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Thursday, December 27, 2012

नजरबन्द ...


आजकल
शब्दों की हिम्मत भी
हवा देखकर बढ़ सी गयी है ...
न जाने क्यूँ वे
अपना आक्रोश मुझपर ही
अजीब तरह से व्यक्त कर रहे हैं
मैं निकल जाने को भी कहूँ तो
कुछ बुदबुदाते हुए उबल रहे हैं ....
तब तो शब्दों की छाती पर
मैंने भी तान दिया है पिस्तौल
अब तो उन्हें राजद्रोह स्वीकारना होगा
साथ में गिरफ्तारी भी देनी होगी
अपना बॉडी- वारंट देखे बिना ....
अब वे करते रहे अपना वकील
लिखवाते रहे अपने लिए हिदायतें
छाँटते रहे सही-गलत बातों को
अपना छाती दुखा-दुखा कर
करते रहे अपना जिरह
व अपनी पैरवी के लिए
करते रहे सारे प्रबंध-कुप्रबंध
और अपने धारदार बहसों से
काटते रहे गले के फंदों को ....
पर मैं तो एकदम से इन शब्दों की
बौराई हुयी सरकार सी हो गयी हूँ
अति आक्रोश में हूँ
इसलिए कुछ गिरगिटी शब्दों को छोड़कर
बाकी उन सभी रुष्ट शब्दों को
एक-एक करके
नजरबन्द कर देना चाहती हूँ
अपने कलम में ही .


Friday, December 21, 2012

हंसा , उड़ चल न ...


उड़ - उड़ कर , बहुत छान लिया
हमने कई , अम्बर - भूतल
कितने पंख , गिर गये हमारे
अबतक , तिल- तिल कर जल
अंगारों पर ही , चल रहा है
बंदी -सा , हर छिन - पल

क्यों किसी द्वार पर
नहीं रुकते ये शिथिल चरण ?
क्यों व्याकुल प्रश्नों से
बोझिल है ये धरती - गगन ?
क्यों संझियाई उदासी लिए
उत्तर के ताके है नयन ?

अब तो निर्लक्ष्य , न उड़
विकल खग -सा ,  रे! मन
देख , मरू के मग पर
क्षण भर को ही , लहराया है घन
भाग , उठ , उस रस का
भींग कर , कर आलिंगन

कबतक जड़वत जीवन से
खाता रहेगा , तू ठेस रे!
ठगिनी माया है , तुझे रिझाए
धर , हंसिनी का वेश रे!
हंसा , उड़ चल न
अपने ही , उस देश रे!

जिस देश का दुर्गम पथ भी
बने हमारा , पावन बंधन
उस बंधन से ही , बंध जाए
इस मन का , सब सूनापन
और सूनेपन में भी , खिल जाए
कमल - पंखुड़ियों सा , ये जीवन

तब ताकता रह जाएगा , तू ही
उन पंखुड़ियों को , अनिमेष रे!
सबकुछ अपना , निछावर करके
न रखेगा  , कुछ भी शेष रे!
हंसा , उड़ चल न
अपने ही , उस देश रे!

Monday, December 17, 2012

लिखो , लिखो , खूब लिखो ...


लिखो , लिखो , खूब लिखो
खुरदरे , संकरे किनारे से भी धकेले हुए
पीछे के पन्नों पर बनाए गये
कँटीले बाड़ों में बिलबिलाते
उन वंचितों के लिए
लिखो , लिखो , खूब लिखो

लिख भर देने से ही
झख मारते हुए इतिहास बदल जाता है
इसी झांसे में आकर
इतिहास का भूगोल भी बदल जाता है
और कितनी ही कुवांरी क्रांतियाँ
गर्भ बढाए हुए अजन्मे परिवर्तन का
नामाकरण संस्कार करवाती है
फिर अचानक से यूँ ही
भरे दिन में गर्भपात करा लेती है

ऐसी वंचनाओं का आदि इतिहास
इस आदि इतिहास का अमर इतिहास
उन्हीं वंचितों को कोसता रह जाता है

लिखो , लिखो , खूब लिखो
शेषनाग सा फन फैलाए हुए
अपने सम्पूर्ण सामर्थ्य से चूसते हुए
उन शोषणों के खिलाफ
और नैसर्गिक निरीहता में भी
अर्थवत्ता को सुलगाते हुए
उन शोषितों के लिए

लिखो ,लिखो , खूब लिखो
उनके दर्द से कलपते देह को
और काल के कोड़ों से
फव्वारे की तरह फूटते खून को
उनके ही खंडहर के दीवारों से टकराती हुई
चमगादड़-सी डरी हुई उनकी आत्मा को
उनके ही भुरभुरे भग्नावशेषों को
और उनके जीजिविषा के अवशेषों को

लिखो , लिखो , खूब लिखो
उन अपढ़ ,निरक्षरों के लिए
जिनके लिए आज भी
काला अक्षर मरी हुई भैंस ही है
जिसके थनदुही में लगे हुए हैं
अक्षरों के थानेदार और हवलदार

लिखो ,लिखो , खूब लिखो
विवश विचारों की आँधियाँ उठाओ
कुचक्रों के चक्रवातों में उन्हें फँसाओ
और अपने काले- उजले अक्षरों को
घसीट-घसीट कर ही सही
अपंग- अपाहिज सा इतिहास बनाओ .  

Thursday, December 13, 2012

मैं तुम्हें दे दूँ...


ये किनारा भी , मैं तुम्हें दे दूँ
वो किनारा भी , मैं तुम्हें दे दूँ
ये गझिन गारा भी , मैं तुम्हें दे दूँ
और ये धवल धारा भी , मैं तुम्हें दे दूँ

मेट कर अपनी बनावट , मैं ढह जाऊँ
तेरे अपरिमित ज्वार को , मैं सह जाऊँ

ये तनु तरलता भी , मैं तुम्हें दे दूँ
ये मृदु मधुरता भी , मैं तुम्हें दे दूँ
ये चटुल चपलता भी , मैं तुम्हें दे दूँ
और ये उग्र उच्छ्रिंखलता भी , मैं तुम्हें दे दूँ

तेरी हर साँस में ,  ऐसे मैं बह जाऊँ
हर साँस की गाथा , हर किसी से कह जाऊँ

ये परिप्लव प्राण भी , मैं तुम्हें दे दूँ
ये निरवद्द निर्वाण भी , मैं तुम्हें दे दूँ
ये अमित अभिमान भी , मैं तुम्हें दे दूँ
और ये अमर आत्मदान भी , मैं तुम्हें दे दूँ

तनिक भी इस मैं में , न मैं रह जाऊँ
बस और बस तुम्हीं में,  मैं सब गह पाऊँ .



गझिन - गाढ़ा और मोटा
गारा - मिट्टी( जैसे नदी के तल की )
तनु - सुकुमार
चटुल - चंचल
परिप्लव - तैरता हुआ , बहता हुआ
निरवद्द - दोषरहित , विशुद्ध

Saturday, December 8, 2012

ऐ ! आलोचना के बाबुओं ...


क्या कहूँ ?
इस मुख से कहते हुए
बड़ी ही लज्जा सी आती है
कि कैसे
आज की कविता अपना चीरहरण
खुद ही करवाती है
और अपनी सफाई देते हुए
बात-बात में
गीता या सीता को
बड़ी बेशर्मी से ले आती है ...
और तो और
आल्वेज हॉट राम-कृष्ण का
कलरफुल कॉकटेल बनाकर
सबको उकसाती है , लुभाती है ...
ऐ ! आलोचना के बाबुओं
आप अपने को बचाए रखिये
बामुश्किल से चलती परम्परा को
किसी भी कीमत पर निभाये रखिये
यदि आपको कोई
ऑफर पर ऑफर दे भी तो
अपनी नजरें फिराए रखिये
और आपके कम्बल के भीतर
भला झाँकता कौन है ?
ये जो आज की नशीली कविता
कुछ ज्यादा ही बहकने लगे तो
उसी गीता या सीता को
हाजिर-नाजिर करके
जोर-जबरदस्ती से ही सही
अपना नीबूं-अचार चटाते रहिये .

Tuesday, December 4, 2012

डर मत मन ...



               इति-इति पर अड़ मत मन
               नेति-नेति से लड़ मत मन
                दुगुना दुःख कर मत मन
               वेदना से तू , डर मत मन

              गहन कोमलता जब लुटती है
                इक टीस सी तब उठती है
                मधुघट भी फूट जाता है
              मृदुमिटटी में मिल जाता है
               मृत्यु पूर्व ही मर मत मन
               वेदना से तू , डर मत मन

                 ह्रदय खोल और हुक उठा
              पुण्य प्रबल है , बस उसे लुटा
               जतन से चुभन को सहेज ले
                अगन को सूरज का तेज दे
               उत उलझन में पड़ मत मन
                वेदना से तू , डर मत मन

               व्यर्थ ही मिलती नहीं पीड़ा
              शैवाल तले बहती सदानीरा
              उपल के अवरोधों को सहती
               जल से ही जलधि है बनती
               अंजुली छोटी कर मत मन
                वेदना से तू , डर मत मन

               दुगुना दुःख कर मत मन
               वेदना से तू , डर मत मन .



Saturday, November 24, 2012

मैं मनचली ...

जबसे प्रिय प्यारे के
तीखे नयन ने कुछ यूँ छुआ
मुझ रूप-गर्विता को
न जाने क्या और कुछ क्यूँ हुआ ?

