Pages

Tuesday, July 24, 2012

ख़ालिस खिचड़ी ...


आप पकाए क्या  ख़ालिस खिचड़ी
हांडी  को  ताकता  रह  जाए  खीर
बड़ा  नशीला है  ये जालिम नमक
जिसके   आगे   भागे   देखो  भीड़

बारह   मसाला   में   तेरह   स्वाद
लज्ज़त   लुटाये   आपका   चोखा
लार  टपक  कर  लड़ता  रह  जाए
और  जीभ  तो  खाता  रहे  धोखा

चाहे  आप  कुछ   भी  कहें  न  कहें
तनिक न  लगती  किसी को कड़वी
वर्जिश  करना  भी  भूल चुके  सब
आपका  घी  ही  घटाए  जो  चरबी

मिर्च  और   खटाई   खेले  खटराग
तिसपर पर्दापोशी करे  आप अचार
एक   बार  जो  जी  चढ़   जाए  तो
हिचकियाँ  लगाए  हुड़दंगी  विचार

बिन  जामन  के   ही  आप जमाए
कफ़ - वात- पित्त   नाशक    दही
छुआछूत   से  तौबा  कर  जीवाणु
हर  बात  को   बस   ठहराए  सही

कोई   हरजाई  जो  पलटी  मारे  तो
पटेबाज़ी  कर पटाये  आपका पापड़
मुँह पर  मैंने ऊँगली  डाल लिया जी
वर्ना  कहीं  खिचड़ी कर  दे न चापड़ .

35 comments:

  1. :-) ये खिचडी भी पूरे लाव लश्कर के साथ आयी है !

    ReplyDelete
  2. बहुत ही अलग सी रचना है एब्सर्ड आर्ट सी .

    ReplyDelete
  3. रचना में कवयित्री अपनी बात को अपने प्रियतम तक पहुँचाने के लिए कुलाचे भर्ती है .जिस प्यार को सीधा सीधा व्यक्त नहीं कर सकती उसे कविता के माध्यम से व्यक्त करती है .जिसे रूपक कहतें उसे सही ढंग से निबाह गई .है कविता .भाव यह है तुम जैसे भी हो मुझे स्वीकार्य हो .चापड़ पापड कुछ भी .पहली कविता में शतदल ,पद्म,कमल सभी तो हृदय का प्रतीक हैं .कविता में अपने प्रियतम को पाने की लालसा अधिक प्रबल है .बीच में कवयित्री संस्कृत के तत्सम शब्द ले आती है ,घुमाती रहती है बात को सीधे न कहकर प्रियतम पे ढाल देती है .समर्पित खुद है कविता के माध्यम से कहती है तुम समर्पण करो तो हृदय में बसा लूं अंक में भर लूं एक युवती की प्रगाढ़ प्रेम की लालसा हर कविता में प्रतिबिंबित है यहाँ .

    ReplyDelete
  4. नमक का अपना अलग ही स्वाद है
    स्वाद में रहे तो नमक हलाल
    स्वाद से कम या ज्यादा तो नमक हराम

    ReplyDelete
  5. मिर्च और खटाई खेले खटराग
    तिसपर पर्दापोशी करे आप अचार
    एक बार जो जी चढ़ जाए तो
    हिचकियाँ लगाए हुड़दंगी विचार

    ...............

    क्या बात है... बहुत ही चटपटा....

    खट्टा..तीता... और मजा आ गया

    ReplyDelete
  6. खिचड़ी स्वादिष्ट बनी है। जीवन के कई रस और स्वाद को एक जगह जमा कर दिया है।

    ReplyDelete
  7. :-)

    स्वादिष्ट रचना......

    अनु

    ReplyDelete
  8. बहुत बढ़िया प्रस्तुती, सुंदर रचना,,,,,

    RECENT POST काव्यान्जलि ...: आदर्शवादी नेता,

    ReplyDelete
  9. काव्य की यह रेसिपी नई है. कैसे बनाई है?

    ReplyDelete
  10. सुंदर रचना............स्वादिष्ट बनी..........बहुत ही चटपटा....

    ReplyDelete
  11. शब्दों के साथ सुंदर प्रयोग। अमूर्त कविताओं की श्रेणी में सबसे अव्वल। स्वागत है।

    ReplyDelete
  12. एक बार जो जी चढ़ जाए तो
    हिचकियाँ लगाए हुड़दंगी विचार

    अलहदा खिचड़ी ....रसपूर्ण

    ReplyDelete
  13. क्या बात है अमृताजी ..आज चौके पर ही धावा बोल दिया ......

    ReplyDelete
  14. खिचड़ी में सबका रोचक भाव, पाचक और स्वादिष्ट..

    ReplyDelete
  15. खिचड़ी का चटपटा स्वाद ...

    ReplyDelete
  16. सारे स्वाद लिए स्वादिष्ट बनी है खिचड़ी... सुन्दर प्रस्तुति

    ReplyDelete
  17. कहने को खिचड़ी खालिस ..... आपने जितनी भी बातें बिम्ब के रूप में कही हैं उसे मेरी नानी कुछ इस प्रकार कहती थीं ---

    खिचड़ी तेरे चार यार
    दही , पापड़ , घी , आचार । :):)

    ReplyDelete
  18. वाह आज को रसोई घर से ही कविता बुन ली आपने ...
    बहुत लाजवाब ...

