विश्वास पालकर
                       पल-प्रतिपल मैं झूमती हूँ

                       छोटी-छोटी उर्मियाँ उठकर
                      एक अनोखी आस जगाती है
                      विलग-विलग किनारा छूकर
                     उस पार की झलक दिखाती है

                       एक धागा पिरोती रहती हूँ
                      मन के अन्स्युत मनकों में
                       सहन तक ही तुम आते हो
                      सुनती हूँ अस्फूट भनकों में

                     यह जो जीवन का तिमिर है
                      वह खोजता तेरा उजास है
                     स्नेह-ज्योति सहज ही घिर
                      ले आता मुझे तेरे पास है

                      तू जला दे शत दीपावलियाँ
                       मेरे प्रेम के कोने -कोने में
                      या बुझाकर मेरी ज्वाला को
                        बस हो जा मेरे ही होने में

                         बैठी हूँ, यूँ ही बैठी रहूँगी
                    चाहे जितना जन्म कम जाये
                  या अनियंत्रित रिसना घावों का
                       बह-बह कर यूँ थम जाए

                    कब परस करोगे जी को प्रिय!
                    क्यूँ ऐसी कोई मैं पृच्छा करूँ?
                      तेरे बगल में ही बैठकर
                    बस तेरी ही मैं प्रतीक्षा करूँ .


Thursday, September 12, 2013

क्या तुम्हें चाहिए ?

                  एक ने जीता सारा जग
                  दूजे से लज्जित है हार
                दो में से क्या तुम्हें चाहिए
                  धनुष या कि तलवार ?

                इस धनुष  में बड़ी शक्ति है
                   राग -रंग जगाने वाली
                 दक्खिन , दिल्ली ही नहीं
               हर दिल को थिरकाने वाली

               और तलवार एक दंपति है
               निज संतति ही खाने वाला
                कुकृत्यों को नंगा करके
               हम सबको दहलाने वाला

              व्यक्ति नहीं व्यक्तित्व ये
               इस युग के हैं नव आधार
              तुम ही कहो कि अब कैसे
               रचना है अपना संसार ?

               हार-जीत हैं दोनों हमसे
             रुक कर थोड़ा करो विचार
             दो में से क्या तुम्हें चाहिए
            धन्य धनुष या तम तलवार ?

Monday, September 9, 2013

धाय हूँ ....

बेबस हूँ , असहाय हूँ
अपने ही
धावक विचारों की धाय हूँ...

जिधर-जिधर वे जाते हैं
उनके ही पीछे-पीछे जाना मेरा काम है
पर वे मुझे भगा-भगा कर
इतना थकाते हैं कि
एक पल के लिए भी न चैन है न आराम है...

अक्सर वे आपस में ही गूंथकर
एक-दूसरे को ही इसकदर
गंभीर चोट पहुंचाते हैं कि
बीच-बचाव मैं करूँ तो
उल्टे मुझे ही इधर-उधर धकियाते हैं....

हरसमय ऐसे चिल्ल-पों मचा रहता है कि
मैं कितना भी सम्भालूँ
पर सँभाल में नहीं आते हैं
हाय! वे कितना मुझे सताते है
और कितना मुझे रुलाते हैं....

जब बढ़िया-बढ़िया खाना खिलाकर
बड़ी मुश्किल से उन्हें बहलाती हूँ
फिर फुसला-फुसला कर
बिस्तर पर उन्हें ले आती हूँ
और बड़े प्यार से पैर दबाकर
मीठी-मीठी लोरी सुनाती हूँ
पर कितनी हतभागी मैं कि
उनकी आँखों को जरा भी नींद नहीं दे पाती हूँ
और नींद से झपती मैं
खुद को ही थपथपा कर जबरन जगाती हूँ....

न जाने कैसे उन्हें
मछलियों का खेल भी आता है
छोटी-छोटी मछलियों को निगलना
क्यों उन्हें भी बड़ा भाता है....

जो जितना बलवान है सबके सरदार बन जाते हैं
फिर चिनगियाँ छिटका-छिटका कर
खुद पर ही बड़ी धार चढाते हैं
जिसे देखकर मैं क्या
सब चौंक-चौंक कर चिहुक जाते हैं
और खुद ही हटकर उनके लिए रास्ता बनाते हैं....

कैसे कहूँ कि मेरा कुछ चलता नहीं है
मैं तो निरी गाय हूँ , निरुपाय हूँ
बड़ी बेबस हूँ , असहाय हूँ
अपने ही
धावक विचारों की धाय हूँ .

Thursday, September 5, 2013

टेंशन का वेट घटाया जाए....


आज की इस अर्थव्यवस्था पर
की जा रही कोई भी टिप्पणी
मुझे टीन एजर सा कन्फ्यूज कर रही है
और मजेदार से मजेदार व्यंग भी
हाई डोज कोकीन सा बरगला रहा है
सेंसेटिव कविता तो सीधे
डांस-बार में ही पैर पटकवा रही है
ऊपर से ये विश्लेष्ण-विमर्श
उफ्फ! डेंगू सा कंपकंपा कर डरा रहा है....

जब हम पर चारों तरफ से
मार ही मार पड़ रही हो तो
कुछ भी समझ में नहीं आता है
बस मंदी के चक्रव्यूह में
देश का विकास दिख रहा है
और दिख रहा है दिवालियेपन का मुहाना
जो मुँह मोड़ने को राजी नहीं है....

इससे कैसे बचकर हम कहाँ जाएँ ?
क्या माडर्न मंहगाई को ही चबा-चबा कर खूब खाएँ ?
और तो और अपने रुपया को कैसे डॉलर बनाएँ ?
कैसे सबके हिस्से का गुलछर्रे उड़ायें ?

इस राष्ट्रीय संकट की चपेट में
धीरे-धीरे हम सब आ रहे हैं
और एक-दूसरे को कुछ भी
उल्टा-सीधा कहकर समझा रहे हैं
जबकि तस्वीर बिल्कुल साफ़ है
इसपर झूठ बोलना तो और भी माफ़ है...

भ्रम फैला रही बहसों के बीच
टी.वी. का चैनल बदल-बदल कर
खुद को उबा और थका रही हूँ
फिर दिल को थोड़ा बहलाने के लिए
मोबाईल मैसेजिंग व नेट चैटिंग पर
ज्यादा से ज्यादा समय लगा रही हूँ
साथ ही आऊट डेटेड डेट पर जा-जा कर
इंटरटेनमेंट का न्यू-न्यू आईडिया बुला रही हूँ...

पर लगता है कि इस मंदी में
बुद्धि भी बहुत मंद हो चली है
आगे मंडराते चुनाव में
वो एटम बम वाला नहीं बल्कि
किसी ऐसे हिटलर को देख रही है
जो हार्ड डिसीजन को अप्लाई करके
इस लड़खड़ाते देश को थोड़ा संभाल ले
और अर्थव्यवस्था को गर्त से निकाल दे...

पर इस मंद बुद्धि में कोई 'बुद्धिमान जी'
आकर बार-बार कहते हैं कि
'मैडम बुद्धू ' बैलेट से ऐसे पिकुलियर चेंजेज
बस आपके माइंड में ही पलते हैं....

बहुत टेंशन हो रहा है सच में
सोच रही हूँ कि अब नया क्या किया जाए ?
या कुछ नया करने के लिए किचन में चला जाए
देशी-विदेशी सारी कुकरी किताब खोलकर
ग्लोबलाइज्ड डिशेज को आजमाया जाए...

बॉडी का वेट बढे तो उसका टेंशन
पर खा-खा कर ही सही
औनेस्टली टेंशन का वेट घटाया जाए .


Sunday, September 1, 2013

तब-तब मैं पढ़ ली जाऊँगी ...