अपने रूप पर ही
और इतना इतराने लगी हूँ
लुटे तन-मन की
निधि सहसा ही बिखराने लगी हूँ...

आज बस में नहीं कुछ
खो गया है सारा नियंत्रण
पा प्रिय का
पल-प्रतिपल मोहक नेह निमंत्रण...

मैं किरण-किरण भेद
कुटिल कुतूहल जगाने लगी हूँ
बड़े भोलेपन से ही
बजर बिजलियाँ गिराने लगी हूँ...

गगन को ही छुपा कर
बिरंगी बदरिया बन घिर रही हूँ
उस गंध की गंगा सी
हवाओं के संग मैं फिर रही हूँ...

जैसे कोई क्वांरी कली
प्रथम आलिंगन से खुद को छुड़ा रही हो
उस प्रणय ज्वाला को  
हर पात से लजा कर बता रही हो...

और दे भी क्या सकती हूँ
हवाला या प्रमाण अपनी बात का
बस छलिया का
छुअन ही सब हाल कहे मेरे गात का...

मैं मनचली ,मचल-मचल
अपने प्रिय को ऐसे लुभाने लगी हूँ
और मचलते प्राण से
बस प्रिय! प्रिय! प्रिय! गुनगुनाने लगी हूँ .

Sunday, November 18, 2012

सिरा खोज लूं ...



कोई
मेरे गले में
घंटी बाँध
आँखों पर पट्टियाँ चढ़ा
न जाने कहाँ
लिए जा रहा है...
पांव थककर
रुके तो पीछे से
कोड़े बरसा रहा है
कहीं दौड़ना चाहूँ तो
चारों तरफ
खाई बना रहा है...
पराई गलियों के
अनजान रोड़े भी
तरस खाने लगे हैं
सपनों में चुभे
काँटों को
सहलाने लगे हैं...
घर की महक
वापस बुलाती हैं
इसीलिए मैं
अपने समय के भीतर
खुदाई कर रही हूँ
ताकि
इन्द्रजालों के
महीन बानों को
काटकर
कोई भी
सिरा खोज लूं .

Saturday, November 10, 2012

तो ये है -


आपको दमा का दौरा दिला
हर बेहया सुबह को फूंक-फूंक सुलगाती हुई
रोटियों को हथेलियों से पीट-पीट कर
अपने स्टाईल में जलाती-पकाती हुई
सहमें नमक-प्याज संग पेट खोले गठरी में रख
पगडंडियों या रस्ते पर बदहवास दौड़ती हुई
आपको हर रोज कविता जो दिखे तो
आप उसे गुड मॉर्निंग कह सकते हैं और
अपनी च्वायस माफिक सौन्दर्य भी ढूंढ़ सकते हैं

फिर नजरें घुमाए तो
टेलर या लॉरी पर अजीब सी लटकी हुई
बसों-रेलगाड़ियों के छतों पर भी चिपकी हुई
कहीं तगारी-ईंटों से हंसी-ठिठोली करती हुई
या फिर फैक्ट्रियों के धुएँ को हराने वास्ते
ओंठों के बीच कसकर बीड़ी दबाये हुए
सारे टेंशन को छल्लों में घुमाकर
अपने हौसले से छेड़कानी करती हुई
कोई बिंदास सी कविता दिखे तो, आप
ईजिली अपने अन्दर भटकती कला को
नेशनल हाईवे पर दौड़ा सकते हैं

या फिर आपके इर्द-गिर्द
अपने झिल्लीदार आँखों से झुर्रियों के बीच फंसे
नन्हे-नन्हे जीवों को पुचकारती हुई
या अपने असली आंतो और दांतों को
किसी सेठ-साहूकार के यहाँ गिरवी लगाती हुई
या फिर किसी इंटरनेशनल ब्रांड के वास्ते
अपने गंजेपन का फोटो खिंचवाती हुई
और किसी फुटपाथ पर बिकते हुए
उताड़े कपड़ों की मजबूती जांचती हुई
उस ब्लैक एंड व्हाईट पीरीयड टाईप की
कोई कविता दिख जाए तो, बेशक आप
अपने आँखों पर काला चश्मा चढ़ाकर
न देखने का रियल एक्टिंग कर सकते हैं

या फिर गाहे-बगाहे
उस रंग-बिरंगे बीप करते बटनों पर
मक्खियों सी भिनभिनाती हुई
या किसी भी पॉलिश्ड पॉलिसी पर
छिपकलियों सी फिसल जाती हुई
और उस स्ट्रांग इकोनॉमी के नीचे
लाईटली, चींटियों सी दब जाती हुई
और तो और , हमारे-आपके
चारों तरफ दिन-रात उगते हुए
प्लास्टिक-पालीथीन को चबाती हुई
चुकरती , रंभाती वही कैटल क्लास सी
कोई कविता जो दिखे तो, आप
किसी भी पतली गली से निकल लेंगे
नहीं तो हाथी के दांतों से उलझ जायेंगे

और अक्सर रात गए
कहीं अपनी ही बोली लगाती हुई
या सामूहिक रूप से लुट जाती हुई
या फिर अपने गले के लिए फंदा बनाती हुई
कोई भी अगली सी , डर्टी सी कविता दिखे तो
आप राम-राम रटते हुए
अपने-अपने घरों में दुबक जायेंगे
और किसी फ्लॉप फिल्म की स्टोरी मान
उसको एकदम से भूल जायेगे
तो ये है -
   '' अपरिवर्तनीय और अछूत भारत की कविता ''

  ( इनकन्वर्टिबल और शनिंग इण्डिया की कविता )



Wednesday, November 7, 2012

तो ये है -


सुबह-सुबह
आँख मलते हुए आप सैर को जाएँ
वहाँ दौड़ती-भागती , चक्कर लगाती
चेहरे पर ताज़ी लालिमा उगाये
कोई कविता दिख जाए तो
बेशक ! हैरानी की कोई बात नहीं होगी
आखिर सोशलिस्ट सेहत का जो मामला है

या फिर कभी
किसी ब्यूटी पार्लर में
फेशियल-मसाज़ करवाती हुई
या बालों को रंगने के वास्ते
कुछ अलग-सा डाई चुनती हुई
या किसी बुटीक में
डिजायनर परिधानों को ट्राई करती हुई
एक गर्माहट बिखेरती जो कविता मिले
तो घबराने वाली भी
ऐसी कोई घटना नहीं होगी
चिर-युवा दिखना कौन नहीं चाहता ?

हो सकता है किसी दिन
किसी नामी-गिरामी डेंटिस्ट के यहाँ
अपने जबड़े को दुरुस्त करवाती हुई
नकली दांतों में हीरे-मोती जड़वाती हुई
यूँ ही खिलखिलाती हुई कविता मिले तो
आप भी लुढकने को तैयार हो जाएँ
आखिर खनकती चमकीली हँसी पर
कौन नहीं मर-मिटता है ?

फिर किसी शाम
हाई-प्रोफाइल सब्जी-मंडी में
आँखों को रोकती हुई
किसी बड़ी लग्जरी गाड़ी की डिक्की में
ढेरों साक-सब्जियां लदवाती हुई
जीरो-फिगर वाली कोई कविता दिखे तो
आप बस इतना ख़याल रख सकते हैं
कि अपनी दसों उँगलियाँ
कुछ ज्यादा ही चबा न लें

और फिर किसी रात
भरपूर हेल्थ-ड्रिंक्स के साथ-साथ
हेल्थ-पिल्स फांक कर
किसी सॉफ्ट म्यूजिक पर
योग-ध्यान लगाती हुई
और पूरे चैन की नींद लेती हुई
कोई कविता दिखे तो
आप जरूर पूरे जल-भुन कर
उससे रश्क खा सकते हैं
तो ये है -
'' इनक्रेडिबल और शाइनिंग इंडिया की कविता ''




...और भारत की कविता अगली कड़ी में .

Saturday, November 3, 2012

क्षणिकाएँ ...


क्षणों की लहरों ने तो
विभीषिकाओं का पाठ पढ़ाया है
पर मैंने भी हर लहर के लिए
डांड तोड़ कर डोंगा बनाया है

           ***

अमानुषिक ऊँचाइयों की परछाईयाँ
मैंने चतुराई से चापा है
और हरेक चीज़ों को बस
अपने सिर के हिसाब से नापा है

           ***

धीरे-धीरे सरक कर
सपनों के छोरों को जोड़ा है
और अस्तित्व के गिने पन्नों में
मैंने चोरी से कुछ को मोड़ा है

           ***

दो जोड़ दो को हरबार
मैंने तीन या पाँच कहा है
और निन्यानवे का फेरा लगा-लगाकर
शून्य से ही तिजोड़ी को भरा है

           ***

आईने में जैसी भी तस्वीर मिली
मैंने बस उसी को जाना है
ओर पीछे पुता कलई ने जो कुछ कहा
उसी को आँख बंद करके माना है .



Tuesday, October 30, 2012

जिन्हें तकलीफ है किसी से ...


भीखमंगा बनकर सबसे
मोती मांगने का चलन है
बोनस में मिलते दुत्कार का
करता कौन आकलन है...

अपने ही प्राणों में दौड़ती
कड़वाहटों का जलन है , पर
एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप
करने में ही सभी मगन हैं...

मारे शर्म के पाताल में
कहीं छुप गया गगन है
भागीरथी-कतार देखकर तो
उसका बढ़ रहा भरम है...