    ReplyDelete
  19. आपकी कविता समझने के लिये एक..दो..तीन..बार पढ़नी पढेगी...

    ReplyDelete
  20. समझ कुछ नहीं आया इस खालिस खिचड़ी में हमारे :-(

    ReplyDelete
  21. बड़ा नशीला है ये जालिम नमक
    जिसके आगे भागे देखो भीड़
    बारह मसाला में तेरह स्वाद


    यही चीज़ आजकल ज्यादा पसंद करते हैं सब .....

    बिल्कुल सही लिखा है आपने ...!!

    ReplyDelete
  22. वाह ... जबरदस्‍त ख्‍ुयाल और मसालों का बेमिसाल संगम

    ReplyDelete
    Replies
    1. खिचड़ी के हैं चार यार
      दही, पापड़, घी, अचार :)

      हर एक के गुणों से सुसज्जित स्वादिष्ट, लजीज खिचड़ी पकाई आपने
      खिलाने के लिए शुक्रिया :)

      Delete
  23. रसोई से निकली मसाले से भरपूर रचना

    ReplyDelete
  24. Amrita,

    YEH TO CHAKHNI HI PAREHEGI.

    Take care

    ReplyDelete
  25. खालिस खिचड़ी का स्वाद जुबान पर आ गया...

    ReplyDelete
  26. आप ने अपनी प्रतिभा एक बार फिर खिचड़ी परोस कर दिखला दिया है.आप की हर कविता चाहे जिस भी विषय में लिखी हो अपनी एक बिशिस्टछाप छोड़ ही जाती है.पर सबसे मनभावन होती है प्रेम और समर्पण की अभिब्यक्ति.जीतनी पीड़ा और पुकार होती है उतना ही रहष्य्मय आपकी अभिब्यक्ति भी होती है.पाठको को कहीं बियाबान में अकेला छोड़ आती है किसी यादों में बिचरने के लिए. मीरा को पीछे छोड़ती प्रतीत होती है अमृता जी का बिरह.और अवचेतन मन की गूंज .बधाई.

    ReplyDelete
  27. ये इश्क की नमकीन इयाँ हैं ,खिचड़ी पकेगी प्यार से ....ब्लॉग पे आपकी दस्तक और उत्साह वर्धक टिप्पणियाँ हमारे लेखन को हवा देती हैं ,आंच है हमारे लिखे की ...

    ReplyDelete
  28. बीर सिन्हा जी इस पीड़ा में यहाँ वहां महादेवी जी की पीर भी है निराला का औज़ भी पन्त की मिश्री और प्रकृति (चित्रण ) भी है खुद समर्पित यह मुग्धा नायिका प्रियतम से समर्पण करवाने की जिद ठाने है .इसीलिए यहाँ वहां पग डंडियों पे घुमाए फिरती है पाठक को .

    ReplyDelete
    Replies
    1. आदरणीय बीरू भाईजी,
      मै आपके ब्लॉग का नियमित पाठक हूँ.और आपके बिचारों का प्रशंसक भी.आप के ज्ञान्बर्धक लेखों से अवगत होता रहता हूँ.आज के सन्दर्व में मेरी सोच है उसे रखने का प्रयाश कर रहा हूँ.ब्यक्ति चेतना भाव्पुरित होती है.भाव का प्रवाह भोतिक माधयमो से आनंद की और खींचे लिए चलना चाहता है .प्रति इकाई चैतन्य अपने पूर्णत्वा में समाहित होना चाहती है यह आकर्षण ही है जिसे हम प्रेम के रूप में पहचानते है.यही पीड़ा है यही पुकार भी उस परम पूर्णत्वा की जिसे हम परमात्मा कह लेते हैं.अमृताजी की कविताएँ ब्यक्ति चैतन्य के भाव प्रवाह समस्ति चैतन्य की और प्रवाहित होती रहती है.दिखाती है.ऐसा ही प्रवाह महादेवी जी,मीरा बाई, bachan जी की मधुशाला पद कर होती है.आज हर ह्रदय उसी प्रेम की दिश में यात्रा करता दिखता है कभी कभी यह प्रवाह भोतिकता में ठहरकर भोगों में परिणत होकर दुखों का कारन बन जाता है.अमृताजी की सारी कविताएँ ब्यक्ति चेतना से समस्ति चेतना के लिए प्रेम और समर्पण किब्याथा का ही तो आलेख है.मुझे जैसा लगा मैंने ब्यक्त किया है .इसे सिर्फ मेरी ही सोच समझे.
      आपका पाठक बिरेन्द्र .

      Delete
  29. वाह...लाजवाब खिचड़ी

    ReplyDelete
  30. बारह मसाला में तेरह स्वाद
    लज्ज़त लुटाये आपका चोखा
    लार टपक कर लड़ता रह जाए
    और जीभ तो खाता रहे धोखा
    बहुत सुन्दर ...

    ReplyDelete
  31. बिलकुल अलग अंदाज की कविता |

    ReplyDelete