जब-जब
ओस की बूँदें बेचैन होंगी
घास के मुरझाये पत्तों पर ढरकने को
धीरे से धरती भी छलक कर उड़ेल देगी
भींगा-भींगा सा अपना आशीर्वाद
और बूँदों के रोम-रोम से
घास का पोर-पोर रच जाएगा
हरियाली की कविता से
तब-तब मैं पढ़ ली जाऊँगी
उन तृप्ति की तारों में

जब-जब
आखिरी किरणों से
सफ़ेद बदलियों पर बुना जाएगा
रंग-बिरंगा ताना-बाना
उसमें घुलकर फ़ैल जाएगा
कुछ और , कुछ और रंग
हौले से आकाश भी उतरकर
मिला देगा अपनी सुगंध
उन रंगों की कविता में
तब-तब मैं पढ़ ली जाऊँगी
हर किरण की कतारों में

जब-जब
आनंद की ओर
उचक-उचक कर झाँकते
किसी की प्रतीक्षा में खड़े दो नयन
अपनी सारी धूलिकण को बहाकर
तारों से आती आशा के सन्देश को
कोने-कोने की किलकारी बनायेंगे
और एक प्रार्थना बिखरने लगेगी
कण-कण की कविता से
तब-तब मैं पढ़ ली जाऊँगी
हर आश्चर्य की पुकारों में

जब-जब
हवाओं की छन्दों को
छू-छू कर बेसुध राग फूटेंगे
जिसपर जग-साँसें गीत गायेंगी
थिरक उठेगा ये जीवन
अपने ही उल्लास से भरकर
एक लय की कविता में
तब-तब मैं पढ़ ली जाऊँगी
निर्झर-सी झनकारों में

इस धरती से उस आकाश तक
मैं ही लिखी जाती हूँ
और मैं ही पढ़ी जाती हूँ....
इस छोर से उस छोर तक की
एक उन्मुक्त उद्गारा हूँ मैं
हाँ! कल-कल-कल-कल करती हुई
अनंत की अनवरत काव्य-धारा हूँ मैं .

Wednesday, August 28, 2013

अकारण ही ...



अकारण ही
अर्धरात्रि का समय
मुझे ऐसे घेरता है
कि मेरा इन्द्र भयभीत हो जाता है
एक भयानक झंझावात उठता है
और उसी पर एक प्रलयंकारी
वृष्टि एवं अग्निवर्षा होने लगती है....
योगमाया का ही तो प्रभाव है
कि प्रगाढ़ निंद्रा में सोये मेरे द्वारपाल
अचानक जग कर्तव्यपालन में
पूरी तरह से लग जाते हैं ....
बंदीगृह की तत्परता और
सूप की व्यग्रता देखी नहीं जाती
यमुना और शेषनाग रह-रह कर
सामने आने लगते हैं ....
मेरा शिलापट भी क्षुधातुर हो उठता है
पर जो बेड़ियाँ हैं न
वो और भी दृढ़ता से बांध जाती है
करागार का फाटक पहले ही
खुलने से मना कर देता है ....
बड़ी बेचैनी है , घबराहट है
इस गर्भ में ये कैसी आहट है ?
सावधानी तो बरत रही हूँ
पर असावधानियाँ कंस-सी
आतातायी हो रही है ....
अब अपने ही अत्याचारों के भार को
सहन करने में असमर्थ हूँ
पर उस अजन्मे अवतार को जन्म दूँ
कहाँ इतनी मैं समर्थ हूँ ?
अर्धरात्रि के बीतते ही
झंझावात के साथ-साथ
गर्भ भी शांत हो जाएगा
और दिन में स्वप्नावतार को
पूरी तरह से भूलभाल कर
अपने घर-ऑफिस के कामकाज में
बैल की तरह फिर से लग जाएगा .

Friday, August 23, 2013

प्रेम को कौन कब समझ सका है....



कुछ न कुछ कचोटती-सी
ग्रथित गूँज जरूर रह गयी होगी
सुधि से एक गंध उठकर
संचारित साँसों से बह गयी होगी !

उन्हीं अभिभूत अनुस्मृतियों को
मैं अनंतक अभिसार दे रही हूँ
हाँ! जन्मों-जन्मों के बाद भी
तुम्हें फिर से पुकार दे रही हूँ !

यह जो निगूढ़ नाद है
न मालूम कबसे चल रहा है
हो-न-हो दो बिछुड़े शून्यों में
अश्लेष अर्थ-सा पल रहा है !

उन्हीं अर्थों को तबसे कितने ही
संभृत शब्दों में घोल रही हूँ
और तेरी स्मृति-मंजूषा को
मैं बोल-बोल कर खोल रही हूँ !

कहीं उन शंसित शब्दों की कौंध में
तुम्हें कुछ स्मरण आ जाए
और चिर-वंचित विस्मृतियाँ
अपने अवगुंठित अर्थों को पा जाए !

इस जीवन का अर्थ तुम्हीं से
औ' सौभाग्य का क्षण-क्षण प्रयोजन है
धूप-दीप , अर्चा , फूल , बंदनवार लिए
ह्रदय-महल का सजा ये सिंहासन है !

कितनी आकांक्षाओं-अभीप्साओं को ले
इस दुर्लभ जन्म को हमने पाया है
अब दिवस-रात निष्फल न बीते
इसलिए तो तुम्हें फिर से बुलाया है !

कुछ महत होने के है करीब आया
कोई विधि-विधान मत खोजो तुम
अनघट घटना ही घट रही है
सरस होकर उसे सहेजो तुम !

प्रेम को कौन कब समझ सका है
प्रयत प्रतीति है केवल खोने में
ये जन्मों-जन्मों की गंधवाही गूँज भी
सुन , कहती है  हो जा  मेरे होने में .
 

Tuesday, August 20, 2013

मुई मानवीय भूल है न....



एक और हादसा
विपक्ष पीड़ितों के पक्ष में
पक्षाघाती बोल बोल रहे हैं
और पक्षपाती अपने मातहत से
आहतों का ब्योरा ले रहे हैं...
राहत की बात ये है कि
राहत की रवानगी का 
पूरा इंतजाम किया जा रहा है
इसमें समय तो लगता है...
कटे-फटे अंगों को जोड़-जोड़ कर 
गिनती जारी है
आधिकारिक और सूत्रों के
बेमेल आंकड़ों में
गलती गणित की ही है...
मन ही मन कात्यायनी माता को
धन्यवाद दे दे कर अवाक हो  
सहरसा और खगड़िया अचम्भित है
अपनी खैरियत पर हैरान भी है  
धमारा धू-धू कर जल गया
और कितनी ही कटी लाशें 
अपनी अंतिम संस्कार के लिए 
कितनी आसानी तैयार हो गयी है 
यदि वे कहीं से पूरी हो जाए तो...
वहाँ पहुँचे अधिकारियों को 
खदेड़-खदेड़ कर भगाया गया
या वे खुद ही जान बचाने के लिए
वहाँ से भाग निकले ?
अब तो रेल से गलती होनी थी , हो गयी 
जिन्हें-जिन्हें कटना था वे तो कट चुके
देखने वालों को गुस्सा दिखाना था , दिखा चुके
जितनी तोड़-फोड़ मचानी थी , मचा चुके
समय है , बीतेगा ही
धीरे-धीरे सब चुप भी हो जायेंगे
जैसा कि होता आया है....
अपने आलाकमान जी 
अधिकारियों के लाईन पर लगातार बने हुए हैं
हेल्पलाईन भी जारी किया जा चुका है
इसी से घायलों को भी 
समय पर बचा लिया गया है
फिर एक कमीशन को बिठाने के लिए
बड़ी जगह बनायी जा रही है
फिर एक खुली बहस की
पुरजोर तैयारी चल रही है
जो कि नैतिक जिम्मेवारी पर 
हवाबाज़ी करती रहेंगी...
एक-दूसरे को तिरछी नजरों से देखने के लिए 
आँखों को फरमान जारी कर दिया गया है
आँखे हैं कोई रेल नहीं
डर से मानने को राजी हैं
और जो महज एक
मुई मानवीय भूल है न
वो देश छोड़ कर भाग भी तो नहीं सकती है 
जिसके मचान से माथे पर
सारा दोष मढ़ दिया जाएगा
साथ ही इस गाढ़े वक्त पर
गढ़ी-गढ़ाई हुई गलफूटों को
फिर से गला पकड़ कर
फिर-फिर गढ़ दिया जाएगा .

  

Wednesday, August 7, 2013

धीरज हिलता है ...