भूल-चूक से भूल हो तो
ऐसी कोई बात नहीं है
अँधेरे को भी जो छलता है
वो तो कोई रात नहीं है...

कालिख से पुता उजाला
अपने ब्रांड को भजा रहा है
सफेदी की चमकार का हवाला दे
हाट-घाट पर दूकान सजा रहा है...

मछली तो फंसने के लिए होती है
और मल्टी-चारा भी कमाल है
मुँह में चूहे का दांत दबाये हुए
सबके कंधे पर एक जाल है...

सुख तो कोई दुर्लभ चीज नहीं
बस नीचे गिरते जाना है
बिन सोचे वो सब कर के
इस दुनिया का कर्ज चुकाना है...

जिन्हें तकलीफ है किसी से
चुपचाप जगह खाली कर दे
और भीखमंगों की झोली को
अपने आत्मसम्मान से भर दे .

Sunday, October 21, 2012

शुभ शक्तिपात करो !


जीवन-नृत्य को
द्रुत गति से कराने वाली
सचेतन संगीत से
स्वर्णाभ सुर-लहरी लहराने वाली
गीतातीत मेघ-गर्जना के
पार्श्व ताल को थपकाने वाली
स्नेहिल विद्युत्-स्पर्श से
पुनीत-पुलक जगाने वाली...

हे माँ!
विहिंसक वृत्तियों पर वज्रपात करो!
और सब पर शुभ शक्तिपात करो!

मधुरित पुष्प-मंजरी सी
उप्त उल्लास खिलाने वाली
चिर चाहना के चषक में
अमृत-पय पिलाने वाली
इंद्रधनुषी इच्छाओं में
नख-शिख तक उलझाने वाली
मोहिनी-मुग्धा सी
पुन: माया को लील जाने वाली...

हे माँ!
अनृत , मिथ्यात्व पर कठोर आघात करो!
और सब पर शुभ शक्तिपात करो!

अपने सम्पूर्ण सौन्दर्य में
अर्धरात्री को उकसाने वाली
इस संकटापन्न संसार को
स्वर्गीय स्वानुभूति कराने वाली
घोर तमस के तृषा को भी
अंतत: त्राण दिलाने वाली
संकल्पित संकाश से
जगत को नित्यश: नहलाने वाली...

हे माँ!
अपने वैभव-विलास युत वक्ष से
अजात प्रकृति-शिशुओं को दीर्घजात करो !
और सब पर शुभ शक्तिपात करो!

Tuesday, October 16, 2012

कि पीर-सी लगे जुन्हाई...





                               ये कौन-सी रुत है आई 
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                             चाँद चुट-चुट चुटकी बजाए
                           मंद,मदिर-सा मलय लहराए
                           पर मेरे व्याकुल मन के लिए 
                            मेरे प्रीत की पुकार न आये
                           न ही बाजे प्राणों की शहनाई 
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                       नदियाँ पतुरिया-सी पायल बजाये
                          रात की रानी चूड़ियाँ खनकाए
                        बगिया में बिरही-बहार छिपकर 
                            गोपन-बिध से मुझे रिझाए
                             पर बेसुधी है मुझपर छाई 
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                             मन नहीं लगता क्या करूँ ?
                            प्रण नहीं निभता क्या करूँ ?
                           कुंठित-शंकित हर साँस लिए
                             दिन नहीं उगता क्या करूँ ?
                            न ही आई सुधि की पुरवाई
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                              आँखों में सपनों का खेला
                             अधर तक है अश्रु का रेला
                             कान में मेरे कोई ये कहता
                            कि लागूँ मैं खुद को ही मेला
                             खीजकर चेतना कसमसाई
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                               मेरे गीतों को जग गाये
                             अपना सौ-सौ अर्थ लगाए
                            जिसके लिए प्राण गीत रचे 
                             बस उसे ही समझ न आये
                          आह! मेरी आह उसे छू न पाई 
                              कि पीर-सी लगे जुन्हाई

                                ये कौन-सी रुत है आई 
                               कि पीर-सी लगे जुन्हाई .


          ( जुन्हाई - चाँदनी )

Saturday, October 13, 2012

पर भाव तो निरा निरक्षर है...


               वर्णमाला के बिखरे-बिखरे
                 बस थोड़े से ही अक्षर हैं
                कुछ और मैं कहना चाहूँ
             पर भाव तो निरा निरक्षर है

             क्षर-क्षर को लिखा बहुत है
             पर वह अक्षर रहा अलेखा
             अदेखे को मैं लिखना चाहूँ
              जो इस अंतरदृग ने देखा

               ऊर्ध्व वेग कोई उठता है
              भेद कर बुद्धि सूक्ष्म तार
          मुक्ताभ मुक्तक मैं बहना चाहूँ
             तन -मन के क्षितिज पार

            खोजती खोकर उसे खोने हेतु
             यह कैसी पागल प्यास है ?
             उस जिस को मैं गहना चाहूँ
             क्या मेरा अछूता उल्लास है ?

             मैं सांवरिया बनी किसी की
              बनाकर वेदना को वरदान
           अब तिल-तिल मैं सधना चाहूँ
             अनोखी आस की लिए भान

            जिह्वा पर मधु-बूँद गिराकर
            कोई छाया बना है मेरा छाज
              गपक गरल मैं पीना चाहूँ
              इतना ह्रदय भरा है आज

              इतना ह्रदय भरा है आज
             पर बिखरे-बिखरे अक्षर हैं
           बस उसको ही मैं भजना चाहूँ
            पर भाव तो निरा निरक्षर है .

Saturday, October 6, 2012

तुम मेरे हो कौन ?


विरवा में अनुक्षण अँखुआते
हर पंखड़ी , पात से पूछूं
भोर की सुकुमार किरणों सी
गंध बिखराती हर गात से पूछूं
अल्हड़ , आतुर चाहना की
फूलझड़ियों सी बरसात से पूछूं
तुम मेरे हो कौन ?

शिशिरा के हलके हिलोरे से
झिर-झिर झिलमिलाते मूंजों से पूछूं
कनखी ही कनखी में कुछ कह
सकुचाते सघन कुंजों से पूछूं
प्राण-पिकी की मतवाली सी
मरमराती मधुर गूंजों से पूछूं
तुम मेरे हो कौन ?

इन निर्झर नलिन-नयनों में तिरते
पल-पल की पिपासा से पूछूं
दूर-दूर तक विस्तीर्ण नीलिमा में
विस्तारित , विस्मित जिज्ञासा से पूछूं
झिर्रियों की झलक से चौंधियाकर
चुलबुलाते पंखों की अभिलाषा से पूछूं
तुम मेरे हो कौन ?

तुझ पाहुन की पगध्वनि पाने को
धमा-धम धमकते धड़कनों से पूछूं
तन पर तारकावलियों सा जड़ने को
तप्त , तत्पर चुम्बनों से पूछूं
देह की देहरी पर दुहाई देते
कसकते , कसमसाते आलिंगनों से पूछूं
तुम मेरे हो कौन ?

मुझे पूरब , पश्चिम और दक्षिण
दिखा- दिखा कर न जाने
उत्तर कहाँ है गौण ?
जब तुमसे जो पूछूं तो
रहस्य भरी मुस्कान लिए
बस रहते हो मौन...
अब कोई तो मुझे बताये
मैं किससे जाकर पूछूं कि
तुम मेरे हो कौन ?
 

Monday, October 1, 2012

न जाने क्यों ... ?


अपनी  ही  कुछ बंदिश में  न जाने क्यों
सीमित -दमित से ही रहते हैं कुछ लोग
इक  छोटा -सा अपना ही  आकाश लिए
क्यों  भ्रमित-चकित  रहते हैं कुछ लोग

चाँद -सूरज भी  पल दो पल के लिए ही
रोज तो  आते  हैं  पर यूँ ही चले जाते हैं
ख़ामोश -सी स्याह रात  को  ओढ़े लोग
अपनी जिक्र-फिक्र में ही भटक जाते हैं

उफ़ ! अकेलेपन का ये कैसा इन्तहां कि
दिल के धड़कने की , कोई आवाज़ नहीं
रोग तो लाखों हैं  ,यूँ  ही जीने के वास्ते
पर ग़म भूलाने को , कोई साज ही नहीं

बवंडर की तरह  और  तूफ़ान की तरह
हर तरफ ही देखो तो ,ये  क्या उठ रहा है?
अपने ही सींखचों  में ऐसे घूम -घूमकर
सब आकाश ही  इतना क्यों घुट रहा है ?

पानी के  बबूलों से बस  मोहब्बत करके
कलक कर  कागज की किश्ती बनाते हैं
अपने-अपने आग को ही अंदर छुपाकर
दावे से  दूसरों पर , कैसे तिलमिलाते हैं

छलावा और दिखावा की  ऐसी नुमाईश
करने वाला  खुद ही  क्या कह सकता है ?
चालाकी से चंद चांदमारी किये बगैर ही
ऐसा आकाश तो भला कैसे रह सकता है ?

अपनी  सारी महफ़िल को  वीराना करके
सबब पूछते  हैं  सब , हर एक से  रोने का
किस्मत  की किलाबंदी करने के बावजूद
खौफ़ रहता ही है  उन्हें  खुद को खोने का

बंदिशों के बंदिखाने में , बंधकर आकाश
सच -सच कहो तो  कितना तड़फड़ाता है
भ्रमों के रेशमी जालों को ही बुन -बुनकर
उसी में खुद ही इतना जो उलझ जाता है

अकेलेपन से कभी अपना दामन छुड़ाकर
अस्ल इंसानियत का भरकर एकअहसास
जब नजरें मिलेंगी उस बड़े आकाश से तो
सीमित न  रह  पायेगा  कोई  भी आकाश .


