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Monday, August 27, 2012

नहीं तो ...


इतना भी
घुप्प अँधेरा न करो
कि तड़ातड़ तड़कती
तड़ित-सी विघातक
व्यथा-वेदना में
तुम भी न दिखो...
इस दिए का क्या ?
तेल चूक गया है
बाती भी जल गयी है
बची हुई
चिनकती चिनगारी में
इतना धुआँ भी नहीं
कि भर दे जलन
तुम्हारी आँखों में...
क्या कहूँ ?
बस इतना ही
कि
तुम्हारी मर्जी को
स्वीकारते रहना
इतना आसान नहीं
और मर्जी से
मुकरते जाना
और भी कठिन है...
नहीं तो
पूरी ताकत से
एक धाँस धधकाकर
मिट जाती
वो चिनगारी भी...
ताकि
तुम्हारा अँधेरा
और गहरा जाता
पर तुम्हारे खाँसने की
आवाज भी
पूरी तरह खो जाती
उसी अँधेरी खनखनाहट में .

Friday, August 24, 2012

मिल जाए कुछ ...


आखिरी कसौटी को
छुए बिना
कैसे कहा जाए
कि हवा में
कितनी गर्माहट है
और वह
खुद को ही
उलीचने को
कितनी उतावली है...
पर
विचारों को उबलते
देख रही हूँ
वाष्पीकरण के
उत्ताप बिंदु पर
उद्विग्न होते भी
देख रही हूँ
चेतना के आसमान में
संघनित होते भी
देख रही हूँ
चातक ह्रदय की
विह्वलता को भी
देख रही हूँ
और
भावों को बूंदों में
बदलते हुए भी
देख रही हूँ
बस
मिल जाए कुछ
पिघले-पिघले से
शब्द
तो चट्टान भी
भला खुद को
कैसे रोक सकेंगे
गीला होने से .

Friday, August 17, 2012

अमृत चख...


कितना
सहज,सरल
है डगर
चलता चल

मत कर
अगर-मगर
लग जाए न
कहीं ठोकर
पर
मत रुक
वहीं रोकर

मटक-मटक
चल पनघट
घट भर
और घर चल

जमघट से
बचकर निकल
मत तक
इधर-उधर
तनने दे
टेढ़ी नजर
सर पर
घट रख
तन कर गुजर

तय है
यह सफ़र
मत उलझ
राह पर
रहगीर मिले
या रहबर
शुक्रिया कर
चलता चल

कहीं जाए न
साँझ ढल
घट में ही
रह जाए न
सब जल
और
रीता-रीता
बस तू
हाथ मल

प्यास तू
अमृत भी तू
छक कर
अमृत चख
फिर उगल

देर न कर
मत मचल
इधर-उधर
घट भर
और घर चल .


Monday, August 13, 2012

कुछ न बोलूँ रे!


कभी  निज  संचय न  खोलूँ  रे
और  मुख  से  कुछ न  बोलूँ  रे
लंतरानियों  को  बस   तौलूँ  रे
और   भीतर - भीतर   खौलूँ  रे!

लकड़ी  को चूम  रहा  कुल्हाड़ी
सन्यासी बनकर फिरे  है आड़ी
अकड़ा  लकड़ा  यूँ   गुर्राया करे
हरियाली को  ही धमकाया करे
दांतों  से  ऊँगली  मैं  चबाऊँ  रे
और  पुतली   को  सिकड़ाऊँ  रे!

भेड़ -शेर  में  है गजब की यारी
गड़ागड़  पीकर  मस्त शिकारी
औ ठूँठा बीड़िया बन जाया करे
जंगल को अंगूठा  दिखाया करे
ऐसे ढंढोरियो  से  मैं घबराऊँ रे
भाग डबरा में  उब-डूब  जाऊँ रे!

स्वारथ की  प्रीती  बड़ी नियारी
छतीसा मिलाप की करे तैयारी
ग्रह -नक्षत्तर  सध  जाया  करे
जादुई आँकड़ा यूँ उकसाया करे
चुपचाप सब तमाशा  मैं  देखूँ रे
गठरी में भर- भर  आशा टेकूँ रे!

गड़बड़  गरदन  पर  मौर   भारी
बिदक - बिदक  कर  घोड़ी हारी
निगोड़ा  गद्दी  पर  इतराया करे
गठजोड़ा  सरकार  चलाया  करे
बस  आँख   मैं  अपनी  सेंकूं  रे
दरिया  में   हैरानी  को   फेंकूं रे!

पर  मुख  से कुछ  न ही  बोलूँ रे !
न ही  निज  संचय  को  खोलूँ रे !


Friday, August 10, 2012

चौंको मत !


नये-नये गीत
बार-बार लिखकर भी
अपने को तनिक भी
उसमें समा न सकी
निज आहों के आशय को
इस जगती को समझा न सकी...
सोचती थी
जतन से मैंने जो कहा है
छंदित छंदों से लयबद्ध हो रहा है
अर्थों की परिभाषाओं को तोड़कर
पुलकित पद्य में ढल रहा है....
पर यह क्या ?
चेतना का शाप और
देह के धर्म में ठनी अनबन
बनी की बनी रह गयी
मैं सबसे या जीवन से या
अपने से ही छली गयी......
चाहकर भी
कंचन की जंजीर पहनकर
सपनों की झांकी में भी
क्षण भर को भी मुस्का न सकी
और औचक चाहों में भी
सोई हुई उजली रातों को
अबतक मैं जगा न सकी.....
निशदिन अँधेरे-पाख और
नन्ही परछाईं से भी डरते हुए
रह-रह कर कँप जाती हूँ
बदल-बदल कर लाख मुखौटा
क्यों अपने में ही छिप जाती हूँ...
कितना बेबस है मेरा आकाश
कि बंद दिशाओं में ही
बस उड़ता-फड़फड़ाता है
और क्षितिजों के कँटीले तारों में
उलझ-उलझ कर रह जाता है....
अब तो
हे! खारे आँसू
इन अधरों तक ही रुक जाओ
विधना विमुख है तो भी
करुण उद्गार से न चूक जाओ...
आज फिर
एक बार जी भर के
रचना में दर्द को छटपटाने दो
चौंको मत !
जगह-जगह से फूटी गागर ही सही
तनिक भी तो भर जाने दो .

Wednesday, August 1, 2012

धुंधलके में ...


साँझ के
धुंधलके में
हम तुम
जब मिलते हैं
कोई
गद्गद गीत
उभरता है ...
गा-गा कर
अक्षत अम्बर को
थिरकाता है
तर्षित तारों को
झिलमिलाता है
बातुल बिजुरी को
मचलाता है
और
चंचल चाँद को
और अधिक
दमकाता है ...
साँझ के
धुंधलके में
मंदिम-मंदिम
कहीं दीपक
जल सिहरता है
मंजिम-मंजिम
लौ झुक कर
ऐसे लिपटता है
जैसे
विकल विरह
मानो पिघलता है ...
साँझ के
धुंधलके में
क्षण-क्षण
संकोचित संगम
होता है
और सागर
सागर को ही
डूबोता है ...
प्राणों में
प्रतीक्षातुर
प्रीत लिए दिन
जैसे-जैसे
रात में
खोता है .