                       अब विश्व -यातना को और
                       नहीं सह सकता है यह प्राण
                        नहीं सह सकता है हे! प्रभो
                       क्रन्दन -ध्वनि का जयगान

                       सिन्धु समान महानाद कर
                        बाँसों -बाँस उछलना चाहूँ
                       बड़वानल-सा वंकट हो कर
                      स्वार्थ-बेड़ियाँ कुचलना चाहूँ

                      कुटिल-सी आग में झुलसकर
                      सकल समाज ही हुआ नरक है
                     निष्ठुर नाश मनुज का देखकर
                      फूट -फूटकर रो रहा पावक है

                     एक प्रचंड तूफ़ान को उठाकर
                    दीनों-दलितों को चिताना चाहूँ
                   ऊँचे पर्वत का भी मान हिलाकर
                   द्वेष -विष जड़ से मिटाना चाहूँ

                     जब असहायों के क्रूर शोषण से
                     पाप को  नित पोषण मिलता है
                     तब जलते ज्वालामुखी पर बैठे
                   अग्निधर्माओं का धीरज हिलता है

                    एक करुण क्रोधानल में जलकर
                     दंभी कंटकों को दहकाना चाहूँ
                    शोणित शोकों का शमन करके
                     शोधन बस शोधन करना चाहूँ

                     विश्व -उदय की है झूठी गाथा
                     झूठा जयघोष ,झूठा गुणगान
                    अब नहीं सह सकता है हे!प्रभो
                     यंत्रणा से आकुल हुआ है प्राण

                      हर प्राण यदि ले ले ये संकल्प
                    तो एक नूतन विश्व बनाना चाहूँ
                    संकल्प तो अति कठिन है मगर
                     कदम उस ओर ही बढ़ाना चाहूँ .



Saturday, August 3, 2013

हाय! हाय!



हाय! हाय!
सूरज की छाती पर
दिनदहाड़े ये कैसी फड़-फड़ ?

जो चमगादड़ों में मची है चूँ-चपड़
घुग्घूओ में भी हो रही धर-पकड़...
झींगुरों का मनमाना शोर
मेंढकों में भी मीठा रोर...
सियारों में गुप्त मुलाक़ात
श्वानों का घुन्ना उत्पात...
सांप-चील का षड्यंत्र
छुछुंदर-नेवला सा ये तंत्र...
गिरगिटों का घुमड़ी परेड
मकड़ियों पर पड़ता रेड...

मधुमक्खियों में जो पड़ी फूट
मक्खियों को मिल गयी बम्पर छूट...
खच्चर-टट्टूओं में खटास
बन्दर-रीछों का लुभावना नाच...
चींटियों की ताबड़तोड़ तालियाँ
मच्छरों से छुपती नहीं गालियाँ...
चूहों में प्लेग विलायती
बिल्लियाँ बनी फिरती हिमायती...

हाईब्रिड हाथियों का मेला
शेर के हिस्से में कच्चा केला...
मगरमच्छों का आँसू-दर्शन
गोरिल्लाओं का अंग-प्रदर्शन...
ऊँटों का अनुभव ज्ञान
घोड़ों का बिना रुके सलाम...
अन्धेरा से होती फरमाइश
काले झंडों की चलती रहे नुमाइश...

हाय! हाय!
सूरज की छाती पर ही लट्ठम-लट्ठ
गड़बड़झाला भी है गड्डम-मड्ड...
देखो! बेल्ट में फँसाकर अपना पतलून
कितना मज़े में है सब नियम-क़ानून .

Sunday, July 28, 2013

चुपचाप ही सही ....




आँधियाँ तो चल रही है
चुपचाप ही सही
बोझिल-सी , डगमगाती-सी
बिना सन सन सन के
तुम्हारे ही बंद दिशाओं में...

प्राणों में पुंजित पीर है
नयन में नेही नीर है
हिम-दंश सहता ये ह्रदय-हवि
अभी तक जमा नहीं है
साँसों का गीत भी थमा नहीं है...
जो तुम्हारे सागर पर
उत्पीड़ित धूप-सा जलता रहेगा
अपने काँधे पर तुम जाल फैलाए रहो
तो भी तुम्हारे सतह पर पिघलता रहेगा....

आँधियाँ कल जो इधर आ रही थी
अब भी उड़ती है , फड़फड़ाती है
तुम्हारे ही बंद आकाश में
कबतक रोके रहोगे उसे प्रस्तर-पाश में ?

चाहो तो मना कर दो
उन पत्तियों को कि चुटकियाँ न बजाये
उन डालियों को कि चुटकियाँ न ले
और उन तरु-वृंदों को कि चुटकियों में न उड़ाये
आँधियों के इंगित को
इंगित के उन अंत:स्वर को
जो मन्त्र-भेद करता है ...

आँधियाँ है बहती रहेंगी
चुपचाप ही सही
तुम्हारा दिया पीर भी सहती रहेंगी
चुपचाप ही सही
जिसकी पड़पड़ाहट सुन कर
चिड़ियों से चुक-चुक , चिक-चिक चहकेंगी ही
उन मुरझाई कलियों से
किलक कर कुसुमावलि फूटेंगी ही....

तुम लाख उन्हें रोकने की ठानो
या उनके इंगित को मानो न मानो
पर चुपचाप ही सही
आँधियों का धर्म ही है बहना
जो जानती नहीं है कभी थमना...

यदि थम गयी तो स्वयं ही हाँफने लगेंगी
और उस अंतगति की उपकल्पना मात्र से ही
ये पूरी सृष्टि कलप कर काँपने लगेगी .



Tuesday, July 23, 2013

सावन है आया अब चले आओ ....





                   आज कोई भी बहाना न बनाओ
                   पुकारा है तुम्हें, अब चले आओ

                     तप्त सूरज  सागर में समाये
                     गो-रज से गोधूलि डगमगाए
                     एक दूरी से विहग लौट आये
                    दीप भी देहरी पे निकल आये

                    जब विकल नेह है अनुराग है
                   क्यों शलभ से विमुख आग है ?

                   आज तारों में भी कुछ तनी है
                    चाँद की किस से यूँ ठनी है ?
                    न बादलों की बात ही बनी है
                   नदियाँ भी चलती अनमनी है

                    जब अपने राह चलती चाह है
                    क्यों भ्रम में भटकती आह है ?

                   बैरिन बिंदिया भी विरहन गाये
                    सुन , चूड़ियाँ भी चुप्पी लगाए
                    मेंहदी पर न  वह रंग ही आये
                    आंसू में ही  महावर धुल जाए

                  जब प्राण से प्राण मोल है लिया
                  क्यों यह व्यथा  अनमोल दिया ?

                   साँसें सिमटी जाती सुनसान में
                   धड़कन धूल-सी उड़ी वितान में
                   ह्रदय कुछ कहता है यूँ कान में
                   आँखें घूम जाती है अनजान में

                  जब आस पर ही तो विश्वास है
                  क्यों चातक से  चूकी प्यास है ?

                  अब मेघ घिर रहे हैं  चले आओ
                  फूल खिल भर रहे हैं चले आओ
                  सब झूले तन गये हैं चले आओ
                  देखो!सावन है आया चले आओ

                  जब विवश-सा नेह है अनुराग है
                   तो मिलन से ही बुझती आग है

                  पुकारा है तुम्हें, अब चले आओ
                  आज कोई भी बहाना न बनाओ .



Saturday, July 20, 2013

निद्रा है टूटेगी ....

                   

                    निद्रा है टूटेगी , तीव्र घात करो
                    कोमल अंगों पर वज्राघात करो

                    पर उससे पहले तुम तो जागो
                   ऐसे कंबल ओढ़ कर मत भागो

                     जब चारो ओर आग लगी है
                    आलोड़नों से हर प्राण ठगी है

                    झकोरों की चपेटें हैं घनघोर
                    खोजो! उसी में छिपा है भोर

                 उस भोर से चिनगियाँ छिटकाओ
                  हर बुझी मशाल को फिर जलाओ

                   जब बुझी मशाल पुन: जलती है
                  तब रुढियों की हड्डियां गलती है

                अंधविश्वास भस्मासुर बन जाता है
                 स्वयं अपनी आँच में जल जाता है

                किया जा सकता है तभी बहुत कुछ
                 यहीं तय करो तुम अभी सब कुछ

                आशा-ही-आशा में ओंठ न सुखाओ
               कमजोरी कुचल कर अलख जगाओ

                समय की शंकाओं पर विवाद करो
                 समाधान सोच कर नव नाद करो

                 स्व उत्थान से ही नवयुग आता है
                 औ' कल्पित स्वर्ग सच हो जाता है

                   निद्रा है टूटेगी , तीव्र घात करो
                   कोमल अंगों पर वज्राघात करो .

Wednesday, July 17, 2013

मिड डे मील से बच्चों की मौत पर ....

ओ ! आसमान के रखवाले
तुम्हारे मौसम तक
जमीन को किया है
तुम्हारे ईमान के हवाले...