Wednesday, September 26, 2012

आओ , भेंट ले हम ...


हर रात को
पूनो की रात की तरह
आओ , भेंट ले हम ...
टुकड़े -टुकड़े में
फैली चांदी को
श्वास -श्वास में
श्लोकबद्ध कर फेंट ले हम ...
बिखरे -बिखरे से
सन्न सन्नाटे में जरा -जरा सा
लंगर कर लेट ले हम ...
और छिटकी -छिटकी
पारे की तरह बातों को
उँगलियों के पोरों से
सटा -सटा कर समेट ले हम ...
फिर उलटे -पलटे
कांच के कंचे से
अयाचित अनुभवों को
इसी क्षण के धागे में
मजबूती से लपेट ले हम ...
व तरल -तरल में
आश्चर्य के बहते लावा को
जमने से पहले ही
चट -पट चहेट ले हम ...
अहा! कितनी सुन्दर रात है
चूकती सन्नाटे में भी कुछ बात है ...
स्निग्ध -स्नेह बरसा -बरसा कर
रह -रह मुस्काता आसमान है ...
कणभर की तृप्ति ही सही
कण -कण से फूट -फूट कर
हर ओर भासमान है ...
अचानक
हमारी ही सीपी खुल जाती है ...
इक बूँद ही सही
उसमें गिर जाती है ...
जो हमारा ही
अनमोल मोती बन जाता है
और उस बरसते रस को
इक उसी क्षण में
खुलकर ग्रहण करना
बड़ी सहजता से
हमें ही सिखलाता है . 

Saturday, September 22, 2012

परितप्ता मैं ...


तुमसे है
मेरा स्वाभिमान
जो सबको
अभिमान सा दिखता है
और मुझे
अभिमानी दिखने पर
अभिमान सा हो जाता है...
जबकि मैं जानती हूँ कि
तुम किसी बच्चे की तरह
या किसी पूर्व नियोजित
आघातक झटका की तरह
मेरे स्वाभिमान को भी
एकदम से तोड़ देते हो...
जब वह
किसी मदमायी कली से
गदराया फूल बनने को
आतुर होता है ...
क्या लगता है तुम्हें ?
कि अपनी सुगंध में
मैं ही बहक जाउँगी
तुम्हें ही भरमा कर
और भड़क जाऊँगी ...
आह ! राग का ऐसा विरूपण
यंत्रणा का ऐसा निपीड़न
अभिमान का तो अंत: अनुपतन
पर स्वाभिमान का सतत सुबकन....
ये तुम्हें भाता होगा , मुझे नहीं ...
हाँ ! मैंने कब तुम्हें मना किया
कि अपने तपौनी में
मुझे इतना मत तपाओ
मेरे हर उद्यम से
उभरते छल को
मुझे ही मत दिखाओ
और अनजाने में उठते
किसी भी अभिमान को तोड़कर
मुझे मत जगाओ...
पर
तुमसे जो है
मेरा स्वाभिमान
उसकी तो
हरसंभव लाज बचाओ...
आखिर
तेरी ही परितप्ता मैं
मुझे विचुम्बित करके
गहरी वापिका में भी
हाथ को थामकर
वार पार तो कराओ . 


Sunday, September 16, 2012

कुछ तो नाम चाहिए ...


आओ , कोई भी मुद्दा लो
प्यार से चीरा लगाओ
जितना अंट सके , उससे ज्यादा ही
उसमें विस्फोटक पदार्थों को भरो...
उसे अफवाहों से कसकर लपेटो
पूरा दम लगाकर
हवा में जोर से उछाल दो...
स्वर्णपदक पाए निशानेबाज़ की तरह
निशाना साधो , गोली दागो
धारदार धमाका होगा
और मुद्दा
न जाने कितने ही टुकड़ों में
जगह -जगह बिखर जाएगा...
चिनगियाँ लपकने वाले तो
यूँ ही लार टपकाए फिरते हैं
थूक -खखार लपेट -लपेट कर
मुद्दे पर आग उगलते हैं...
आग की लपटें आपस में ही
लड़-झगड़कर लिपट जाती हैं
और मुद्दई मुद्दे पर
मुरौवत दिखा कर
मुनासिब मुलम्मा चढ़ा आती है....
भई ! सच तो यही है
कि सबको मीठा , रसीला
सदाबहार आम चाहिए
खाली बैठने से बेहतर है
कि कोई तो काम चाहिए
और  आग उगलने में अव्वल होकर
नामाकूल ही सही
पर कुछ तो नाम चाहिए .

Thursday, September 13, 2012

कवि का क्या भरोसा ?


कवि का क्या भरोसा ?
कब क्या कह दे
मात खायी बाज़ी पर भी
शह पर शह दे...
कविता का क्या मोल है ?
हिसाब में बड़ा झोल है...
क्या ये नारियल का खोल है ?
या फूटी हुई ढोल है ?
इससे न तो पेट भरता है
न ही तन ढकता है
न ही छप्पड़ बन कर
किसी के सर पर लटकता है
तो कोई कवि कविता क्यों कहता है ?
बर्दाश्त की सारी हदों को
बार-बार जानबूझकर तोड़ता है
आह-वाह सुनने के लिए
लार बनकर टपकता है...
उससे कुछ पूछो तो -
स्वांत: सुखाय रटता है ...
ये कवि -जमात बड़ा ही
ख़तरनाक मालूम होता है
दिनदहाड़े सबके दर्द पर
डाका डालकर रोता है
हँसने की बात करो तो
ऐसे आपा खोता है
और रक्त-निचुड़े शब्दों पर ही
अपनी कविता को ढ़ोता है .

Sunday, September 9, 2012

मैं बोझिल बदरिया ...


तुमने तार क्या छेड़े
पुकार क्या दे दी
सोया गीत जाग उठा...
मेरे सँभलने के पहले ही
उनींदे नयन-पाटल
ऐसे खुले कि
इस मन-मधुबन से
मेरा ही मधुमास लुटा...
आह !
निश्च्छल नेह की प्रतीति ऐसी होगी
तो प्रिय ! मृदु-मिलन की
रास - रीति कैसी होगी ?
ये सोच -सोचकर
बड़ी दुविधा में प्राण है
और दाँव पर तेरा मान है...
घुट-घुट कर विरह अधीर है
भर-भर जाती कैसी यह पीर है ?
अब तो घुमड़कर ह्रदय में ही
रागिनी है कंपकंपाती
अधर तक पहुँच कर भी
लुटी हुई सी लौट जाती..
कहो ! ये कैसी कलियाँ
तुमने बिछाई है सहेज कर
कि नुपुर बन झनक रहा है
शूल प्रतिपल सेज पर...
अपने कसक की बात , बोलो
किससे कहूँ मैं ?
और बिन कहे तो और भी न
रह सकूँ मैं ...
मेरा गीत क्यूँ डगमगा रहा है ?
बंदी- सा क्यूँ अकुला रहा है ?
मौन की भाषा तो अनजान है
बड़ी दुविधा में प्राण है...
प्रिय ! हो सके तो
आज तुम
अपने शब्दों को ही
इन गीतों में भर आने दो
मैं बोझिल बदरिया
मुझे बरबस ही
बहक- बहक कर बरस जाने दो .


Wednesday, September 5, 2012

मेरे होने का ...


मेरे भावों के समंदर में
तरह-तरह की लहरें
तरह-तरह की तरंग है ...

मेरे होने का
यही ढंग है

कभी बांसों-बांस
उछल जाती लहरें
कभी किनारे से लग
चुप हो जाती लहरें
कभी अपने ही तल में जा
छुप जाती लहरें
विपरीत से ही जीवन में
सारा उधम और उमंग है...

मेरे होने का
यही ढंग है

कभी हवाओं की धड़कन पर
थिरक जाती लहरें
कभी बादलों को देख
ललच जाती लहरें
कभी चाँद के छुअन से
सिहर जाती लहरें
सरपट समय जो सरका दे
बस वही मेरे संग है ...

मेरे होने का
यही ढंग है

कभी मुक्त राग में
गुनगुनाती लहरें
कभी पगुराए पत्थरों पर
कमल खिलाती लहरें
कभी मोतीवलियों से ही
सज जाती लहरें
लहर-लहर पर तिरता
पल-पल बदलता रंग है ...

जिसे देखकर
झलझलाया समंदर खुद ही
चकित और दंग है ...

क्या कहूँ ?

मेरे होने का
यही ढंग है .

Saturday, September 1, 2012

ये मधुर अनुहार है...


अब प्रेम की
जैसी भी गली हो
सहसा बढ़ गये हैं
पाँव मेरे...
अब तेरा
पता- ठिकाना
किसी से क्या पूछना ?
बस चलते-चलते
पहुँच जाना है
गाँव तेरे...
पंथ अपरिचित है तो क्या ?
दूरी अपरिमित है तो क्या ?
तुम जानते हो
मेरी वेदना सुकुमार है
और तुमसे ही तो
ये मधुर अनुहार है...
अब तुम चाहे
मुझे आँख दिखाओ
चाहे तो कसमें खिलाओ
पर लौट कर
कहीं न जाऊँगी...
बस
तेरी पलकों की
छबीली छाँव तले
सुध-बुध खोकर
खुद को भी बिसराउंगी . 

