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Saturday, November 24, 2012

मैं मनचली ...

जबसे प्रिय प्यारे के
तीखे नयन ने कुछ यूँ छुआ
मुझ रूप-गर्विता को
न जाने क्या और कुछ क्यूँ हुआ ?

अपने रूप पर ही
और इतना इतराने लगी हूँ
लुटे तन-मन की
निधि सहसा ही बिखराने लगी हूँ...

आज बस में नहीं कुछ
खो गया है सारा नियंत्रण
पा प्रिय का
पल-प्रतिपल मोहक नेह निमंत्रण...

मैं किरण-किरण भेद
कुटिल कुतूहल जगाने लगी हूँ
बड़े भोलेपन से ही
बजर बिजलियाँ गिराने लगी हूँ...

गगन को ही छुपा कर
बिरंगी बदरिया बन घिर रही हूँ
उस गंध की गंगा सी
हवाओं के संग मैं फिर रही हूँ...

जैसे कोई क्वांरी कली
प्रथम आलिंगन से खुद को छुड़ा रही हो
उस प्रणय ज्वाला को  
हर पात से लजा कर बता रही हो...

और दे भी क्या सकती हूँ
हवाला या प्रमाण अपनी बात का
बस छलिया का
छुअन ही सब हाल कहे मेरे गात का...

मैं मनचली ,मचल-मचल
अपने प्रिय को ऐसे लुभाने लगी हूँ
और मचलते प्राण से
बस प्रिय! प्रिय! प्रिय! गुनगुनाने लगी हूँ .

Sunday, November 18, 2012

सिरा खोज लूं ...



कोई
मेरे गले में
घंटी बाँध
आँखों पर पट्टियाँ चढ़ा
न जाने कहाँ
लिए जा रहा है...
पांव थककर
रुके तो पीछे से
कोड़े बरसा रहा है
कहीं दौड़ना चाहूँ तो
चारों तरफ
खाई बना रहा है...
पराई गलियों के
अनजान रोड़े भी
तरस खाने लगे हैं
सपनों में चुभे
काँटों को
सहलाने लगे हैं...
घर की महक
वापस बुलाती हैं
इसीलिए मैं
अपने समय के भीतर
खुदाई कर रही हूँ
ताकि
इन्द्रजालों के
महीन बानों को
काटकर
कोई भी
सिरा खोज लूं .

Saturday, November 10, 2012

तो ये है -


आपको दमा का दौरा दिला
हर बेहया सुबह को फूंक-फूंक सुलगाती हुई
रोटियों को हथेलियों से पीट-पीट कर
अपने स्टाईल में जलाती-पकाती हुई
सहमें नमक-प्याज संग पेट खोले गठरी में रख
पगडंडियों या रस्ते पर बदहवास दौड़ती हुई
आपको हर रोज कविता जो दिखे तो
आप उसे गुड मॉर्निंग कह सकते हैं और
अपनी च्वायस माफिक सौन्दर्य भी ढूंढ़ सकते हैं

फिर नजरें घुमाए तो
टेलर या लॉरी पर अजीब सी लटकी हुई
बसों-रेलगाड़ियों के छतों पर भी चिपकी हुई
कहीं तगारी-ईंटों से हंसी-ठिठोली करती हुई
या फिर फैक्ट्रियों के धुएँ को हराने वास्ते
ओंठों के बीच कसकर बीड़ी दबाये हुए
सारे टेंशन को छल्लों में घुमाकर
अपने हौसले से छेड़कानी करती हुई
कोई बिंदास सी कविता दिखे तो, आप
ईजिली अपने अन्दर भटकती कला को
नेशनल हाईवे पर दौड़ा सकते हैं

या फिर आपके इर्द-गिर्द
अपने झिल्लीदार आँखों से झुर्रियों के बीच फंसे
नन्हे-नन्हे जीवों को पुचकारती हुई
या अपने असली आंतो और दांतों को
किसी सेठ-साहूकार के यहाँ गिरवी लगाती हुई
या फिर किसी इंटरनेशनल ब्रांड के वास्ते
अपने गंजेपन का फोटो खिंचवाती हुई
और किसी फुटपाथ पर बिकते हुए
उताड़े कपड़ों की मजबूती जांचती हुई
उस ब्लैक एंड व्हाईट पीरीयड टाईप की
कोई कविता दिख जाए तो, बेशक आप
अपने आँखों पर काला चश्मा चढ़ाकर
न देखने का रियल एक्टिंग कर सकते हैं

