Pages

Tuesday, April 3, 2012

अनागत कुसुम


हवा के झझकोरे से
बिखरे पत्तों को देखकर
बच्चों की भाँति
ठिठक जाता है - भीरु मन
और चलने से मना करता है
एक भी कदम...
फिर उसी हवा के झोंके में
देखता है भर अचरज - मन
कोरा कोंपल -कलियन
कि प्रस्तुत होता है अप्रस्तुत मन
पूरे अकड़ और जकड़ के साथ...
मजबूर करता है सामने पड़े
धारणाओं के चट्टानों को
मजबूती से परे लुढकाने को...
अपने तले कुचल कर
आती सारी अड़चनों को...
भुलाकर अबतक की सभी
भूलों और पछतावों को
व्यर्थ की शंकाओं एवं दुष्कल्पनाओं को..
अचानक से इसी पल में
न जाने कहाँ से
आ जाती है इतनी शक्ति कि
घुमावदार मोड़ों पर भी
आत्मबल का लेकर छाँव
सीधे पड़ने लगते हैं टेढ़े पाँव....
सधने लगती है दृष्टि भविष्योन्मुख
विषम संघर्ष से अनुभावी सुख.....
शांत हो कहता है - मन
-- यही है जीवन
भला रुकी है हवा किसी क्षण...
माना कि है
अनुभवों का बीहड़ वन
पर इसी में एक दिन
खिल उठते है
अति सौरभ बिखेरता हुआ
अति सुन्दर अनागत कुसुम .

 

37 comments:

  1. वाह!!
    बहुत सुन्दर ...
    आशाओं से भरी रचना.....

    अनु

    ReplyDelete
  2. समय नहीं ठहरता न रूकती है हवा - लगती हैं चुप सी , पर चलती है ............ मैं भी चल रही , भय अन्दर है , हौसला और मुस्कान भरी उर्जा बाहर

    ReplyDelete
  3. विषम संघर्ष से अनुभावी सुख...
    शांत हो कहता है – मन
    - यही है जीवन।

    सुंदर रचना....
    सादर।

    ReplyDelete
  4. BEAUTIFUL OPTIMISTIC LINES FUL OF EMOTIONS AND
    DEEP THOUGHT

    ReplyDelete
  5. वाह||
    बहुत बढ़िया रचना,
    सुंदर अभिव्यक्ति,बेहतरीन पोस्ट,....

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: मै तेरा घर बसाने आई हूँ...

    ReplyDelete
  6. सुंदर अभिव्यक्ति,बेहतरीन रचना है।बधाई।

    ReplyDelete
  7. वाह बहुत उपयोगी प्रस्तुति!
    अब शायद 3-4 दिन किसी भी ब्लॉग पर आना न हो पाये!
    उत्तराखण्ड सरकार में दायित्व पाने के लिए भाग-दौड़ में लगा हूँ!
    बृहस्पतिवार-शुक्रवार को दिल्ली में ही रहूँगा!

    ReplyDelete
  8. Amrita,

    AAJ MAINE NISHCHAY KAR LIYAA HAI KI MAIN EK DIN BHEE ANUUPSTHITH NAHIN REH SAKTAA. ITNI GOORH KAVITAYEN EK SAATH PADNE PAR MAN BETAAB HOTAA HAI.

    Take care

    ReplyDelete
  9. प्रेरक कविता। सबसे पहले हमारे पास जो है, उसके लिए संतोष का भाव होना चाहिए, और जो नहीं उसके लिए कोशिश होनी चाहिए। सिर्फ असंतुष्‍ट रहने का कोई मतलब नहीं है।

    ReplyDelete
  10. विरोधों में भी उग आने की क्षमता है इनमें।

    ReplyDelete
  11. बचपन के प्रकृति से संवाद का आपने सहज चित्र खींचा है कि कैसे एक पल में हमको डराने वाली चीजें आकर्षक लगने लगती हैं। हम अपना खोया हौसला फिर से पा लेते हैं। तमाम बाधाओं के बावजूद बढ़ चलते हैं आगे... बेफिक्री से लड़खड़ात हुए भी चलने की कोशिश करते बच्चे की तरह। जो सहज ही लांघ जाता है पुराने अनुभवों के बीहड़ बन को क्योंकि उसे प्राप्त है......सहज विस्मृति का अद्भुत वरदान। इन नवागत कुसुमों को हार्दिक स्वागत है। बहुत-बहुत बधाई।

    ReplyDelete
  12. मजबूर करता है सामने पड़े
    धारणाओं के चट्टानों को
    मजबूती से परे लुढकाने को...
    अपने तले कुचल कर
    आती सारी अड़चनों को...