Monday, August 27, 2012

नहीं तो ...


इतना भी
घुप्प अँधेरा न करो
कि तड़ातड़ तड़कती
तड़ित-सी विघातक
व्यथा-वेदना में
तुम भी न दिखो...
इस दिए का क्या ?
तेल चूक गया है
बाती भी जल गयी है
बची हुई
चिनकती चिनगारी में
इतना धुआँ भी नहीं
कि भर दे जलन
तुम्हारी आँखों में...
क्या कहूँ ?
बस इतना ही
कि
तुम्हारी मर्जी को
स्वीकारते रहना
इतना आसान नहीं
और मर्जी से
मुकरते जाना
और भी कठिन है...
नहीं तो
पूरी ताकत से
एक धाँस धधकाकर
मिट जाती
वो चिनगारी भी...
ताकि
तुम्हारा अँधेरा
और गहरा जाता
पर तुम्हारे खाँसने की
आवाज भी
पूरी तरह खो जाती
उसी अँधेरी खनखनाहट में .

Friday, August 24, 2012

मिल जाए कुछ ...


आखिरी कसौटी को
छुए बिना
कैसे कहा जाए
कि हवा में
कितनी गर्माहट है
और वह
खुद को ही
उलीचने को
कितनी उतावली है...
पर
विचारों को उबलते
देख रही हूँ
वाष्पीकरण के
उत्ताप बिंदु पर
उद्विग्न होते भी
देख रही हूँ
चेतना के आसमान में
संघनित होते भी
देख रही हूँ
चातक ह्रदय की
विह्वलता को भी
देख रही हूँ
और
भावों को बूंदों में
बदलते हुए भी
देख रही हूँ
बस
मिल जाए कुछ
पिघले-पिघले से
शब्द
तो चट्टान भी
भला खुद को
कैसे रोक सकेंगे
गीला होने से .

Friday, August 17, 2012

अमृत चख...


कितना
सहज,सरल
है डगर
चलता चल

मत कर
अगर-मगर
लग जाए न
कहीं ठोकर
पर
मत रुक
वहीं रोकर

मटक-मटक
चल पनघट
घट भर
और घर चल

जमघट से
बचकर निकल
मत तक
इधर-उधर
तनने दे
टेढ़ी नजर
सर पर
घट रख
तन कर गुजर

तय है
यह सफ़र
मत उलझ
राह पर
रहगीर मिले
या रहबर
शुक्रिया कर
चलता चल

कहीं जाए न
साँझ ढल
घट में ही
रह जाए न
सब जल
और
रीता-रीता
बस तू
हाथ मल

प्यास तू
अमृत भी तू
छक कर
अमृत चख
फिर उगल

देर न कर
मत मचल
इधर-उधर
घट भर
और घर चल .


Monday, August 13, 2012

कुछ न बोलूँ रे!


कभी  निज  संचय न  खोलूँ  रे
और  मुख  से  कुछ न  बोलूँ  रे
लंतरानियों  को  बस   तौलूँ  रे
और   भीतर - भीतर   खौलूँ  रे!

लकड़ी  को चूम  रहा  कुल्हाड़ी
सन्यासी बनकर फिरे  है आड़ी
अकड़ा  लकड़ा  यूँ   गुर्राया करे
हरियाली को  ही धमकाया करे
दांतों  से  ऊँगली  मैं  चबाऊँ  रे
और  पुतली   को  सिकड़ाऊँ  रे!

भेड़ -शेर  में  है गजब की यारी
गड़ागड़  पीकर  मस्त शिकारी
औ ठूँठा बीड़िया बन जाया करे
जंगल को अंगूठा  दिखाया करे
ऐसे ढंढोरियो  से  मैं घबराऊँ रे
भाग डबरा में  उब-डूब  जाऊँ रे!

स्वारथ की  प्रीती  बड़ी नियारी
छतीसा मिलाप की करे तैयारी
ग्रह -नक्षत्तर  सध  जाया  करे
जादुई आँकड़ा यूँ उकसाया करे
चुपचाप सब तमाशा  मैं  देखूँ रे
गठरी में भर- भर  आशा टेकूँ रे!

गड़बड़  गरदन  पर  मौर   भारी
बिदक - बिदक  कर  घोड़ी हारी
निगोड़ा  गद्दी  पर  इतराया करे
गठजोड़ा  सरकार  चलाया  करे
बस  आँख   मैं  अपनी  सेंकूं  रे
दरिया  में   हैरानी  को   फेंकूं रे!

पर  मुख  से कुछ  न ही  बोलूँ रे !
न ही  निज  संचय  को  खोलूँ रे !


Friday, August 10, 2012

चौंको मत !


नये-नये गीत
बार-बार लिखकर भी
अपने को तनिक भी
उसमें समा न सकी
निज आहों के आशय को
इस जगती को समझा न सकी...
सोचती थी
जतन से मैंने जो कहा है
छंदित छंदों से लयबद्ध हो रहा है
अर्थों की परिभाषाओं को तोड़कर
पुलकित पद्य में ढल रहा है....
पर यह क्या ?
चेतना का शाप और
देह के धर्म में ठनी अनबन
बनी की बनी रह गयी
मैं सबसे या जीवन से या
अपने से ही छली गयी......
चाहकर भी
कंचन की जंजीर पहनकर
सपनों की झांकी में भी
क्षण भर को भी मुस्का न सकी
और औचक चाहों में भी
सोई हुई उजली रातों को
अबतक मैं जगा न सकी.....
निशदिन अँधेरे-पाख और
नन्ही परछाईं से भी डरते हुए
रह-रह कर कँप जाती हूँ
बदल-बदल कर लाख मुखौटा
क्यों अपने में ही छिप जाती हूँ...
कितना बेबस है मेरा आकाश
कि बंद दिशाओं में ही
बस उड़ता-फड़फड़ाता है
और क्षितिजों के कँटीले तारों में
उलझ-उलझ कर रह जाता है....
अब तो
हे! खारे आँसू
इन अधरों तक ही रुक जाओ
विधना विमुख है तो भी
करुण उद्गार से न चूक जाओ...
आज फिर
एक बार जी भर के
रचना में दर्द को छटपटाने दो
चौंको मत !
जगह-जगह से फूटी गागर ही सही
तनिक भी तो भर जाने दो .

Wednesday, August 1, 2012

धुंधलके में ...


साँझ के
धुंधलके में
हम तुम
जब मिलते हैं
कोई
गद्गद गीत
उभरता है ...
गा-गा कर
अक्षत अम्बर को
थिरकाता है
तर्षित तारों को
झिलमिलाता है
बातुल बिजुरी को
मचलाता है
और
चंचल चाँद को
और अधिक
दमकाता है ...
साँझ के
धुंधलके में
मंदिम-मंदिम
कहीं दीपक
जल सिहरता है
मंजिम-मंजिम
लौ झुक कर
ऐसे लिपटता है
जैसे
विकल विरह
मानो पिघलता है ...
साँझ के
धुंधलके में
क्षण-क्षण
संकोचित संगम
होता है
और सागर
सागर को ही
डूबोता है ...
प्राणों में
प्रतीक्षातुर
प्रीत लिए दिन
जैसे-जैसे
रात में
खोता है .

Saturday, July 28, 2012

क्षणिकाएँ...


एक जरा सी शुरूआत भी
बला की तूफ़ान ले आती है
फिर तो हलकी सी थपकी भी
जोरदार चपत लगा जाती है .

           ***

कोई कैसे बताये कि
कौन किसपर भारी है
हँस जीते या फिर बगुला
सिक्का-उछालू खेल जारी है .

           ***

गुदड़ी की गुत्थमगुत्थी भी
क्या खूब गुदगुदाती है
और बाँकी बर्बरता बैठकर
मजे में चने चबाती है .

           ***

टिमटिमाती मशालों की टीमटाम
हेठी दिखा कर हेल देती है
बरजोरी में अग्निशिखाओं को भी
एकदम पीछे धकेल देती है .

           ***

अनेक को एक ही सोंटे से
सोंटने में ही एकता है
जो ताखा चढ़ तूंबी बजाये
वो ही तुरुप का पत्ता है .


Tuesday, July 24, 2012

ख़ालिस खिचड़ी ...


आप पकाए क्या  ख़ालिस खिचड़ी
हांडी  को  ताकता  रह  जाए  खीर
बड़ा  नशीला है  ये जालिम नमक
जिसके   आगे   भागे   देखो  भीड़

बारह   मसाला   में   तेरह   स्वाद
लज्ज़त   लुटाये   आपका   चोखा
लार  टपक  कर  लड़ता  रह  जाए
और  जीभ  तो  खाता  रहे  धोखा

चाहे  आप  कुछ   भी  कहें  न  कहें
तनिक न  लगती  किसी को कड़वी
वर्जिश  करना  भी  भूल चुके  सब
आपका  घी  ही  घटाए  जो  चरबी

मिर्च  और   खटाई   खेले  खटराग
तिसपर पर्दापोशी करे  आप अचार
एक   बार  जो  जी  चढ़   जाए  तो
हिचकियाँ  लगाए  हुड़दंगी  विचार

बिन  जामन  के   ही  आप जमाए
कफ़ - वात- पित्त   नाशक    दही
छुआछूत   से  तौबा  कर  जीवाणु
हर  बात  को   बस   ठहराए  सही

कोई   हरजाई  जो  पलटी  मारे  तो
पटेबाज़ी  कर पटाये  आपका पापड़
मुँह पर  मैंने ऊँगली  डाल लिया जी
वर्ना  कहीं  खिचड़ी कर  दे न चापड़ .

