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Saturday, December 8, 2012

ऐ ! आलोचना के बाबुओं ...


क्या कहूँ ?
इस मुख से कहते हुए
बड़ी ही लज्जा सी आती है
कि कैसे
आज की कविता अपना चीरहरण
खुद ही करवाती है
और अपनी सफाई देते हुए
बात-बात में
गीता या सीता को
बड़ी बेशर्मी से ले आती है ...
और तो और
आल्वेज हॉट राम-कृष्ण का
कलरफुल कॉकटेल बनाकर
सबको उकसाती है , लुभाती है ...
ऐ ! आलोचना के बाबुओं
आप अपने को बचाए रखिये
बामुश्किल से चलती परम्परा को
किसी भी कीमत पर निभाये रखिये
यदि आपको कोई
ऑफर पर ऑफर दे भी तो
अपनी नजरें फिराए रखिये
और आपके कम्बल के भीतर
भला झाँकता कौन है ?
ये जो आज की नशीली कविता
कुछ ज्यादा ही बहकने लगे तो
उसी गीता या सीता को
हाजिर-नाजिर करके
जोर-जबरदस्ती से ही सही
अपना नीबूं-अचार चटाते रहिये .

30 comments:

  1. आज की कविता अपना चीरहरण
    खुद ही करवाती है .... ?
    जोर-जबरदस्ती से ही सही
    अपना नीबूं-अचार चटाते रहिये .... चीरहरण नहीं होगा ?

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  2. behatareen andaj me ek behatareen prastuti*******इस मुख से कहते हुए
    बड़ी ही लज्जा सी आती है
    कि कैसे
    आज की कविता अपना चीरहरण
    खुद ही करवाती है
    और अपनी सफाई देते हुए
    बात-बात में
    गीता या सीता को
    बड़ी बेशर्मी से ले आती है ...जोर-जबरदस्ती से ही सही
    अपना नीबूं-अचार चटाते रहिये .

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  3. क्या कहूँ......
    :
    :
    :
    :
    अनु

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  4. शब्द स्वयं ही सक्षम हैं जब, मन को असफल क्यों माने।

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  5. क्या कहूँ ?
    इस मुख से कहते हुए
    बड़ी ही लज्जा सी आती है
    कि कैसे
    आज की कविता अपना चीरहरण
    खुद ही करवाती है,,,,

    बहुत सुंदर रचना ....

    recent post: बात न करो,

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  6. ये जो आज की नशीली कविता
    कुछ ज्यादा ही बहकने लगे तो
    उसी गीता या सीता को
    हाजिर-नाजिर करके
    जोर-जबरदस्ती से ही सही
    अपना नीबूं-अचार चटाते रहिये .

    क्या करियेगा आजकल यही तो बिक जा रहा है

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  7. बिलकुल सच्ची बात कही है.

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  8. मज़ा आ गया व्यंग की इस सरिता में ...
    बहुत खूब ..

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  9. आज की कविता अपना चीरहरण
    खुद ही करवाती है
    और अपनी सफाई देते हुए
    बात-बात में
    गीता या सीता को
    बड़ी बेशर्मी से ले आती है ...

    आज कुछ नया अंदाज दिखा और बहुत पसंद भी आया ये रूप.

    बधाई अमृता जी.

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  10. आज की कविता अपना चीरहरण
    खुद ही करवाती है
    और अपनी सफाई देते हुए
    बात-बात में
    गीता या सीता को
    बड़ी बेशर्मी से ले आती है ...

    धारदार कटाक्ष ....अमृता जी ....लाजवाब रचना ...

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  11. कभी-कभी कविता इन भावों में यूँ भी बहती है ...
    गहन भाव ... लिये उत्‍कृष्‍ट लेखन

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  12. इस बार आपकी कविता बिलकुल अलग रंग में यथार्थ का हंटर बरसाती हुई |भाषा भी सहज और ग्राह्य |अच्छा लगा |

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  13. सुन्दर चित्रण...उम्दा प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

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  14. कविता का चीरहरण....किसे कहें ये कई बार समझ नहीं आता..कुछ पंसद नही आती तो लगता है कि कविता नहीं कही..फिर निराला याद आते हैं मुक्तछंत को प्रतिष्ठित करने वाले...कभी लगता है ये तो गद्ध ही बन गया है..लेकिन फिर सरलता से कही बात कविता भी लगती है..ये तो मन है जो बहता है तो कविता कह देता है..कभी किसी की आलोचना कर देता है।

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  15. This comment has been removed by the author.

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  16. बेबाक, किन्तु सटीक ....
    हिन्दी भाषी भाषा, उप-भाषा, और विदेशी भाषा के साहित्य (गध्य अथवा पद्य ) को केवल पठनीयता और विचारों की तार्किक अन्वेश्ना के चलते ही पढने की रोचकता पाते है रही नीबू अचार वाली देशजता तो वो हिदुस्तानियों की पहचान बन चुकी है हमारी चाहत पर बनावट लाख पोती जाए ..... चना चिरोरी और निम्बू अचार लिखा हुआ पढ़ भर लेने से
    मुंह पानी से भर जाता है ।
    आदरणीया अमृता जी आपकी प्रामाणिक रचना उत्तम शब्द चयन की कला अभिभूत करती हैं ....
    मेरा साधुवाद स्वीकार्य हो .... प्रदीप .

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  17. You have a good job. I have enjoyed your web blog. Nice blog. I will keep visiting this blog very often. From Dont Be that guy

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  18. ये जो आज की नशीली कविता
    कुछ ज्यादा ही बहकने लगे तो......
    --------------------------------
    आपके शब्दों का तो कोई जवाब नहीं होता. बस प्रहार दर प्रहार बरसता है..

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  19. आपकी कविता में शब्दों का संयोजन प्रशंसनीय होता है। मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद।

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  20. उफफ्फ्फ्फ़......आज तो बहुत तीखे तेवर हैं......कविता के ।

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  21. Amrita,

    KISI BHI KALAAKAAR KO APNI SEEMA KAA PATAA HONAA BAHUT HI ZAROORI HAI. TABHI ALOCHAKON KO BHI KUCHCHH GALAT KAHNE KAA MOKAA NAHIN MILEGAA.

    Take care

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  22. सादर आमंत्रण,
    आपका ब्लॉग 'हिंदी चिट्ठा संकलक' पर नहीं है,
    कृपया इसे शामिल कीजिए - http://goo.gl/7mRhq

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  23. वाह.... बढ़िया कटाक्ष

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  24. आलाचकों के लिए पथ्य कुपथ्य :-)

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  25. आलोचना का अपना संसार है जिसमें गिरोहबाज़ी है. फिर भी हर आदमी का अपना गिरेहबान होता है. उसे इसकी याद तो करानी ही पड़ती है.
    आज कल अपनी सेहत के सबसे खराब फ़ेज़ में से गुज़र रहा हूँ. कम ब्लॉग्ज़ पर जा रहा हूँ. शायद अब मेरी गतिविधि कम ही रहेगी. आपका ब्लॉग मेरी सैरगाह में रहेगा.

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