    नवीनता की ओर अग्रसर होने के लिए अवधारणा तो तोड़नी ही होंगी ॥सुंदर रचना ...

    ReplyDelete
  13. अमृताजी,आपकी यह रचना तो किसी के जीवन में नया उत्साह ही नहीं वरण ऐसे ओज का निर्माण कर देगी जो मन द्वारा कल्पित और सृजित अवरोधों को तोड़ सकने में सक्षम होगी.साथ ही ऐसी उत्क्रिस्ट रचना आगत कुसुम सा सौरब बिखेरता निर्झर की भांति मानव मन को उल्लास से भर देगा,आपको अत्यंत बधाई,मेरी उस परम चैतन्य से निवेदन है आपके अन्दर से ऐसी ही प्रेरणा निरंतर प्रवाहित होती रहे .

    ReplyDelete
  14. बहुत सुन्दर प्रेरणादायक अनुभूति!

    ReplyDelete
  15. अचानक इस पल में कहाँ से शक्ति आती है ....
    सचमुच यह अजूबा ही है ....
    अच्छी लगी कविता !

    ReplyDelete
  16. बहुत ही सुन्दर कविता बधाई |

    ReplyDelete
  17. बहुत ही सुन्दर एवं सारगर्भित रचना । मेरे नए पोस्ट "अमृत लाल नागर" पर आपका बेसब्री से इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

    ReplyDelete
  18. मन में ही है ...सभी कुछ ...
    सारगर्भित ...आज की रचना ...!!

    ReplyDelete
  19. आशाओं और संभावनाओं का कमल खिलने लगा है .....तन्मयता को भंग करने और अमृत का संचार करने .....

    ReplyDelete
  20. सुन्दर प्रस्तुति। मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।
    http://vangaydinesh.blogspot.in/2012/02/blog-post_25.html
    http://dineshpareek19.blogspot.in/2012/03/blog-post_12.html

    ReplyDelete
  21. व्यर्थ की शंकाओ और मिथ्या कल्पना से बाहर आकर खुद को सिद्ध करने के लिए एक पल ही काफी है . आशा धर्मिता छलक पड़ी है .

    ReplyDelete
  22. विषम संघर्ष से अनुभावी सुख

    शांत हो..कहता है मन

    यही है जीवन

    उम्मीदों से लबरेज जिन्दगी को नया ख्वाब दिखाती है आपकी शब्दों की दुनिया... काफी उम्मीदें है आपसे

    ReplyDelete
  23. बहुत सुन्दर सार्थक और भावपूर्ण रचना...

    ReplyDelete
  24. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 05-04-2012 को यहाँ भी है

    .... आज की नयी पुरानी हलचल में ......सुनो मत छेड़ो सुख तान .

    ReplyDelete
  25. आत्म बल को झकझोरती यह हवा बहुत सुखद है

    ReplyDelete
  26. एक प्यारी सी कविता ,, जो जीवन में आशा का संचार करती है.. दिल से बधाई ...यूँ ही लिखो ...बस !

    ReplyDelete
  27. भला रुकी है हवा किसी क्षण , यही तो है जीवन । आँधियाँ और अड़चनें आत्मबल की परीक्षा होती हैं । सुंदर रचना !

    ReplyDelete
  28. स्वागत 'अनागत कुसुम' का
    सुन्दर रचना

    ReplyDelete
  29. लकीर से हटकर चलने की सोच विशम्ताओंसे भरी है ....लेकिन संकल्पों की ताक़त .....पार लगा देती है ....बहत सुन्दर सकारात्मक सोच !

    ReplyDelete
  30. जीवन इसी को तो कहते हैं ... मन में हिम्मत होनी चाहिए ...

    ReplyDelete
  31. जीना इसी का नाम है......

    ReplyDelete
  32. पतझड़ के बाद आती नई कोंपलों-कुसुमों को समर्पित-सी यह कविता मन का मौसम भी बदल देती है.

    ReplyDelete
  33. वाह!!! Beautiful!! :)

    ReplyDelete