Friday, July 20, 2012

मेरा पद्म तुम्हें भर लेगा...


गिरने   दो  अपनी   अहं - दीवारें
सम्पूर्ण - समर्पण   की   राहों  में
तब   मेरा  पद्म   तुम्हें  भर  लेगा
मूक -मिलन  के  मधुर  बाँहों  में

तुम  चाहे  जिस -जिस   देश रहो
जब -जब  चाहे   कोई  वेश   धरो
पल -पल की प्रतिच्छाया  बनकर
ये   अम्बुज  अंक   लगा  जायेगा

इन अधरों  के  इति  इंद्रधनु  बनो
और  बस भोले दृग की  बात सुनो
तरल -चपल  गतिविधियाँ  न्यारी
ये कलित कंज कर भरमा जाएगा

ज्यों   धरा   तरसे  तुम  भी  तरसो
उस   धाराधर  सा  जमकर  बरसो
तन - मन -प्राण से  भींग जाने को
ये जलज  भी  खिल-खिल जाएगा

विगत -आगत  से तुम  विरत रहो
जिधर मैं खींचू  बस  उधर ही बहो
मंद -मदिर  सा  अधीर  समीर में
ये  पुलकित  पंक  लहरा   जाएगा

माना  एक  से  बढ़  एक  चुभन  है
चंचल चित्त उद्वेलित  चिंतन  है
पर  कोई  सुन्दर  स्वप्न  सुनहला
ये  कमल  किलक  दिखा  जाएगा

शब्द - शब्द  से  कुछ  भी  न कहो
असह्य  वेदना  का  अनुताप सहो
तेरी   धड़कनों  की  आह का स्वर
ये  सरसिज  स्वयं  में  पा जाएगा

कोमल कितने प्रिय!चरण तुम्हारे
कि काँटे हिल -मिल  बसुधा बुहारे
और   तेरे   पथ  पर  पंखुड़ियों को
ये  शतदल  सदा  बिखरा  जाएगा

कितना  मृदुल - मोहक है  ये पाश
चहुँ ओर प्रिय! लखे  तेरा  ही भास
जिसपर गर्वित  रूप  कर निछावर
ये  नंदित नलिन  निखरा  जाएगा

मत  घबराओ  निज  हाथ  बढ़ाओ
मिट जाओ इन्हीं  शाश्वत चाहों में
तब   मेरा   पद्म   तुम्हें   भर  लेगा
मूक -मिलन   के   मधुर  बाँहों  में .

Monday, July 16, 2012

गहूँ - गहूँ


पीली  - पीली
उगूँ    -   उगूँ
सीली - सीली
बहूँ    -    बहूँ

चली  -   चली
रुकूँ    -   रुकूँ
कली  -  कली
फिरूँ   -  फिरूँ

मिली -  मिली
कहूँ     -  कहूँ
खिली -खिली
दिखूँ  -  दिखूँ

घड़ी   -   घड़ी
पगूँ    -   पगूँ
भरी   -   भरी
रहूँ     -    रहूँ

दिया  -  दिया
जलूँ   -   जलूँ
पिया  -  पिया
गहूँ     -    गहूँ  .

Friday, July 13, 2012

ग़ाफ़िल ग़ज़ल


जानते हो तुम
कि तुमसे ही है मेरी
मलाहत भरी मुस्कुराहट
बेसबब बेसमझ बेपरवा सी
न थमने वाली खिलखिलाहट....
और तुम खामख़ाह फुरकते ग़म देते हो
व मुद्दत बाद बेहाली से मिलते हो...
मैं रूठूँ तो यूँ न रूठो कहते हो
तिस पर खिलखिलाती रहूँ ख्वाहिश भी करते हो..
क्या कहूँ मैं...
कुछ न भी कहूँ तो
ये पलक ही उठकर
तुमसे हजार बातें कह जाती
और जब गिरती है तो
घबराकर क्यूँ साँसे तुम्हारी अटक जाती....
फिर तुम जबतक
इस माथे की उलझती-सुलझती लकीरों को
चूम-चूम कर सुलझा नहीं लेते
इन गालों की बदलती रंगत को
बड़ी सादगी से सहला नहीं लेते
गीतों के कुछ बेतरतीब पंक्तियाँ
बिन सुर गुनगुना नहीं लेते
उस चाँद के ग़रूर को भी
उसके दागों से आजमा नहीं लेते
और इस रूठी को मना नहीं लेते...
तबतक क़समें दे-देकर
वक़्त को तो रोक ही देते
छुनन-मुनन कर छेड़ती हवा को भी
झींख भरी झिड़क से टोक ही देते...
जैसे कि
मेरी मुस्कराहट की मुहताजी हों सब
जिसे देखकर खिल उठेंगे मोगरे के फूल
ठठा ठठाकर ठिठक जायेंगी
खिदमती खुशबू भी राह भूल....
फिर मानो पूरी कायनात ही
तुम्हारी इस ग़ाफ़िल ग़ज़ल की
गवाही देने को हो जायेगी बेचैन
और ये होंठ हिलते ही
मिल जाएगा सबको आराम-चैन....
ये जानते हुए भी
अजब-गजब अदा दिखा कर
मैं तो मानी हुई ही रूठी रहूँगी
कितने पिंगल पिरो-पिरोकर
तेरी प्रीत है झूठी कहती रहूँगी........
ताकि तुम यूँ ही
बेहिसाब ग़ाफ़िल ग़ज़ल गाते रहो
और बेताबी से बस मुझे मनाते रहो .

Sunday, July 8, 2012

सबकी अपनी मर्जी...


सबकी  अपनी  मर्जी
सबका   अपना   ढंग
कोई     मारे     सीटी
कोई     फोड़े    मृदंग

बेसुरा      छेड़े     सुर
बेताल     देवे     संग
लकवा    मारा   नाच
फड़के      अंग - अंग

दाद,   खाज,  खुजली
खूब     जमाये     रंग
मन-मौजी     मलहम
और    मिलाये    भंग

बेमौसम   फूल   खिले
कौन     करे    शैतानी
कैसे   छिपाए  पतझड़
हँफनी   भरी    हैरानी

मुश्किल  में  मानसून
किससे    माँगे   पानी
छीछालेदर   सुन-सुन
और    बढ़ी   परेशानी

राग-मल्हार    छेड़कर
दुश्मनी   किसने ठानी
अब      नहीं    चलती
उसकी   ही  मनमानी

आसमान    सा   हुआ
दमड़ी      का      दाम
रिश्वत   खाए  बादल
भूले    अपना    काम

कंबल    तले   लेटकर
केवल     करे   आराम
मौसम     पैर    दबाये
ठोंके     जोर   सलाम

दलाल     बन     हवा
खींचे   सबका    चाम
कितना    जहर   बाँटे
राहत   कमाए   नाम

लटापटी    खूब    करे
धागा     बिन    पतंग
झुका      रहे     तराजू
चढ़ा     हुआ    पासंग

दहाड़      मारे     दहाड़
तुनका    हुआ    उमंग
आवाज़   चुप्पी    खाए
गूंगा    मचाये   हुडदंग

सींकिया मलखंभ  चढ़े
दबका    हुआ    दबंग
देख  बदलती  दुनिया
खरबूजा  कितना  दंग

सबकी    अपनी   मर्जी
सबका    अपना    ढंग
कोई       चढ़े      सीढ़ी
कोई        करे       तंग .

Tuesday, July 3, 2012

चिरजीविता


मैं अनवरत
अपनी ही भाषा की खोज में
अपनी प्रकृति से
सतत स्पष्ट-अस्पष्ट
संवाद करती रहती हूँ...
स्वयं ही
दृश्य-अदृश्य गति-तरंगों में
वाक्य-विन्यास सी बनती-बिगड़ती हूँ...
अति आंतरिक किन्तु
जटिल संरचनाओं को उसके
मूलक्रमों में सजाती-संवारती हूँ.....
फिर शब्द-तारों को
सुमधुर स्वरचिह्नों में
समस्वरित-समरसित करती हूँ.....
सरल-विरल भावों के
सुलझे-अनसुलझे
रहस्यों को बुनती-गुनती हूँ.....
उस काव्य-बोध के
चरम-बिंदु का
पहचान-निर्माण करती हूँ....
जिसके द्वारा रचित
चिरजीविता कविता को
उसकी यात्रा पर
अक्षरश: अग्रसर करती हूँ....
सत्यश:
मैं....मैं तो केवल.....
अभिव्यक्ति का व्याकरण बन
नवरसों के नवसृजन का
बस मधुपान-मधुगान करती हूँ .

Monday, June 25, 2012

सच कहो...


मुझे
अपने हाथों की
प्रत्यंचा बना सकते हो...
अपने तरकस से
तीर पर तीर चला सकते हो...
बेध सूर्य-चन्द्र को
अँधेरे को जिता सकते हो...
मेरी ऊँगली से
अपना चक्र भी चला सकते हो...
तुम्हारी विराटता सिद्ध हो तो
कण-कण में
मुझे बिखरा सकते हो....
और अपने जय-घोष में
मुझसे ही
शंख भी फुंकवा सकते हो....
पर जब मैं
तुम्हारा भेद खोलने लगूँ तो
सच कहो
अठारहों अध्याय भी
कम तो नहीं पड़ जायेंगे .