चाहे तो तू
जमीन का खून पी ले
या उसे पूरा ही खा ले
पर उनकी बददुआ
तुम तक ही जायेगी
और तुम्हें जब
जख्म मिलेगा तो
कोई भी मरहम-पट्टी
तुम्हारे काम न आएगी....

थोड़ी शर्म कर !
अपनी जमीर की सुन !
इन्सानियत के नाते ही सही
तू उनकी बददुआ ना ले...

याद रख !
जमीन जब फटेगी तो
तुझे ही निगल जायेगी
तब उस खिचड़ी की याद
तुम्हें बहुत रूलायेगी
जिससे ललचाकर
तुम आसमान बन जाते हो
और भरे मौसम में भी
जमीन पर सिर्फ
सूखा ही उगाते हो....

ऐसी पढ़ाई से तो
वो अनपढ़ भला
जो खिचड़ी न खा कर
अपने घास-पात पर है पला...

अब जाओ !
उन सूनी गोद को
कुछ मुआवजा से भर दो
अगले मौसम की भी
तैयारी करनी है तो
हर लाश पर
एक झाड़ूमार नौकरी के साथ
खून टपकाता हुआ
एक घर दो .

Sunday, July 14, 2013

मैं भी........


तुम कुछ भी कहो या करो
मैंने अबतक बस इतना ही जाना है
कि अस्तित्व के दो छोर हैं हम
और तुम मुझे लुढ़का रहे हो
किसी ऐसे ढ़लान पर
जो कि अनजाना है....

हो न हो कहीं किसी घाटी तले
तुम्हारा ही कोई ठीकाना हो
जहाँ ले जाकर मुझे
मेरा ही शिखर दिखाना हो
ये मानकर मैं कितना भरूँ खुद को ?

मैं भी जानती हूँ कि
मेरा कितना ही खाली खाना है
हो सकता है कि
ये लालायित लालित्य का
कोई लोकातीत ताना-बना हो
पर ऐसे अतृप्त अदेखा सच को
मैंने अबतक नहीं माना है...

इसलिए रहने दो
अपने स्वर्गीय स्नेहित स्पर्शन को
रहने दो सारी दिव्य दृप्त दर्शन को
जो मेरी इस छोटी सी समझ से बाहर है..

मैं भी बस अपनी कहना चाहती हूँ
कि मेरे लिए तो प्रिय है
चौंधियाया हुआ सुखों का आकर्षण
मर्त्य इच्छाओं का घनिष्ठ घर्षण
और उससे उत्पन्न दुःख-ताल के
उन्माद की गतियों के बीच
मैं भी झूमकर नाचना चाहती हूँ...

ह्रदय पर हथौड़े सी पड़ती
हर चोटों पर मुस्कुराना चाहती हूँ...
हर छलनामय क्षितिज के छंदों पर
छुनन-मुनन कर गुनगुनाना चाहती हूँ
और आखिरी साँस तक
बिना रुके पन्ने-पन्ने पर खुद को
लिख जाना चाहती हूँ ....

और तुम !
तुम्हें तो अविचिलित रहना है - रहो
मेरे आवेग और आक्रोश को
निरावृत निर्वात में
निखारते रहना है - निखारो
पर मैं भी
नश्वरता और संघर्ष के क्लेशों के बीच
तुम्हारी तरह ही अविचिलित रहूँगी .


Tuesday, July 9, 2013

सुमन-शय्या और मालपुआ...

'' सुमन-शय्या पर लेटे-लेटे
मालपुआ चाभने वालों के
श्री मुख से केवल
मेवा-मिष्ठान ही झड़ता है ''
भला बताइए तो
इसकी व्याख्या का प्रसंग निर्देश
अनिवार्य अंग है या नहीं ?
साथ ही इसके कार्य-कारण का
पुर्न-पुर्न व्याख्या करने हेतु
हममें-आपमें अब भी वो उमंग है या नहीं?

ये प्रश्न हमें हर प्रसंग में
स्वयं से करते रहना चाहिए
व सत्य से विमुख हुए बिना
स्वीकार भी करते रहना चाहिए कि
हमसे-आपसे समीक्षित
संदर्भगत संक्षिप्त भूमिका भी
उसके मूलभाव से कोसों दूर रहती है
और हम देखते रहते हैं कि
हमारी बेबस व्याख्या
सुमन-शय्या और मालपुए के
व्यूह में ही कैसे उलझती है ....

तब तो बस यही कहा जा सकता है कि
अपने कर्मक्षेत्र में बिन वंशी के हम
ता-ता थय्या करने वाले क्या जाने
वो सुमन-शय्या कैसे सजता है ?
और सिर के ऊपर बहते अभाव में
बस कलम चला-चला कर क्या माने
कि वो मालपुआ कैसा दिखता है ?

आइये ! हम इन बड़ी-बड़ी बातों में
अपने लिए छोटी बात छाँट लेते हैं
मज़बूरी का नाम कहीं शब्द न हो जाए
इसलिए ये छोटी बात यूँ ही बाँट लेते हैं-
कि हम अपना पसीना भी उनपर बहाए
और शब्दों को भी उनके लिए बरगलाये
पर वे खूब फले-फूले
व अपने आस-पास को भी फुलाए ...
अब तो हमें भी कुछ तय करना चाहिए
कि अपना शब्द किसपर खर्चना चाहिए ?

वैसे भी इस खण्डन-मण्डन से
उनका तो कुछ बिगड़ता नहीं है
और हमपर भी छप्पड़ फाड़ कर
सुमन-शय्या और मालपुआ बरसता नहीं है...
हाँ! आप अपनी जाने
कि आपके अन्दर क्या-क्या चलता है
पर उन सुमन-शय्या और मालपुए को
सोच-सोच कर मेरे मुँह में तो
इस किल्लती-युग में भी
दस-बीस गैलन पानी आ भरता है .

 
 

Sunday, June 30, 2013

आने वाला युग पढेगा हमें...

आने वाला युग भी पढ़ता रहेगा हमें
जैसा कि अबतक पढ़ते आ रहे हैं हम
प्रकारान्तर में हर पिछले युग को
या तो विरोधों पर आपत्तिजनक विरोध दर्ज करके
या फिर एक जटिल साम्य की खोज करके

उन अनपढ़ी लिपियों पर चिपके हुए
भुरभुरे भावाश्मों को खुरच-खुरच कर
एक संकीर्ण शोध की सतत प्रक्रिया से
अपने व्याख्यायों के परिणाम को
अपने ही तर्कों से प्रमाणित करते हुए
या फिर वतानुकूलीय विभिन्नताओं में पैदा होते
अनचीन्हे जीवाणुओं-विषाणुओं से उत्पन्न
प्रतिलिपियों के सूक्ष्म संक्रमण के
वस्तुनिष्ठ तथ्यों को यथासंभव प्रस्तुत करके
या फिर सांस्कृतिक गरिमा के प्रति
बहुआयामी भावनाओं को स्फुरित करने वाले
नई लिपियों के प्रतिरोधक तंत्रों को
अपनी गली उँगलियों पर ही सही
समय की स्याही से ठप्पा लगाते हुए

आने वाला युग भी पढ़ता रहेगा हमें
जैसा कि अबतक पढ़ते आ रहे हैं हम
एक विश्लेष्णात्मक औपचारिकता का निर्वाह करके
अनुकरण-पुनरावृत्तियों में घुले लवणों को
अपने बौद्धिकीय चुम्बक से सटाते हुए
संभवत: कुछ दूर तक ही सही
समकालीन नैतिकता को नई परिभाषा मिले
या फिर नियति के त्रासदी को कोई
प्रमाणिक हस्ताक्षर ही मिल जाए
और बुढ़ाई खांसियों का इतिहास
अपने गले के खरास से निजात पाए
व यहाँ-वहाँ फेंके अपने बलगम पर
सूखे हुए खून के धब्बों की गवाही में
हर अगला युग को वैसे ही खड़ा पाए
जैसे कि आज हम खड़े हैं .



Saturday, June 22, 2013

हे महाकाल !

