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Sunday, September 16, 2012

कुछ तो नाम चाहिए ...


आओ , कोई भी मुद्दा लो
प्यार से चीरा लगाओ
जितना अंट सके , उससे ज्यादा ही
उसमें विस्फोटक पदार्थों को भरो...
उसे अफवाहों से कसकर लपेटो
पूरा दम लगाकर
हवा में जोर से उछाल दो...
स्वर्णपदक पाए निशानेबाज़ की तरह
निशाना साधो , गोली दागो
धारदार धमाका होगा
और मुद्दा
न जाने कितने ही टुकड़ों में
जगह -जगह बिखर जाएगा...
चिनगियाँ लपकने वाले तो
यूँ ही लार टपकाए फिरते हैं
थूक -खखार लपेट -लपेट कर
मुद्दे पर आग उगलते हैं...
आग की लपटें आपस में ही
लड़-झगड़कर लिपट जाती हैं
और मुद्दई मुद्दे पर
मुरौवत दिखा कर
मुनासिब मुलम्मा चढ़ा आती है....
भई ! सच तो यही है
कि सबको मीठा , रसीला
सदाबहार आम चाहिए
खाली बैठने से बेहतर है
कि कोई तो काम चाहिए
और  आग उगलने में अव्वल होकर
नामाकूल ही सही
पर कुछ तो नाम चाहिए .

40 comments:

  1. और मुद्दा
    न जाने कितने ही टुकड़ों में
    जगह -जगह बिखर जाएगा...
    .........................................
    एकदम सीधी बात.. कड़वी बात.. तीत..तीत बात

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  2. Kaun sa mudda?Kisi mudde ka nam to lo! Yahan to afsono ki tarah mudde hazaro hain!

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    1. muddon ki bhi kya koi kami hai kya?apne pasand aur jarurat ke hisab se pasand kar lena bhar hai.

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  3. नाम के लिए सुकृत्य ज़रूरी नहीं, गलत वाण गलत दिशा में चलाओ...नाम सुर्ख़ियों में आना ही है

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  4. तीखी....आग उगलती बात...

    बेहतरीन!!!

    अनु

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  5. Amrita,

    VRATMAAN STITHI KAA BILKUL SAHI VYAKHYAAN KIYAA HAI AAPNE. MUDDE KI PRAWAAH KISKO HAI, KEWAL NAAM HI TO CHAHIYE.

    Take care

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  6. हाँ ऐसी ही विस्फोटक स्थिति है देश की .बढ़िया रचना .

    कैग नहीं ये कागा है ,जिसके सिर पे बैठ गया ,वो अभागा है



    Virendra Kumar SharmaSeptember 16, 2012 9:06 PM
    कैग नहीं ये कागा है ,जिसके सिर पे बैठ गया ,वो अभागा है
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/2012/09/blog-post_2719.html

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  7. waah Amrita ji ...jabardast ...
    teekha prahar lekhani se ...

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  8. वाह!
    आपकी इस ख़ूबसूरत प्रविष्टि को आज दिनांक 17-09-2012 को ट्रैफिक सिग्नल सी ज़िन्दगी : सोमवारीय चर्चामंच-1005 पर लिंक किया जा रहा है। सादर सूचनार्थ

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  9. भई ! सच तो यही है
    कि सबको मीठा , रसीला
    सदाबहार आम चाहिए
    खाली बैठने से बेहतर है
    कि कोई तो काम चाहिए
    और आग उगलने में अव्वल होकर
    नामाकूल ही सही
    पर कुछ तो नाम चाहिए .

    यही तो एक कम बच गया है ?

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  10. कि कोई तो काम चाहिए
    और आग उगलने में अव्वल होकर
    नामाकूल ही सही
    पर कुछ तो नाम चाहिए .
    बदनाम हो तब भी नाम ही चाहिए ...वर्तमान परिस्थितियों में यह रंज दिन प्रति दिन और गहरा होता जाता है !

