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Sunday, November 18, 2012

सिरा खोज लूं ...



कोई
मेरे गले में
घंटी बाँध
आँखों पर पट्टियाँ चढ़ा
न जाने कहाँ
लिए जा रहा है...
पांव थककर
रुके तो पीछे से
कोड़े बरसा रहा है
कहीं दौड़ना चाहूँ तो
चारों तरफ
खाई बना रहा है...
पराई गलियों के
अनजान रोड़े भी
तरस खाने लगे हैं
सपनों में चुभे
काँटों को
सहलाने लगे हैं...
घर की महक
वापस बुलाती हैं
इसीलिए मैं
अपने समय के भीतर
खुदाई कर रही हूँ
ताकि
इन्द्रजालों के
महीन बानों को
काटकर
कोई भी
सिरा खोज लूं .

34 comments:

  1. खुदाई कर रही हूँ
    ताकि
    इन्द्रजालों के
    महीन बानों को
    काटकर
    कोई भी
    सिरा खोज लूं .

    अच्छी रचना...अंतिम पंक्तियाँ तो बहुत ही अच्छी लगीं....!

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  2. कल 19/11/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. बढ़िया -

    आभार आदरेया ।।

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  4. उम्र के खेल में इक तरफ़ा है ये रस्सा कशी
    मुझसे तगड़ा भी है और सामने आता भी...

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  5. इसीलिए मैं
    अपने समय के भीतर
    खुदाई कर रही हूँ

    एक सिरे की तलाश में.... गहन अभिव्यक्ति

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  6. बहुत ख़ूब!
    आपकी यह सुन्दर प्रविष्टि कल दिनांक 19-11-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-1068 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  7. न आदि ज्ञात, न अन्त ज्ञात,
    न अन्तरमन का द्वन्द्व ज्ञात,
    यदि ज्ञात अभी, बस वर्तमान,
    एक साँस उतरती रन्ध्र ज्ञात,

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  8. वाह...
    मन की उलझन सुलझे कैसे....सिरा मिलता नहीं..
    बहुत सुन्दर भाव..

    अनु

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  9. पराई गलियों के
    अनजान रोड़े भी
    तरस खाने लगे हैं
    सपनों में चुभे
    काँटों को
    सहलाने लगे हैं... So nice .awsm

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  10. mil jaye koi sira to laut sakun wahan----jahan se khud ke hone ka ehsaas jaagta hai

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  11. इन्द्रजालों के
    महीन बानों को
    काटकर
    कोई भी
    सिरा खोज लूं ,,,,.बहुत सुंदर भाव,,

    recent post...: अपने साये में जीने दो.

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  12. Amrita,

    BANDISH BAHUT HI CHUBHTI HAI.

    Take care

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  13. बहुत सुंदर भाव,,सपनों में चुभे
    काँटों को
    सहलाने लगे हैं...
    घर की महक

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  14. उम्दा भाव और निराला भावों को पिरोने का ढंग...

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  15. पराई गलियों के
    अनजान रोड़े भी
    तरस खाने लगे हैं
    सपनों में चुभे
    काँटों को
    सहलाने लगे हैं...

    वाह

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  16. अपने समय के भीतर
    खुदाई कर रही हूँ
    ताकि
    इन्द्रजालों के
    महीन बानों को
    काटकर
    कोई भी
    सिरा खोज लूं .
    मन कही उस सिरे पर ही उलझा रहता है . मुश्किल है सुलझाना !

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  17. बेहतरीन, अतुलनीय प्रस्तुति.

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  18. बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.

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  19. बेहतरीन और शानदार।

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  20. गहन भाव लिए बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति...

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  21. इस उलझन का तो कोई ओर छोर ही नहीं मिलता ......अच्छी अभिव्यक्ति !!!

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  22. बहुत सुन्दर रचना है उद्धरण काबिल :

    सिरा खोज लूं ...


    कोई
    मेरे गले में
    घंटी बाँध
    आँखों पर पट्टियाँ चढ़ा
    न जाने कहाँ
    लिए जा रहा है...
    पांव थककर
    रुके तो पीछे से
    कोड़े बरसा रहा है
    कहीं दौड़ना चाहूँ तो
    चारों तरफ
    खाई बना रहा है...
    पराई गलियों के
    अनजान रोड़े भी
    तरस खाने लगे हैं
    सपनों में चुभे
    काँटों को
    सहलाने लगे हैं...
    घर की महक
    वापस बुलाती हैं
    इसीलिए मैं
    अपने समय के भीतर
    खुदाई कर रही हूँ
    ताकि
    इन्द्रजालों के
    महीन बानों को
    काटकर
    कोई भी
    सिरा खोज लूं .

    बधाई अमृता जी तन्मय .

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  23. बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति सुंदर शब्द संयोजन वाह

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  24. ताकि
    इन्द्रजालों के
    महीन बानों को
    काटकर
    कोई भी
    सिरा खोज लूं .
    शानदार भावभिव्यक्ति ....

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  25. बहुत सुंदर । मेरे नए पोस्ट पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  26. इसीलिए मैं
    अपने समय के भीतर
    खुदाई कर रही हूँ
    ताकि
    इन्द्रजालों के
    महीन बानों को
    काटकर
    कोई भी
    सिरा खोज लूं .


    बहुत सुंदर और गहन प्रस्तुति .....
    जीवन की जद्दोजहद मे उलझा हुआ मन ...स्वयं को सुलझाने की कोशिश मे लगा ...
    बहुत सार्थक प्रयास ....

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  27. अपने समय के भीतर
    खुदाई कर रही हूँ
    ताकि
    इन्द्रजालों के
    महीन बानों को
    काटकर
    कोई भी
    सिरा
    खोज लूं .
    -यही तो मुश्किल है ,इतने लपेटे कि कोई सिरा हाथ नहीं आता !

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  28. ज़िन्दगी तेरी अता है तो ये जानेवाला
    तेरी बख़्शीश तेरी दहलीज़ पे धर जाएगा.............

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  29. जीवन पथ व यात्रा कठिन व रहस्यमयी तो है किंतु यही इसका रोमांच,आनंद व सुंदरता भी तो है।
    सुंदर रचना ।
    मेरे ब्लॉग पर नयी पोस्ट -
    विचार बनायें जीवन

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  30. इतनी पीड़ा का सिरा कैसे मिल पाएगा. कविता की जीवंतता इसी में है कि उसे ढूँढा जाए....जैसे भी हो....बहुत खूब.

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