ताण्डवमत्त हे महाकाल !
प्रत्येक शिरा को
चकित-कम्पित करता हुआ
तेरा ये कैसा अट्टहास है?
कि शत-शत योजनों तक
हिम पिघल कर तेरे चरणों पर ही
ऐसे लोट रहा है
देखो तो ! विध्वंस का उद्दाम लीला
हर व्याकुल-व्यथित ह्रदय को
स्मरण मात्र से ही कैसे कचोट रहा है....
तुम्हारा दिया ये घोर दु:ख
तुम्हारे ही प्रसन्न मुख को
इसतरह से क्लांत कर रहा है
कि प्रत्यक्ष महाविनाश
तेरे अप्रत्यक्ष महासृजन को ही
रौंदता- सा दिख रहा है
और समस्त अग-जग को
बड़ी वेदना में भरकर
तुमसे ही पूछने के लिए
विवश भी कर रहा है कि
तेरा ये कैसा उद्दत पौरुषबल है ?
जो अपने ही आश्रितों से ऐसा
अवांछनीय व्यवहार करता है....
क्यों निर्मम , निर्मोही-सा
क्षण भर में ही सबको
जिसतरह से नष्ट कर देता है कि
ठठरी कांपती रह जाती है
त्राहि-त्राहि करती रह जाती है....
एक तरफ तुम्हार कठोर चित्त
दूसरी तरफ सम्पूर्ण चराचर सृष्टि का
केवल उद्भव और विनाश के लिए ही
विवशता और बाध्यता....
ओ!अँधेरी गुफा में भी पथ दिखाने वाले
फिर तू ही ऐसा अन्धेरा क्यों करता है ?
रुको महाकाल !
क्षण भर के लिए ही रुको!
कातर भाव की पुकार सुनो!
अपने उन्मत्त शक्ति को सहज गति दो!
उस गति के अनुरूप ही सबको मति दो!
रक्षा करो! रक्षा करो!
हे महाकाल !
तुम्हारा जो प्रसन्न मुख है
उसी के अनुग्रह द्वारा
सबकी रक्षा करो !


  

Saturday, June 15, 2013

इसलिए मैं रुकी हूँ ...

इसलिए मैं रुकी हूँ
कि मुझे तेल से पोसा हुआ
एक मजबूत डंडा चाहिए
और शोर-विहीन
बड़ा सा डंका चाहिए...
अपना हुनर तो दिखा ही दूंगी
व बड़े-बड़े महारथियों को
धकिया कर धूल चटा ही दूंगी..
हाँ! अपनी हिम्मत को बटोरने में
बस थोड़ी हिम्मत ही जुटानी है
फिर तो
अपना और अपने बाप का
टैक्स चोरी करने के लिए
किसी से कुछ पूछना थोड़े ही है
इसके लिए अपने को
कोई कच्चा-पक्का सा
आश्वासन ही तो देना है
और दुनिया को दिखाने के लिए
किसी भी नकली कार्ड पर
लम्बी लाईन में लगकर
सड़ा हुआ राशन ही तो लेना है.....
साथ ही उन आयकर वालों को
भुना हुआ चना बनाकर चबाना है
और किसी विशेष श्रेणी की
सारी सुविधाओं को कैसे भी जुटा कर
अपना एक सुरक्षा घेरा बनाना है
ताकि मैं दम भर चोरी कर सकूँ
सबके हिस्से का भी मजा लूट सकूँ....
दिल की कहूँ तो
विशुद्ध ईमानदारी भी तो कोई चीज़ है
इसलिए एक-दूसरे को
उस कटघरे से भी बचाना है
फिर तो हमारी तिजोरी देखकर
सब ज्यादा से ज्यादा यही कहेंगे कि
अपने सीधे किये आँगन में
हम खूबसूरत पैर वाले
ठुमकते-मटकते मोर हैं
और हमें भी अपना सच कहने में
कोई शर्म नहीं है कि
अब अपने हयादार हमाम में
हम सब वैसे नंगे तो नहीं हैं
पर चिलमन पर चिलमन चढ़ाकर
खुले चरागार में चरते हुए
बड़े ही चालाक चोर हैं .


Monday, June 10, 2013

ऐसी की तैसी ....




उनकी प्रवीणता ही ऐसी है कि
जहाँ काँटा न भी हो
वहाँ भी तकनीक को घुसाकर
ऐसे गड़ा देते हैं कि
पैर तो आपस में उलझते ही हैं
साथ में अंग-प्रत्यंग भी
बहिष्कार का कोमल हथियार
हवा में यूँ ही लहरा लेते हैं

मुद्दे की तो ऐसी की तैसी
ये बहस ही है तो फिर सार्थक कैसी ?

उनकी कुशलता ही ऐसी है कि
मेजों-कुर्सियों को ऐसे सरका देते हैं
कि भारी बहुमत देखकर ही
कथ्य-प्रयोजन भी चुप्पी लगा जाते हैं
फिर तो अगल-बगल के सब
आत्मबलिदानी-सा आगे बढ़कर
अपने माथे पर कलंक-टीका
बड़े गर्व से सजा लेते हैं

विरोधों के नक्कारखाने की ऐसी की तैसी
जहाँ जूता-जूती हो वहाँ तूती कैसी ?

उनकी सफलता ही ऐसी है कि
मजाक में भी बेमेल तालमेल
मिल-बैठकर बिठा लेते हैं
और मजबूती से खड़े ढाँचे से
अपने हिसाब से ईंटों को खिसका देते हैं
जब बेचारी बेबस बुनियाद
बुबकार मारती है तो
नकली चाँद से भी बहला लेते हैं

बन्दरबाँट नियत की ऐसी की तैसी
फिर तो नक्कालों से उम्मीद ही कैसी ?

उनकी सरलता ही ऐसी है कि
संतगिरी के जूसी जुमले से भी
जेबकतरों को सहला देते हैं
जब गिट-पिट हद तोड़ने लगती है तो
जुलाब की गोलियाँ भी खुद ही
चुपके से चबा ऐसे लेते हैं
फिर तो गाली-गुफ़्ता थोक में मिले
या कि मिलती रहे तालियाँ
सबको ही ठिकाने लगा आते हैं

उन जीती मक्खी खाने वालों की ऐसी की तैसी
और उनके लिए तो ये है बस चंडूखाने की गप जैसी .



Wednesday, June 5, 2013

वह प्रसून-प्रसूता है ...




वह अकेली है
छबीली है
निगरी है
निबौरी है
जितनी कोमल
उतनी जटिल
जितनी सहज
उतनी कुटिल
तरल-सी है
पर जमी हुई
पिघला कर
बहा देती है
अपने किनारे
लगा लेती है
निचुड़ कर
निचोड़ लेती है
शब्द-सिन्धु में
अक्षर-हंस सा
छोड़ देती है...

वह अकेली है
हठीली है
निहत्थी है
निरंकुश है
विरोधी यथार्थ का
प्रतिरोध करती है
जोखिम उठाकर
शिकार बनाती है
मुटभेड़ से
कोहराम मचाती है
घमासान का
घाव सहलाती है
विवशताओं के बीच
जगह बनाती है
असहमत होकर
उम्मीद जगाती है
व्यवहार-आग्रह से
नया छंद खोजती है
घोर असंतोष में
संतोष-गीत गाती है
नितांत बंजर पर
अमरबेल उगाती है...

वह अकेली है
उर्वीली है
नियोगी है
निरति है
हर चिंता की
वह चुनौती है
हारे मन की
वह मनौती है
पर काँटों के लिए
वह करौती है
वह प्रसून-प्रसूता है
हाँ! वह कविता है .

Saturday, June 1, 2013

अँगारा को जगाना है ...