Thursday, June 21, 2012

कहीं पा न जाऊं ...


कल्पना  जिसकी  संजोयी  हूँ
उसे  सामने कहीं  पा  न जाऊं

घड़ी -दो -घड़ी  के  लिए  सही
मैं  अधन्या उसे  भा  न जाऊं

उस की  वंशी - धुन  सुन कर
शहनाई सी कहीं बज न जाऊं

बिन   श्रृंगार - पिटारी  के  ही
उसके रूप  से  सज   न  जाऊं

ठगे से  इन नयन के  ठांव में
मैं लुंठित  कहीं  लुट  न जाऊं

और लज्जा की लालिमा ओढ़े
नवोढ़ा - सी  ही  घुट  न  जाऊं

ह्रदय पर जो हरक्षण  छाई  है
प्रिय -छवि तो  अनोखी होगी

वह  मधुर - बेला  मिलन  की
कितनी   चकित  चोखी  होगी

उसके रंग के छिटके  छींटे  में
आभा  मेरी  भी  निखरी  होगी

मरुदेश सा इस मन मरघट में
इक हरियाली सी बिखरी होगी

हिलोर  लेती  छुई -मुई  घटाएँ
गगन में ऐसे भी  घिरती होगी

बन कर  दाह की  चिनगारियाँ
प्यास अधरों पर  तिरती होगी

सरस-सरस  स्वर   ले -ले कर
अमराई बन  छिटक  न  जाऊं

महक-महक कर मदमाती सी
जूही सी  कहीं  लिपट  न जाऊं

यदि वो घड़ी अभी आ जाए तो
भावना में  मैं  ही  बह  न जाऊं

न जाने  किस - किस भाषा में
क्या  कुछ  कहीं  कह  न जाऊं

ठिठक  गये  यदि  पग   मगर
मन  लिए ही कहीं बढ़ न जाऊं

लोक - लीकों  का  तोड़  भरम
सोच के पार  ही  चढ़  न  जाऊं

गरल  विरह  का  पी - पी कर
प्रेम - गीत  कहीं  गा  न  जाऊं

कल्पना  जिसकी  संजोयी  हूँ
उसे सामने  कहीं  पा न  जाऊं .

Sunday, June 17, 2012

प्रेम-वरदान


माना कि हर समय
पलड़े का झुका काँटा है
और दैविक सुअवसरों ने
केवल दुःख ही दुःख बाँटा है....
पर सच देखा जाए तो
हीरे ने ही हीरे को काटा है
चाहे जितना भी खींचता हुआ
त्रासदियों का ज्वार-भाटा है....
कौन कहता है कि
जिसे तिरना नहीं आता
हर लहरों से वह हारा है
उसका भी क्षिति से क्षितिज तक
क्षण प्रति क्षण का सहारा है....
अनुक्त अनुभूतियों का भी
विस्तृत विसदृश्य किनारा है..
जिसने अतल गहराइयों से भी
हर बार , हर बार उबारा है.......
ये भी माना कि
जिसे जीवन की नदी में
अपना द्वीप बनाना नहीं आता...
गंभीर ग्रीष्म को देखकर भी
मेघ बन उफन जाना नहीं आता...
और सूर्य की दीप्त किरण से
विमल हो मिल जाना नहीं आता....
पर वे भी एक
अकल्प अद्भुत संयोग ही हैं
विषम व्यवधान हेतु
एक विलक्ष वियोग ही हैं......
किन्तु ये तो बस समय की बात है
जिसमें संभवत: नियति के
खलनायक का भी बड़ा हाथ है.....
ह्रदय तो बस
ह्रदय की भाषा जानता है..
काल-दूरी से परे जाकर
बस धड़कनों को पहचानता है....
कहीं से तनिक भी
पाकर अनमोल प्रेम-वरदान
निर्मल सरोवर सा
बन जाता है हर सूखा प्राण....
जी उठती है जिसमें असीमित धार
छोड़ सारे अहम् व वहम को
कर ही लेता है वो
अभिनव,अभिभूत,अपरिमित प्यार .

Tuesday, June 12, 2012

क्रांति...


सक्रिय सहभागिता मेरी
जीवन के हर एक
स्पंदन और विचलन में
उच्छृंखलता और नियमन में
चढ़ान और फिसलन में
अवसाद और थिरकन में...
पर साथ-साथ
फन उठाये एक डर भी
उलझाता एक एहसास भी
परजीवी होने का....
अपने पेट में ही
उलझ-सुलझ कर
अपनी स्वतंत्रता को
कमोवेश निगलते जाना....
अपनी ही बिठाई
निष्पक्ष जाँच की धार पर
संभल-संभल कर चलना....
न जाने कब
अपदस्थ कर दी जाऊं...
अपने ही किसी काल-कोठरी में
नजरबंद कर दी जाऊं...
तब एक चरम बिंदु तय करके
समग्र साधनों को संचित करके
अगुआई करती हूँ
एक आत्मक्रांति की
और हो जाती हूँ - मुक्त
कुछेक पल के लिए...
हाँ! ये मेरी क्रांति ही
झझकोर रही है आज
समस्त संधित
संदीप्त चेतना को .

Sunday, June 3, 2012

पुन:पुन:...


तुममें खोई थी
कुछ बीजों को बोई थी
अब फूल खिलें हैं
काँटों में भी उलझे हैं....
तुममें खोती रही
बस तुम्हें
फूल ही फूल देती रही
और कांटे चुभोती रही....
चुभे काँटे हैं
दर्द देंगे ही
लाख मना करूँ
पर तुमसे कहेंगे ही....
तब तुम बाँहों में मुझे
यूँ घेर लेते हो
उन्हीं फूलों को
बिखेर देते हो
और कहते हो -
भूल जाओ दर्द को....
ये जिद ही है मेरी
कि मैं
तुममें यूँ ही खोती रहूँगी
और काँटे चुभोती रहूँगी
बस तुम्हें फूल देती रहूँगी
पुनर्नव पीड़ा पिरोती रहूँगी
पुन:पुन:
बस तेरे बाँहों के घेरे में
होती रहूँगी और खोती रहूँगी .

Monday, May 28, 2012

इसलिए ...


अक्सर
मेरी कविता
लाँघ जाती है
अनगिनत खींची हुई
लक्ष्मण रेखाओं को...
रावणों को
चकमा देकर
हथिया लेती है
पुष्पक विमान...
विस्मृति में कहीं
भटक रहे हैं
हनुमान...
जटायु को
ज़िंदा रखना है
इसलिए खुद ही
लाती है संजीवनी बूटी...
लम्बी सेवा के बाद
सुरसा को
मिली है छुट्टी...
पर उस
त्रिजटा को
कौन समझाए
जो कर रही है
प्रतिपल प्रतीक्षा
उसी अशोक वाटिका में .

Thursday, May 17, 2012

क्षणिकाएँ



बेझिझक बोलों के अब
पोल खुले ही रहते हैं
जिसपर बेमानी बुद्धिवाद
चिथड़ों में सजे रहते हैं .


बबूला भी बलबलाकर
बड़ा होने में ही फूटता है
पर इन्द्रधनुषी इठलाहटों का
कोई भ्रम कहाँ टूटता है .


भला कौन किसको अब
कोई परामर्श दे सकता है
जहाँ एक घास का तिनका भी
अनुभवों को बाँचते फिरता है .


उपद्रवी ब्योरों का भी
ब्योरा-ये-हाल कोई तो कहे
जो चींटियों की धड़कनों पर भी
धड़कन रोके नजरें चुभाये बैठे हैं .


नगाड़ों में खुदुर-बुदुर कौन सुने
सब समय की ही तो बात है
नक्कारखाना भी अब हैरान है
जिसमें तूती की चलती धाक है .


तूफानी विचारों की आँधी में
बेचारा 'देश'तो वही रह जाता है
पर अक्सर आगे लगा 'उप'
बस 'आ' में बदल जाता है .



Thursday, May 10, 2012

प्रीतम का संदेशा


रोम-रोम को
अकस्मात सुख ने सिहराया है
चिर प्रतीक्षा की
व्याकुलता ने मानो वर पाया है
टिमटिमाते लौ से
जित ज्वाला सा जगमगाया है...

लगता है कि
मेरे प्रीतम का संदेशा आया है

ठहरी हवाओं को
प्रेम पंखो पर झुलाया है
पीपल पातों ने
ये कैसा कोलाहल मचाया है
चुप चातकी ने
चहक-चहक कर चौंकाया है...

हाँ ! प्रीतम का
प्यारा संदेशवाहक ही आया है

मरू नभ पर
घनघोर घन लहराया है
मोर मोरनी के
नयन में नयन दे मुस्काया है
नए-नए गीत
नई ध्वनियों ने मिल गाया है...

हुलस कर जिसे
मैंने भी निज-हाल सुनाया है

हर पल पर
लिखी पाती उसे थमाया है
कि ह्रदय को
कैसे मैंने उपासना-गृह बनाया है
अपने प्रीतम को
उसमें देव सदृश बिठाया है...

हठचेती ह्या ने
हठात भेद उगलवाया है कि

बिन मदिरा के
बेसुध सी रात ने मुझे भरमाया है
और भोर तक
जगते सपने ने निर्मोही को दिखाया है
हर तत्पर दिन
पुन: सूनी संध्या में समाया है...