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  11. लड़ने के लिये कोई तो बहाना चाहिये, बिना उसके मन की आग कैसे निकलेगी भला?

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  12. आग उगलने में अव्वल होकर
    नामाकूल ही सही
    पर कुछ तो नाम चाहिए
    बिलकुल सही !!

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  13. बेहतरीन प्रस्तुति

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  14. बहुत जबरदस्त कटाक्ष किया है रचना में वाह

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  15. अमृता जी, आपने बात तो बहुत पते की कही है और बहुत तीखी..मगर बिलकुल सच..

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  16. बेहद गहन और तीखा.....और कडवा सच ।

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  17. इंसान ख़ुद को अमनपसंद कहता है लेकिन स्वभाव से लड़ाका है. मुद्दे तो ढूँढ ही लेगा. बहुत बढ़िया रचना.

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  18. मुद्दों और अफवाहों का बाज़ार आज भी ग्राम रहता हैं हर वक्त ...एक नाज़ुक सी स्थिति

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  19. बिलकुल सही बात...कुछ तो काम चाहिए... नामाकूल ही सही पर कुछ तो नाम चाहिए ....

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  20. क्या बात है अमृता जी.
    खूब नून मिर्च लगा डाली है आपने.
    चटपटी सी सी करती प्रस्तुति लगी जी.

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  21. तीखी और असरदार बात...
    बेहतरीन...
    :-)

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  22. Nicely presented, neatly written great lines Amrita.. Keep writing..

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  23. हाहाहा हा मुद्दा सरकार की तरह नया घोटाला लाओ पूराना लोग भूल जाते हैं...रेट बढ़ाओ लोग मंहगाई जपने लगते हैं...।

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  24. बढ़िया कटाक्ष ...नया मुद्दा दूसरे मुद्दे को भुलाने में कितना सहायक है यह हमारे नेता बखूबी जानते हैं .... खैर यहाँ तो मुद्दा अफवाह का भी है ...

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  25. सदाबहार आम चाहिए
    खाली बैठने से बेहतर है
    कि कोई तो काम चाहिए.

    सुंदर व्यंग.

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  26. भई ! सच तो यही है
    कि सबको मीठा , रसीला
    सदाबहार आम चाहिए
    खाली बैठने से बेहतर है
    कि कोई तो काम चाहिए
    और आग उगलने में अव्वल होकर
    नामाकूल ही सही
    पर कुछ तो नाम चाहिए .....बढ़िया व्यंग्य


    और मुद्दई मुद्दे पर
    मुरौवत दिखा कर
    मुनासिब मुलम्मा चढ़ा आती ...बहुत बढ़िया

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  27. आज के हालात पर बहुत सटीक कटाक्ष...

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  28. बहुत प्रभावी .. सच अहि की सभी को आज कुछ न कुछ करने के लिए मुद्दा चाहिए ... करारा कटाक्ष ...

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  29. सही बात, यही रवैया हो गया है आजकल..

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  30. खाली बैठने से बेहतर है
    कि कोई तो काम चाहिए
    और आग उगलने में अव्वल होकर
    नामाकूल ही सही
    पर कुछ तो नाम चाहिए .
    सार्थक अभिव्यक्ति। मेरे नए पोस्ट 'समय सरगम' पर आपका इंतजार रहेगा।

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  31. नाम चाहिए
    शोहरत चाहिए
    भीड़ में क्षणिक ही सही
    मगर पहचान चाहिए...
    समस्यायों की निरंतरता
    कैसे रहे कायम
    बस कोई ढंग का
    जुगाड़ चाहिए...
    मेरे साथी कहते हैं कि नेपथ्य में भी नेतृत्व की असीम संभावना है। मगर आगे आने और होड़ में शामिल होने से ऐसी स्थिति निर्मित हो रही है।

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  32. 'कृपया बिना अनुमति के रचना न लें' आप ने लिख तो दिया किन्तु अनुमति कैसे लें यह नहीं लिखा

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