निरे पत्थर नहीं हो तुम
अतगत अचल , निष्ठुर , कठोर
आँखें मूंदे रहो , युग बीतता रहे
किसी सिद्धि की प्रतीक्षा में
या किसी पुक्कस पुजारी की दया-दृष्टि
तुम पर ऐसे पड़े कि तुम सहज ही
अवगति को उपलब्ध हो जाओ
और उसके ओट में अपने खोट का
खुलेआम बोली लगाओ
फिर उसके बाजारू वरदान से
उसके मंदिरों की शोभा बढ़ाओ
ताकि पत्थर ह्रदय जरूर खींचे आयें
फूलों से तुम्हें ही चोट दे जाए

या तुम वो पत्थर भी नहीं हो
जो अपना भविष्य , प्रतिभा और शक्ति लिए
किसी के चरण पर लोट जाए
उसकी अवांछित ठोकर से बस चोट खाए
वह तुम्हारा उपयोग करते हुए
अपने रास्ते पर सजा ले
व तुमपर मुधा मुक्ति का
चीवर चढ़ा कर खुद भोग का मजा ले
तुम उसकी भक्ति में सब भूलकर
उसकी मदारीगिरी की महिमा का गान करो
उसके बजाये डमरू पर खूब नाचो
और उसके फूंके मंत्र से राख समेटो

यदि सभ्यता और संस्कृति का पूर्ण अभ्यास करके
आत्मपीड़न हेतु पत्थर ही होना चाहते हो तो
वो पारस पत्थर नहीं हो पाओ
तो कोई बात नहीं
खुद को परख लो तो हीरा हो जाओ
यदि नहीं तो अपने कोने-कातर में दबी
चिंगारियों को रगड़ तो सकते हो
एक आग तो पैदा कर सकते हो
और जड़ पत्थर के छाती को कुरेद कर
अपने धुंधकारी आँच से धधका तो सकते हो
या तो वह अपनी कुरूपताओं की अंगीठी में
अँधेरा समेत पूरी तरह से जल जाए
या फिर उल्कापाती अँगारा हो जाए

आज ही इस महाप्रलयी अँधेरा को हराना है
हाँ ! अँगारा होकर अँगारा को जगाना है .



Wednesday, May 29, 2013

अनसुनी है नहीं ...



अहर्निश आतुरता
कहती है तुमसे आज ये
अनसुनी है नहीं
मेरी अनसुनी आवाज ये

पृक्ति से उठती प्रतिध्वनि में
तुम अपनी गहनता दे दो
पूर्व पगी प्रतीति की
साध्यंत सघनता दे दो

चाहो तो आन फेरकर
मेरी आधारशिला खींच लो
और जो निसर्ग शेष है
उसे भी तुम भींच लो

इस विसर्जन से नहीं माँगती मैं
तुमसे सर्जन का कोई वरदान
जो मेरा मूल्य खंडित कर
मुझे ही बना दिया मूल्यवान

बस मेरे मूल में
मौलिक गंध बन मिले रहो
और कल्पना के कल्पतरु पर
कामित कमल बन खिले रहो

प्रस्फुटन की पीर प्रिय है मुझे
तेरी कान्तिमयी कमलिनी बनने के लिए
मेरे रचयिता! जानती हूँ कि रचना
रची ही जाती है रक्त से सनने के लिए .


Saturday, May 25, 2013

भ्रूणमेध यज्ञ करते हुए ...


जननी जो जानती कि
वह किसी
मलेच्छ की माँ बनने जा रही है
जो जनि (स्त्री) पर ही
अत्याचार की सीमाओं का
भयानक अतिक्रमण करेगा
और अपने ऐसे घोरतम अपराध से
उसे मुँह दिखाने के लायक नहीं छोड़ेगा
तो वह स्वयं ही
अपना नाक-कान काटकर
शूर्पनखा बनना स्वीकार कर लेती .....
यदि वह जानती कि
जिसे गोद में रख
अपने आँचल का ओट देकर
अमृत-जीवन दे रही है
वही आँचल तार-तार करके
जहाँ- तहाँ विष-वमन करेगा
और जघन्यता-से कई गोद उजारेगा
तो वह स्वेच्छा से
पूतना ही बनना स्वीकार कर लेती ....
यदि वह जानती कि
थोड़े-से कागज़ के टुकड़ों के लिए
उसके मातृत्व का टुकड़ा-टुकड़ा कर
उसी के माथे पर
वह कुकृत्यों का इतिहास लिखेगा
तो वह स्वयं ही
अपने गर्भ में
वेदों-उपनिषदों का वेदी बनाती
और भ्रूणमेध यज्ञ करते हुए
एक नया वेद का सृजन कर देती
पर किसी मलेच्छ की माँ बनना
किसी कीमत पर स्वीकार नहीं करती .

Tuesday, May 21, 2013

ये ब्लॉगिंग है जनाब !


ये ब्लॉगिंग है जनाब !
जैसे हड्डी-शोरबा मिला शोख़ क़बाब
या गज़क लाजवाब
पर यहाँ नहीं है कोई नवाब
एक-दूजे का जोरदार हुकुम बजाइये
और नजराना में वही आह-वाह पाइये
नहीं तो चोर-रास्ते भी हैं , उसी से आइये
पृष्ठ-दर्शकों की संख्या इजाफा करके
उनके अंकों में ग़ुम हो जाइये
मज़ाल है कि कोई आपको टोक दे
या कहीं भी आने-जाने से रोक दे

ये ब्लॉगिंग है जनाब !
जैसे पर लगा हुआ कोई सुरखाब
या मुश्कबू बेहिसाब
यहाँ पर उठा हुआ हरएक हिजाब है
आप भी तूफानी रफ़्तार से
किसी भी विधा में खूब गर्दा उड़ाइए
गर नजरें भींचे तो नाक-कान में घुसाइये
खुद भी अपने साफ़ी से मनमुताबिक़ छानिये
दिल जितना कहे उतना भर ही मानिए
व मिजराब से छेड़कर एक-दूजे का गुण गाइये
और संगी-साथी को भी कोरस में बिठाइये

ये ब्लॉगिंग है जनाब !
जैसे उँगलियों पर नाचता हुआ सैलाब
या करामाती ख़्वाब
यहाँ पर बस चलता है तो वह है आदाब
ख़ामख़ा अपना रौब-दाब न दिखाइये
व खुद को दूज का माहताब भी न बनाइये
नज़ाकत से नाजुकख्याली में घूमिये
नफ़ासत से नाजुककलामी कीजिये
गर मीठे बोल हो तो ही मुँह खोलिए
व तखालुक को भी शालीन लफ़्जों में बोलिए
और जितना हो सके ज़ज्ब-ए-इश्क ही घोलिये

ये ब्लॉगिंग है जनाब !
जैसे न डूबने वाला आफ़ताब
या न मुरझाने वाला गुलाब
या तोहफ़ा नायाब
पर यहाँ नहीं है कोई नबाब
ये ब्लॉगिंग है जनाब !

Friday, May 17, 2013

रिश्वत न धराओ ...


मुझे किसी ऊँचे मंच पर
यूँ ही खड़ा न कराओ
खड़ा कराओ भी तो चुप रहने के लिए
राजस्व से ही रिश्वत न धराओ ....
बड़ी मुश्किल में हूँ मैं
जबसे चींटियाँ लगातार
मेरी साँसों की सच्चाई पर संदेह कर रही है
मच्छड़ खून में ही विद्रोह ढूंढ़ रहे हैं
व मक्खियाँ मेरी आत्मा का पुचारा कर रही है
और कीड़े मेरी कट्टरता से पिल रहे हैं
तो भला चुप कैसे रहूँ ?
कैसे काले चश्मे की आड़ में
अपने अंधेपन को सार्वजनिक करूँ ?
या अपने होंठों को खींचकर
उस अहिंसक मुद्रा के नीचे
कैसे युद्धखोर भाषा को छिपा लूँ ?
अब मुझे किसी भी मंच से
कूटनीति के आदर्शों का
सुन्दर शब्दों में बचाव या समर्थन नहीं चाहिए
या हर मूढ़ता के मौके पर
बेवकूफी भरी हँसी नहीं चाहिए
बल्कि तंत्र-परम्परा के प्रभाव का
विश्लेष्ण करने की पूरी स्वतंत्रता चाहिए
केवल विश्लेष्ण ही नहीं
बल्कि परिवर्तन की पुकार चाहिए
और गुप्त-पेटियों से पुच्छल सरकार नहीं
बल्कि भीषण ललकार चाहिए ....
हाँ ! मुझे तो
दहाड़ता-चीग्घारता हुआ हरएक वोट चाहिए
या कहूँ तो केवल वोट ही नहीं
बल्कि हर मंच पर बदलाव का विस्फोट चाहिए
इसलिए मुझे तमाशा बनाकर
किसी मंच पर खड़ा न कराओ
यदि खड़ा कराओ भी तो
मूर्ति बने रहने के लिए रिश्वत न धराओ .



Friday, May 10, 2013

कौन ले जाता है ?


