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Tuesday, October 16, 2012

कि पीर-सी लगे जुन्हाई...





                               ये कौन-सी रुत है आई 
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                             चाँद चुट-चुट चुटकी बजाए
                           मंद,मदिर-सा मलय लहराए
                           पर मेरे व्याकुल मन के लिए 
                            मेरे प्रीत की पुकार न आये
                           न ही बाजे प्राणों की शहनाई 
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                       नदियाँ पतुरिया-सी पायल बजाये
                          रात की रानी चूड़ियाँ खनकाए
                        बगिया में बिरही-बहार छिपकर 
                            गोपन-बिध से मुझे रिझाए
                             पर बेसुधी है मुझपर छाई 
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                             मन नहीं लगता क्या करूँ ?
                            प्रण नहीं निभता क्या करूँ ?
                           कुंठित-शंकित हर साँस लिए
                             दिन नहीं उगता क्या करूँ ?
                            न ही आई सुधि की पुरवाई
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                              आँखों में सपनों का खेला
                             अधर तक है अश्रु का रेला
                             कान में मेरे कोई ये कहता
                            कि लागूँ मैं खुद को ही मेला
                             खीजकर चेतना कसमसाई
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                               मेरे गीतों को जग गाये
                             अपना सौ-सौ अर्थ लगाए
                            जिसके लिए प्राण गीत रचे 
                             बस उसे ही समझ न आये
                          आह! मेरी आह उसे छू न पाई 
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                                ये कौन-सी रुत है आई 
                               कि पीर-सी लगे जुन्हाई .


          ( जुन्हाई - चाँदनी )

33 comments:

  1. मेरे गीतों को जग गाये
    अपना सौ-सौ अर्थ लगाए
    जिसके लिए प्राण गीत रचे
    बस उसे ही समझ न आये

    वाह ... बहुत खूब

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  2. बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है
    न रोया कर, बहुत रोने से छाती बैठ जाती है
    .....................................

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  3. बहुत खूबसूरती से पीर को उकेरा है ... सुंदर रचना ।

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  4. मेरे गीतों को जग गाये
    अपना सौ-सौ अर्थ लगाए
    जिसके लिए प्राण गीत रचे
    बस उसे ही समझ न आये
    आह! मेरी आह उसे छू न पाई
    कि पीर-सी लगे जुन्हाई....बहुत सुन्दर भाव..

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  5. गीत अपने,अर्थ दूजे के .... यही तो होता आया है

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  6. बहुत सुंदर रचना
    क्या बात..


    नदियाँ पतुरिया-सी पायल बजाये
    रात की रानी चूड़ियाँ खनकाए
    बगिया में बिरही-बहार छिपकर
    गोपन-बिध से मुझे रिझाए
    पर बेसुधी है मुझपर छाई
    कि पीर-सी लगे जुन्हाई

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  7. बहुत ही सुन्दर रचना...
    :-)

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  8. वाह ....
    बहुत सुन्दर...

    मेरे गीतों को जग गाये
    अपना सौ-सौ अर्थ लगाए
    जिसके लिए प्राण गीत रचे
    बस उसे ही समझ न आये
    आह! मेरी आह उसे छू न पाई
    कि पीर-सी लगे जुन्हाई
    बहुत प्यारा गीत..
    अनु

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  9. भावों की बाँसुरी पर मीठे राग भरा सुंदर गीत।

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  10. खूबशूरत मनभावन बहुत प्यारा सुंदर गीत,,,,

    नवरात्रि की शुभकामनाएं,,,,

    RECENT POST ...: यादों की ओढ़नी

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  11. Amrita,

    JISKE LIYE SAB KUCHCHH KIYAA USE HI SAMAJH NAA AAYE TO MAN KO KAISAA LAGTAA HAI BAHUT SUNDER SHABDON MEIN KAHAA.

    Take care

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  12. न जाने क्यों अपने बहुत नजदीक लगी है इसकी हर स्तर ......

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  13. सुन्दर रचना...

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  14. नदियाँ पतुरिया-सी पायल बजाये
    रात की रानी चूड़ियाँ खनकाए
    बगिया में बिरही-बहार छिपकर
    गोपन-बिध से मुझे रिझाए
    पर बेसुधी है मुझपर छाई
    कि पीर-सी लगे जुन्हाई

    बहुत ही सुन्दर नहीं मंत्र मुग्ध कर देने वाली अनुभूति की अभिव्यक्ति

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  15. सच है ऐसी मनस्थिति में सुखद क्रिया-व्यापार भी काटने दौड़ते हैं -बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति !

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  16. बहुत सुदंर गीत है. शायद मन के आत्मसम्मोहन की एक अवस्था से निकला गीत है.

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  17. मेरे गीतों को जग गाये
    अपना सौ-सौ अर्थ लगाए
    जिसके लिए प्राण गीत रचे
    बस उसे ही समझ न आये

    वाह वाह....बहुत ही सुन्दर ।

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  18. मेरे गीतों को जग गाये
    अपना सौ-सौ अर्थ लगाए
    जिसके लिए प्राण गीत रचे
    बस उसे ही समझ न आये

    हमेशा की तरह प्रभावित करती रचना

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  19. बड़ा ही प्यारा गीत है...

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  20. अच्छा हुआ जुन्हाई का अर्थ बता दिया ..
    तब फिर से कविता पढी :-)
    मुझे वियोग की कविता न जाने क्यों नहीं रुचती ?
    यह तो निरे वियोग की है :-(

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  21. कविता शिल्प भाव प्रस्तुति में बहुत प्रभावी है -मैंने तो बस अपने रूचि की बात कही है ऊपर!

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  22. बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही भावनामई रचना.बहुत बधाई आपको

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  23. सुन्दर रचना..

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  24. अब शब्द नहीं होते मेरे पास प्रसंशा को. क्या लिखूं ?

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  25. आँखों में सपनों का खेला
    अधर तक है अश्रु का रेला
    कान में मेरे कोई ये कहता
    कि लागूँ मैं खुद को ही मेला
    खीजकर चेतना कसमसाई
    कि पीर-सी लगे जुन्हाई

    ...वाह! बहुत सुन्दर अहसास और उनकी लाज़वाब अभिव्यक्ति...

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  26. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ...

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  27. आपकी हर रचना अच्छी लगती है।मेरे नए पोस्ट पर आपका हार्दिक स्वागत है। धन्यवाद।

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  28. बहुत सुन्दर .बहुत खूब,बेह्तरीन अभिव्यक्ति

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