या फिर गाहे-बगाहे
उस रंग-बिरंगे बीप करते बटनों पर
मक्खियों सी भिनभिनाती हुई
या किसी भी पॉलिश्ड पॉलिसी पर
छिपकलियों सी फिसल जाती हुई
और उस स्ट्रांग इकोनॉमी के नीचे
लाईटली, चींटियों सी दब जाती हुई
और तो और , हमारे-आपके
चारों तरफ दिन-रात उगते हुए
प्लास्टिक-पालीथीन को चबाती हुई
चुकरती , रंभाती वही कैटल क्लास सी
कोई कविता जो दिखे तो, आप
किसी भी पतली गली से निकल लेंगे
नहीं तो हाथी के दांतों से उलझ जायेंगे

और अक्सर रात गए
कहीं अपनी ही बोली लगाती हुई
या सामूहिक रूप से लुट जाती हुई
या फिर अपने गले के लिए फंदा बनाती हुई
कोई भी अगली सी , डर्टी सी कविता दिखे तो
आप राम-राम रटते हुए
अपने-अपने घरों में दुबक जायेंगे
और किसी फ्लॉप फिल्म की स्टोरी मान
उसको एकदम से भूल जायेगे
तो ये है -
   '' अपरिवर्तनीय और अछूत भारत की कविता ''

  ( इनकन्वर्टिबल और शनिंग इण्डिया की कविता )



Wednesday, November 7, 2012

तो ये है -


सुबह-सुबह
आँख मलते हुए आप सैर को जाएँ
वहाँ दौड़ती-भागती , चक्कर लगाती
चेहरे पर ताज़ी लालिमा उगाये
कोई कविता दिख जाए तो
बेशक ! हैरानी की कोई बात नहीं होगी
आखिर सोशलिस्ट सेहत का जो मामला है

या फिर कभी
किसी ब्यूटी पार्लर में
फेशियल-मसाज़ करवाती हुई
या बालों को रंगने के वास्ते
कुछ अलग-सा डाई चुनती हुई
या किसी बुटीक में
डिजायनर परिधानों को ट्राई करती हुई
एक गर्माहट बिखेरती जो कविता मिले
तो घबराने वाली भी
ऐसी कोई घटना नहीं होगी
चिर-युवा दिखना कौन नहीं चाहता ?

हो सकता है किसी दिन
किसी नामी-गिरामी डेंटिस्ट के यहाँ
अपने जबड़े को दुरुस्त करवाती हुई
नकली दांतों में हीरे-मोती जड़वाती हुई
यूँ ही खिलखिलाती हुई कविता मिले तो
आप भी लुढकने को तैयार हो जाएँ
आखिर खनकती चमकीली हँसी पर
कौन नहीं मर-मिटता है ?

फिर किसी शाम
हाई-प्रोफाइल सब्जी-मंडी में
आँखों को रोकती हुई
किसी बड़ी लग्जरी गाड़ी की डिक्की में
ढेरों साक-सब्जियां लदवाती हुई
जीरो-फिगर वाली कोई कविता दिखे तो
आप बस इतना ख़याल रख सकते हैं
कि अपनी दसों उँगलियाँ
कुछ ज्यादा ही चबा न लें

और फिर किसी रात
भरपूर हेल्थ-ड्रिंक्स के साथ-साथ
हेल्थ-पिल्स फांक कर
किसी सॉफ्ट म्यूजिक पर
योग-ध्यान लगाती हुई
और पूरे चैन की नींद लेती हुई
कोई कविता दिखे तो
आप जरूर पूरे जल-भुन कर
उससे रश्क खा सकते हैं
तो ये है -
'' इनक्रेडिबल और शाइनिंग इंडिया की कविता ''




...और भारत की कविता अगली कड़ी में .

Saturday, November 3, 2012

क्षणिकाएँ ...


क्षणों की लहरों ने तो
विभीषिकाओं का पाठ पढ़ाया है
पर मैंने भी हर लहर के लिए
डांड तोड़ कर डोंगा बनाया है

           ***

अमानुषिक ऊँचाइयों की परछाईयाँ
मैंने चतुराई से चापा है
और हरेक चीज़ों को बस
अपने सिर के हिसाब से नापा है

           ***

धीरे-धीरे सरक कर
सपनों के छोरों को जोड़ा है
और अस्तित्व के गिने पन्नों में
मैंने चोरी से कुछ को मोड़ा है

           ***

दो जोड़ दो को हरबार
मैंने तीन या पाँच कहा है
और निन्यानवे का फेरा लगा-लगाकर
शून्य से ही तिजोड़ी को भरा है

           ***

आईने में जैसी भी तस्वीर मिली
मैंने बस उसी को जाना है
ओर पीछे पुता कलई ने जो कुछ कहा
उसी को आँख बंद करके माना है .