कोई तो बता दे मुझे
कौन ले जाता है ?
मेरी नींद
सेंध कुछ ऐसी लगती है
मानो कोई
अशर्फियों से भरी संदूकड़ी को
मेरे सिरहाने ही लगा जाता है
और समुचित संरक्षण के लिए
मुझे जोगिन-सा जगा जाता है

कोई तो बता दे मुझे
कौन ले जाता है ?
मेरा चेत
चिन्हार-सा चारु हास कर
मानो कोई
एक चितवन चमक नयन में भर
मुझे मुझसे ही चुराता है या
उस सेंधिया की सिधाई कहूँ तो
मुझे मुझको ही चुकाता है

कोई तो बता दे मुझे
कौन ले जाता है ?
मेरा काँटों का सेज
रग-रोयें में एक गंध घोलकर
मनो कोई
बिखरा कर क्वांरी कलियों को
मुझे भी बहुरिया बना जाता है
और एक धुकधुकी धधकाकर
स्पर्शइन्द्रियों को उकसा जाता है

कोई तो बता दे मुझे
कौन ले जाता है ?
मेरा अंगदान
अनंग- क्रीड़ा को क्रियमाण कर
मानो कोई
लोकोपवाद को लज्जित करके
अंगलेप-सा मुझे लेस जाता है
और मेरे अंगविन्यास को उलझाकर
मुझे भी लोकातीत बना जाता है

कोई तो बता दे मुझे
कौन ले जाता है ?
मेरा............


Monday, May 6, 2013

क्षणिकाएँ ...


जैसे सूक्ष्म की शल्य-चिकित्सा का
कोई विलिखित , विख्यायित प्रमाण नहीं है
वैसे ही श्वास-सेतु से जुड़ा हरेक कण है
कोई भी अज्ञात आयाम नहीं है


          ***


जैसे सतत प्रवाह में
कोई भी अंतराल संभव नहीं है
वैसे ही इस काल में गति के लिए
कोई भी स्थान अथवा प्रतिकाल संभव नहीं है


          ***


जैसे मन के क्रकच आयत पर
जो विभाजित , विस्थापित हो सत्य नहीं होता
वैसे ही सोये अक्षरों से निस्कृत अर्थ
कभी भी नित्य नहीं होता


          ***


जैसे शीर्ण शब्दों के मध्य में
मनवांछित मौन महिमावान नहीं होता
वैसे ही आरोपित आधान में अवधान से
कोई जागतिक विराम नहीं होता


          ***


जैसे पार की अभिव्यक्ति
पार हुए बिना नहीं होती
वैसे ही भावक भावों की आप्त अनुभूति
निराकार हुए बिना नहीं होती .



क्रकच आयत ---- प्रिज्म
आधान --- प्रयत्न
अवधान --- ध्यान

Thursday, May 2, 2013

मैराथन करते हुए ...


शुक्र है कि
अनगिनत आँखों वाली जिन्दगी की
अनगिनत दिशाओं की दौड़ में
कोई डोपिंग टेस्ट-वेस्ट नहीं है
और कोई मानक मापदंड भी नहीं है...
जो जैसा चाहे , दौड़ लगा सकता है
पर जिन्दगी की इस बेमेल दौड़ में
अपने अनुकूल दौड़ का चुनाव
न कर पाने की गहरी टीस
मुझे घुन की तरह खा रही है ...
उसपर जो चाहे उस दौड़ में भी
धकिया कर दर्द ही दे जाता है
तिसपर सबसे पीछे रहकर
अपना मैराथन करने का
गम बहुत सालता है ...
काश! कोई रेफरी ही बना देता
या फिर दर्शक-दीर्घा में ही
एक सीट आरक्षित करवा देता
नहीं तो मेरे हाथों जीत का
पुरस्कार ही बंटवाता तो
अपने मैराथन से राहत मिलती....
मैं अपने प्रदर्शन में सुधार के लिए
कोशिश पर कोशिश किये जा रही हूँ
रामबाण-सीताबाण नुस्खा के साथ में
कई टोना-टोटका भी आजमा रही हूँ...
शक्तिवर्धक गोली-चूरण का
डेली हाई डोज ले रही हूँ
यदि इसी का बही-खाता बनाती तो
मेरे नाम एक रिकार्ड भी बन जाता
साथ ही उस दो बूंद को पी-पीकर
सारी बीमारियाँ उड़न-छू हो गयी
पर ये मुआ पैर है कि सीधे पड़ते ही नहीं...
कई बार तो लबालब आस्था लिए
सट्टेबाजों के चरण पर साष्टांग समर्पित कर आई
और उन मादक-द्रव्यों का भी
भरपूर सेवन कर देख लिया
पर मेरा मैराथन अपनी ही चाल में
ठुमक-ठुमक कर चल रहा है....
वैसे मैं भी पूरी तरह से
मैदान छोड़ने वालों में से नहीं हूँ
मन में विश्वास लिए
मतलब पूरा का पूरा विश्वास लिए
मैराथन किये जा रही हूँ,  किये जा रही हूँ..
वैसे.... कहने में तो अभी के अभी
अपना झंडा लहराकर
अपनी जीत की दुंदभी बजा दूँ
और आप सबको बरगला कर हरा दूँ
पर सच में मैराथन करते हुए
सबसे पीछे और सबके पीछे रहने का
गम बहुत सालता है .



Sunday, April 28, 2013

सो जाओ चुपचाप ...


कुछ नहीं
हवा का झोंका है
सो जाओ चुपचाप !
भारी मन है तो
बत्तियां बुझाकर
कर लो
जी भर विलाप !
नींद नहीं आ रही ?
तो करते रहो अपने
शपित शब्दों से संलाप...
जाने भी दो
हाँ! जिसके पंजे में
जो पड़ आता है  
उसी का गला घोंटने में
वह अड़ जाता है
व दर्द का दौरा
ये हमारा हिमवत ह्रदय
पिघल कर भी
सह जाता है..
कोई हर्जा नहीं
कि रक्तचाप
थोड़ा बढ़ा जाता है
और खून को
खौला-खौला कर
लज्जा - घृणा में
उड़ा जाता है...
कोई फिक्र नहीं
सब ठीक हो जाएगा
कल नहीं तो अगले महीने
नहीं तो अगले साल..
हाँ ! कभी न कभी
सब ठीक हो जाएगा
देर है पर अंधेर नहीं..
कुछ नहीं है ये
बस हवा का झोंका है
जो कहीं न कहीं
हर मिनट बहता रहता है
और पतित पंजों से
पंखनुचा कर
संतप्त संघात को
सहता रहता है ...
अब तो
हर अगले मिनट की
आँखों पर
काली पट्टी चढ़ाकर
लड़खड़ाती जीभ को
समझा - बुझाकर
कहना पड़ता है कि -
इसपर इतना
मत करो
प्रमथ प्रलाप
कुछ नहीं
बस हवा का झोंका है
सो जाओ चुपचाप !


Thursday, April 18, 2013

सब कुछ हाय! बहा जा रहा है ...


               उसके उन्मद में ऊभ-चूभ हूँ या कि
               सचमुच ये तन-मन दहा जा रहा है
              देखो न ! इस लघुपात्र के ऊपर से ही
               कैसे सब कुछ हाय! बहा जा रहा है

               उखड़ी-पुखड़ी साँसों से लगता है कि
                मेरा कोई संयोगी सजन आ रहा है
                पर कौन है वो जो इसतरह से मुझे
               किसलिए और कहाँ लिए जा रहा है

               मैं भरी हूँ या यूँ ही उलट दी गयी हूँ
               मुझसे कुछ भी , न कहा जा रहा है
              उपहास-उपराग रोक , टोके तब भी
              अपने उपसरण में न सुना जा रहा है

               हाय! कितना अंगड़-खंगड़ था बांधा
              एक- एक करके सब छूटा जा रहा है
              और हीरा जान जिसे जतन से गांठा
              वह भी तो अब देखो! लुटा जा रहा है

               ऐसे लुट- पीट कर ही तो , मैंने जाना
               वो लूटेरा ,  मुझमें ही भरा जा रहा है
              इस भराव से इतनी हलकी हो गयी कि
               ये उपल- सा हिया उड़ा ही जा रहा है

                मैं सिक्ता....उसको संचय करूँ कैसे ?
               यूँ बरस कर जो भिगाए जा रहा है या
               कितना उलाहना दूँ अपने पात्र को ही
               जो मुझे लघुताबोध कराये जा रहा है

               देखो न ! इस लघुपात्र के ऊपर से ही
                कैसे सब कुछ हाय! बहा जा रहा है
                मैं भरी हूँ या यूँ ही उलट दी गयी हूँ
                मुझसे कुछ भी , न कहा जा रहा है .



Saturday, April 13, 2013

दीवारों की भाषा ...


