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Tuesday, December 4, 2012

डर मत मन ...



               इति-इति पर अड़ मत मन
               नेति-नेति से लड़ मत मन
                दुगुना दुःख कर मत मन
               वेदना से तू , डर मत मन

              गहन कोमलता जब लुटती है
                इक टीस सी तब उठती है
                मधुघट भी फूट जाता है
              मृदुमिटटी में मिल जाता है
               मृत्यु पूर्व ही मर मत मन
               वेदना से तू , डर मत मन

                 ह्रदय खोल और हुक उठा
              पुण्य प्रबल है , बस उसे लुटा
               जतन से चुभन को सहेज ले
                अगन को सूरज का तेज दे
               उत उलझन में पड़ मत मन
                वेदना से तू , डर मत मन

               व्यर्थ ही मिलती नहीं पीड़ा
              शैवाल तले बहती सदानीरा
              उपल के अवरोधों को सहती
               जल से ही जलधि है बनती
               अंजुली छोटी कर मत मन
                वेदना से तू , डर मत मन

               दुगुना दुःख कर मत मन
               वेदना से तू , डर मत मन .



36 comments:

  1. व्यर्थ ही मिलती नहीं पीड़ा
    शैवाल तले बहती सदानीरा
    ------------------------
    सुन्दर और बेहद सुन्दर रचना

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    Replies
    1. namaskaar marata ji
      bahut sundar geet m badhai ,bahut aachi lagi aapki yah post

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  2. वाह..
    बहुत बहुत सुन्दर...
    भाव भी ,लय भी....
    बहुत खूब.

    अनु

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  3. बहुत ही सुन्दर और दार्शनिक विचारों से ओतप्रोत कविता |

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  4. गहन कोमलता जब लुटती है
    इक टीस सी तब उठती है
    मधुघट भी फूट जाता है
    मृदुमिटटी में मिल जाता है
    मृत्यु पूर्व ही मर मत मन
    वेदना से तू , डर मत मन

    सुन्दर भाव जीने की प्रेरणा देते हुये

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  5. व्यर्थ ही मिलती नहीं पीड़ा
    शैवाल तले बहती सदानीरा
    उपल के अवरोधों को सहती
    जल से ही जलधि है बनती
    अंजुली छोटी कर मत मन
    वेदना से तू , डर मत मन
    प्रबल आत्मबल झलकाता अमृतमय अद्भुत काव्य ....
    बहुत सुंदर रचना अमृता जी ....

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  6. व्यर्थ ही मिलती नहीं पीड़ा
    शैवाल तले बहती सदानीरा
    उपल के अवरोधों को सहती
    जल से ही जलधि है बनती
    अंजुली छोटी कर मत मन
    वेदना से तू , डर मत मन

    रचना की हर पंक्ति बहुत सुंदर ....सार्थक संदेश देती खूबसूरत रचना

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  7. सार्थक सन्देश, सुंदर पंक्तियाँ,,,,

    recent post: बात न करो,

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  8. ह्रदय खोल और हुक उठा
    पुण्य प्रबल है , बस उसे लुटा
    जतन से चुभन को सहेज ले
    अगन को सूरज का तेज दे
    उत उलझन में पड़ मत मन
    वेदना से तू , डर मत मन

    बहुत कोमल कान्त पदावली है ,हृदय के भावों की विरुदावली है आपने "ह्रदय खोल और 'हुक' उठा"का प्रयोग किया है तो कुछ सोच समझके ही किया होगा .मीटर और गेयता इस पद की "हूक "लिखने पर बढ़ जाती है .बहर सूरत आप ज्यादा जानती हैं इस शब्द की रंगस्थली को .हुक है क्या ?अंग्रेजी वाला "हुक "है .

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  9. बहुत ही खुबसूरत प्रस्तुति । मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद।

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  10. मेरे मन न हार तू, डरना नहीं तू जान लें |
    पीड़ा नहीं है व्यर्थ मिलते, सत्य को तू पहचान ले ||

    आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (05-12-12) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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  11. व्यर्थ ही मिलती नहीं पीड़ा
    शैवाल तले बहती सदानीरा
    उपल के अवरोधों को सहती
    जल से ही जलधि है बनती
    अंजुली छोटी कर मत मन
    वेदना से तू , डर मत मन

    दुगुना दुःख कर मत मन
    वेदना से तू , डर मत मन .

    सार्थक संदेश देती रचना

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  12. ह्रदय खोल और हुक उठा
    पुण्य प्रबल है , बस उसे लुटा
    जतन से चुभन को सहेज ले
    अगन को सूरज का तेज दे

    बहुत सुन्दर भाव

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  13. वेदना से मत डर मन ...
    प्रेरक !

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  14. बहुत अच्छी लगी आपकी कविता.

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  15. ह्रदय खोल और हुक उठा
    पुण्य प्रबल है , बस उसे लुटा
    जतन से चुभन को सहेज ले
    अगन को सूरज का तेज दे
    उत उलझन में पड़ मत मन
    वेदना से तू , डर मत मन
    बेहद गहन भाव लिये यह पंक्तियां ... अनुपम प्रस्‍तुति

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  16. लय और भाव का अद्भुत संगम... बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...

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  17. srthak sandesh ke sath prernadayee rachna..

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  18. शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन.
    बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी.बेह्तरीन अभिव्यक्ति!शुभकामनायें.
    आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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  19. बेहद उम्दा.

    सादर.

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  20. डरना हमने छोड़ दिया है,
    आँख बन्द कर मोड़ लिया है।

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  21. नियति के प्रवाह के आगे विवश हम सभी -किन्तु इसे भी एक सकारात्मक रूप से सहज ही कवयित्री का स्वीकारना भाया

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  22. बेहद प्रभावी अभिव्यक्ति

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  23. अंजुली छोटी कर मत मन,
    वेदना से तू , डर मत मन.

    सार्थक सन्देश देती सुंदर प्रस्तुति.

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  24. अंतःकरण में उजाला लौटाती कविता. बहुत ही खूबसूरत है. इऩ दिनों ऐसे ही भावों की आवश्यकता थी.

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  25. व्यर्थ ही मिलती नहीं पीड़ा
    शैवाल तले बहती सदानीरा
    उपल के अवरोधों को सहती
    जल से ही जलधि है बनती
    अंजुली छोटी कर मत मन
    वेदना से तू , डर मत मन ...

    सार्थक सन्देश .. आशा ओर विशवास के दीप जलाती मधुर रचना ...

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  26. सुंदर प्रेरणादायी कविता

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  27. बहुत ही शानदार........दिल को छूती पंक्तियाँ ।

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  28. Amrita,

    PRERNAATMAK KAVITAA.

    Take care

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  29. अद्भुत कविता। जीवन दर्शन को शब्द देती हुई। जीवन को कई आयामों से बेहतर बनाने के रास्ते की तलाश करती सी प्रतीत होती है कविता। स्वागत है।

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  30. शब्दों में सम्मोहन है . कई बार पढ़ रहा हूँ !

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