न उसने मुझे
कभी पढ़ना चाहा
न ही उसे पढने की
मैंने कोशिश की...
इस फ़रक के दरम्यान
पनपती रही
हमारी ही
दीवारों की भाषा
जो देती रही
हमारे शहतीरों को
कुछ अलग-सा अर्थ
व चौखटों-दरवाजों को
मढ़ी हुई मजबूती...
बनाती रही
हमारे अहाते में
थोड़ी-सी जगह
धूप के लिए
और बिखेरती रही
अँधेरी गुफाओं से चुने
कुछ दाने
चिड़ियों के लिए...
दीवारों की भाषा
उपेक्षित कोनों में
बनते-बिगड़ते
अनपेक्षित दरारों में
उग आये
तिनका-पातों को
खुरच-खुरच कर देती रही
हद से ज्यादा हरापन
और फूंक-फूंककर
भरती रही अपनी ही
सिहरती साँसें
हमारे चुम्बकीय घेरे में
घुमती हवा के फेफड़ों में...
साथ ही आराम से
आदिम अगियारी को
घेरकर बैठी रात को
बताती रही
अपनी ही उत्पत्ति
फिर उधेड़े लिपियों के
उधेड़-बुन से रेशों से
खींचती रही रेखाचित्र....
दीवारों की भाषा
अब झूलते चित्रों को
नीचे की खाई में
झाँकने नहीं देती है
बस कुछ
उलझे समीकरणों के बीच
बराबर का लम्बा-सा
चिह्न देकर
खींचती जा रही है
अपने अनंत तक
ताकि
अब कोई भाषांतर न हो .



Tuesday, April 9, 2013

आक्रांत हूँ ...


विभिन्न विधियों से
चलती रहती है
मेरी चरित्र-योजना ...
मैं अपनी अस्मिता को
निजता तथा विशिष्टा के
लचीले अनुपातों को
घटा-बढ़ा कर
समायोजित करती रहती हूँ
जिसके प्रभावगत प्रस्तुति से
निर्धारित भी करती हूँ कि
किस स्तर पर
अथवा किस सीमा तक
तादात्म्य स्थापित करना है ....
अनेक शैलियों में
ये चरित्र रचना-विधान
ढूंढ़ती रहती है
अपनी अभिव्यक्ति
जैसे कि -
विशेषताओं के लिए
वर्णात्मक शैली
चित्त-वृतियों के लिए
आत्मकथनात्मक शैली
आपको आकृष्ट करने के लिए
संवादात्मक शैली
वाग्जाल में क्रीड़ा हेतु
प्रसाद अथवा समास शैली
आदि-आदि
पर सच कहूँ तो
मुझे तो यही लगता है कि
मेरे अति विशिष्ट यथार्थ के
प्रभावी प्रक्षेपण के लिए
अथवा आचरण-व्यवहार के
विश्वसनीय संयोजन के लिए
केवल और केवल
अति नाटकीय शैली ही
जीवंत सम्प्रेषण का
माध्यम रह जता है
और मैं
अपनी नाटकीय मुस्कराहट की
जटिलता से आक्रांत हूँ .
 

Saturday, April 6, 2013

किसकी और कितनी बात करूँ ?





बेजुबान लुटने वालों की
कुछ बात करूँ या कि
बेख़ौफ़ लूटने वालों की...
बेकुसूर नुचे खालों की या
बेरहमी से खाल नोचने वालों की...

बेदाम पर बिकने वालों की या
बेहुरमती बेचने वालों की...
लश्करे-जुल्म सहने वालों की या कि
जुल्म-दर-जुल्म बाँटने वालों की...
शीशों के दरकते कतारों की या फिर
उन पत्थर के दिलदारों की...

किसकी और कितनी बात करूँ ?

तबक-दर-तबक बात कर लेने से
ये सिलसिला जो थम जाता तो
बेहयाई से गम खिलाने वाले
ख़ामोशी से खुद ही गम खाते...
अपने खाल के दर्द को
जिस शिद्धत से वे पहचानते
हर खाल के दर्द को भी
उसी शिद्धत से मुजर्र्ब दर्द मानते...

पर इक साँस भी चलती है तो
तेज़ , तड़पती तलवार की तरह...
काफिर बलाएँ यहाँ बढ़ती हैं
खौफ़नाक आजार की तरह...
हवा में हरवक्त मौत है मंडराती
बेदर्दी से बेदाम खालों पर ही
पुरजोर आँधियाँ है बरसाती...

कौन किससे पूछे कि
हाय! ये क्या हो रहा है ?
कहकहा लगा कहर खुद बता रहा है...

अब तो हमारे हिस्से बस यही है
कि पीटे छाती , फाड़े गला
बस बचाते हुए अपना खाल
और निकालते रहें बातों से माल...
उसे खींच कर दूर तक ले जाएँ
मजमा लगाएँ , महफ़िल सजाएँ
कफ़न फाड़कर क़यामत को बुलाएँ...

खुद को ज़िंदा रखते हुए
या तो लुटने वालों में या फिर
लूटने वालों में शामिल हो जाएँ .



Sunday, March 31, 2013

कौन यहाँ मिलनातुर नहीं है ?


                   सब ऋतुओं से गुजर कर
                  तुम ऐसे मेरे करीब आना
                  कि अपने मन के पके सारे
                  धूप-छाँव को मुझे दे जाना

                 कुछ भार तुम्हारा जाए उतर
                 कुछ तो हलका तुम हो जाओ
                  और मेरे उर के मधुबन में
                 अमृत घन बनकर खो जाओ

                  इस चितवन पथ से आकर
                 पीछे का कोई राह न रखना
                  रचे स्वप्न का सुख यहीं है
                आगे की कोई चाह न रखना

                 अक्षम प्रेम का तो आभास यही
                 आओ!अति यत्न से संचित करे
                  जीवन- स्वर के पाँव को हम
                 नुपुर बन कर ऐसे गुंजित करे

               पदचाप पुलककर नृत्य बन जाए
               रुनक- झुनक कर रोम- रोम में
                 देखो! है कैसे नटराज उजागर
                अपने इस धरा से उस व्योम में

                 हरएक अविराम गति उमंग की
               उससे छिटक-छिटक कर आती है
                तरंग- तरंग में तिर- तिर कर
                 बस उसी रंग में रंग जाती है

                 कौन यहाँ मिलनातुर नहीं है ?
                 सुनो! पूछता है यही प्रतिक्षण
             फिर मैं उत्कंठिता,तुझे क्यों न बुलाऊं ?
                उत्प्रेरित जो है ये उर्मिल आलिंगन .

Wednesday, March 20, 2013

तुमसे होली खेलना है ....


पिचकारी को कड़ाही में तला
बाल्टी में मालपुए को घोल दिया
गुब्बारे पर दही-मसाला छिड़ककर
बड़े में सब रंग भर दिया ....

अबकी बार जमकर जो
तुमसे होली खेलना है .....

ठंडई से फर्श को धो दिया
गुलाल से मिठाई बना दिया
मेवा से झालर टांग कर
गुझिया से सारा घर सजाया ....

अबकी बार जमकर जो
तुमसे होली खेलना है ....

जानती हूँ
सबकुछ उल्टा-पुल्टा हो रहा है
और सही करने के चक्कर में
कॉफी में सुबह को उबाल दिया
धूप का पकौड़ा बना कर
शाम को चटनी के लिए पीसा
और गिलास में रात को भर दिया ....

मानती हूँ
सबकुछ उल्टा-पुल्टा हो रहा है
पर अबकी बार जमकर जो
तुमसे होली खेलना है .

Saturday, March 16, 2013

पर मिट्टी नहीं है ...


आओ !
आकाश में
उड़ती हुई आँधियों !
बादलों जोर से गरजो !
बिजलियों थोड़ा और कड़को !
मैं ललकारती हूँ तुम्हें
जितना बन पड़े
तुम उतना भड़को !
अब
मेरी मजबूती को
तुम्हें सहना होगा
यदि नहीं सह सकते तो
अपनी राह में बहना होगा ...
भले ही
मिट्टी से हुआ है
मेरा निर्माण
पर मिट्टी नहीं है
ये प्राण ...
अडिग हूँ
तुम्हें ही डिगा दूंगी
प्रज्वलित प्राण से
तुम्हें ही पिघला दूंगी ...
माना कि
तुम भी हो
विकट व्यवधान , पर
अब मुझसे चलता है
मेरे विधि का
हर एक विधान .