हलाहल पी कर
मैंने भी ये संदेशा भिजवाया है

कि उसका दिया
विरह उपहार भी बड़ा मनभाया है
और हर्षोन्माद में
बस उसी को तो मैंने पाया है
दुःख देकर भी
आखिर उसी ने तो दुलराया है...

हाय ! प्रीतम तक
कैसा संदेशा उसने पहुँचाया  है .

Sunday, May 6, 2012

एक थकान की मन:स्थिति में


एक थकान की मन:स्थिति में
शरीर के ज्वार-भाटे में
बिना जिद के तिरते रहना....
बेवश विवशता के नियमों को
उसके गतिनुसार चलते देखना...
क्षुद्र स्वार्थों के लिए दौड़ में बनाए
कीर्तिमानों का आकलन करना...
मड़ियल मिश्रित मुस्कान लिए
स्वयं के साथ किये गये
उपघाती उत्पीड़नों का उल्लाप करना
और छटाँक भर राहत के लिए
छद्मावरण तोड़ देने के लिए छटपटाना....
उफ्फ़ !
फिर मन तो मन ही है
उसी थकान की मन:स्थिति में
करता रहता है अपना काम...
मजे से मचल कर वह
विचारों को एक राजसी ठाट-बाट दे
अपने बादशाही बिछौने पर
आराम से लिटा देता है...
हौले-हौले पंखा झलता है
धीरे-धीरे उसके पाँव दबाता है...
कुलबुलाते सवालों व खलबलाते खेदों से
विशेष अनुरोध करता है कि वे
सुबह की ताज़ी हवा का सेवन करें
और एकात्मक एकांत का
मौन अभ्यास व अध्ययन करें....
आह ! उसी मन:स्थिति में
अपनी बुद्धिवादिता पर वह हँसता है
विस्मित होता है , आश्चर्य करता है....
एक आभासी शक्ति से स्वयं को
प्रोत्साहित करता है और देता है
एक खुला आमंत्रण
उस पूर्ण चंद्र को भाँवर रचाने के लिए
उसे कहता है- इन ओठों पर
गहरा व लंबा चुम्बन जड़ने के लिए...
रिझाने व मनाने के लिए
और फिर राव-चाव से
रास-क्रीड़ा करने के लिए....
ताकि सबकुछ भूल कर
इस तिरते ज्वार-भाटे में
तिरते-तिराते हुए सबकुछ
हो जाए पूर्णत: तिरोहित
उसी थकान की मन:स्थिति में .

Tuesday, May 1, 2012

कल्पशून्य


तुमसे प्रेम करके
जितना मैंने
खुद को बदला है
तुम्हारी जरूरतों और इच्छाओं के
प्रमादी प्रमेय के हिसाब से
उतना ही तुम
अनुपातों के नियम को
धता देकर सिद्ध करते रहे
कि चाहतों के गणित को
सही-सही समझना
मेरे वश की बात नहीं.....
जबकि मैंने तो
गणितीय भाषा से
केवल जाना है
एक अनंत को....
और तुम जोड़-तोड़ करके
मुझे बंद कर लेते हो
अपनी चाहतों की
छोटी सी कोष्ठक में......
प्रेम किया है तो
तुमसे कोई शत-प्रतिशत
परिणाम पाने की चाहत भी नहीं
बल्कि तुमसे सूत्रबद्ध होने के लिए
करती रहती हूँ सूचकांक को
शून्य से भी नीचे.....
ताकि पूरी तरह से तुम
होते रहो संतुष्ट
और मैं छू-छू आऊँ
उस अनंत को.....
पर तुम मुझे यूँ ही
गुणा कर लेते हो
किसी शून्य से और
अपने संख्यातीत चाहतों के
आगे-पीछे लगा लेते हो
केवल अपने हिसाब से....
क्या तुम नहीं जानते कि
तुम्हारा गणित भी है सूत्रहीन
या तो मेरे अनंत होने मात्र से
या बस कल्पशून्य होने मात्र से . 

Thursday, April 26, 2012

तदर्थ गढ़ा है ...


आत्म विभोर होकर
सस्ते में मैंने मान लिया कि
हर एक शब्द हीरा है
मंहगा न पड़ जाता कहीं
आत्मभार इसलिए
चुटकी बजा कर उठा लिया
ऐसा-वैसा हर बीड़ा है ....
अब क्षमता से अधिक भार लिए
कलम के नीचे दब रही हूँ
खुद को तो बचाना ही है तो
अपनी स्याही की ताकत को
खोखले शब्दों में भर रही हूँ.....
हैरान हूँ , वही आड़ी बन कर
मुझे ही ऐसे चीरा है
किससे और कैसे कहूँ -
आहत अभिमान बड़ी पीड़ा है ...
उलटे शब्दों ने व्यंग से कहा -
निराशाओं की पगडण्डी
इतनी छोटी होती नहीं
आँखों से चाहे गिरा लो
जितने भी आँसू
पानी ही है कोई मोती नहीं
अब बिचारी गंगा भी
धर्म व नीति के विरुद्ध
आचरणों को धोती नहीं
समय की भी टूटी कमर है
इसलिए सबको वह ढ़ोती नहीं...
और तो और ... मेरे बिना
कोई बात भी तो होती नहीं.....
सीना चौड़ा करके गर्व से
शब्द आगे कहता रहा -
जरा देखो हर तरफ बस
मेरा ही बोलबाला है
हर उजली बातों के पीछे
कहीं तो छिपा कुछ काला है...
मुझसे ही सजे हुए सबके
अपने -अपने अखाड़े हैं
जितना भी खेले गुप्त दाँव-पेंच
लेकिन सब मुझसे ही हारे हैं....
आखिर मुझसे ही तो
हर एक नाम लिखा जाता है
फिर अपने ही जमघट में ही
तड़प-झड़प कर खो जाता है....
नाम वाले कहते हैं - मुझमें
उन्होंने अपना अर्थ भरा है
पर सच तो यही है कि मैंने भी
उनको तदर्थ गढ़ा है .

 

Friday, April 20, 2012

किस भाँति मैंने....


मत पूछो कि
किस भाँति मैंने
निज को लुटाया है

अपने ही बंद झरोखे को
धीरे से खुलते पाया है
मैं न जानूं कौन है वो पर
चुपके से कोई तो आया है....
नींद बड़ी गहरी थी तो
झटके में उसने जगाया है
पसरे चिर सन्नाटे को
हौले-हौले थपकाया है.......

मत पूछो कि
किस भाँति मैंने
मन को लुटाया है

स्फुटित श्वास ,स्तब्ध नयन
हाय ! ये कैसा सौन्दर्याघात है
एक उत्तेजित,उल्लसित किन्तु
स्निग्ध उल्कापात है.....
ढुलमुलायी हवाओं में भी
कोई न कोई तो बात है
क्या ये अतर्कित प्रेम का
उदित,अनुदित उत्ताप है.....

मानो मुंदी-मुंदी रातों में
धूप सा वह उग आया है
मेरे पथरीले पंथों पर
दूब बन कर लहराया है.......
उहूँ ! मेरे विश्व में ये कैसा
संदीप्त सनसनाहट मचाया है
तैर रही हैं लहरें और
सागर को ही डूबाया है......

अब तो ये मत पूछो कि
किस भाँति मैंने
उसको पाया है .




Monday, April 16, 2012

काव्य-धारा


जरूरतों और इच्छाओं के इर्द-गिर्द
नाचती-घुमती दिनचर्या में
जीवन के काव्यात्मक उपकरण
कैसे/कहाँ खो जाते हैं कि
उन्हें खोजने के लिए
लेना पड़ता है सहारा
सूक्ष्मदर्शी/दूरदर्शी यंत्रों का....
फिर भी चारों और से
घेरे रहता है भयानक भय
बाकी सब खो जाने का....
यदि कभी/कहीं वे
मिल भी जाते हैं तो
सारे तार ऐसे तार-तार होते हैं
कि सधे हाथों से भी जोड़ो तो
ऋणात्मक-धनात्मक छोरों में
ठनी होती है अड़ियल अनबन...
व विभिन्न तीव्रता में प्रवाहित धारा
कुछ ज्यादा ही होती है
जोरदार झटका देने के लिए....
उसके जंग लगे कल-पुर्जों से
लगातार होता रहता है
कानफोडू कोलाहल
साथ ही विषैले रिसाव का
दमघोटूं दबाव धमनियों पर...
तब ख्याल आता है कि
ज़िंदा साँसे भी होती है या नहीं
ये भी ख्याल आता है कि
बाज़ार में उछाल पर क्यों है
कृत्रिम ऑक्सीजन की मांग/आपूर्ति...
सब मानते हैं / मैं भी
ज़रूरी है कोई भी ऑक्सीजन
काल्पनिक काव्यशैली में भी
जीने/ जिलाने के लिए
कृत्रिम फूलों की कृत्रिम सुगंध के
आदान/प्रदान के लिए...
सबसे ज्यादा तो ज़रूरी है
खुद को ज़िंदा दिखाना
एक-दूसरे को भरोसा देना
सुन्दर-सा मुस्कान चिपकाए रखना
और ये कहते रहना कि
कृत्रिम काव्य-धारा में भी
कितना सुन्दर बह रहा है जीवन .



Tuesday, April 10, 2012

कहीं ऐसा न हो ....


कहीं ऐसा न हो ....

अत्युक्ति में
सुन्दरतम सत्यों का
कुरूपतम उपयोग
अदम्य अभियान न हो जाए

अतुष्टि से
भाग्य के ढाँचे में
अकर्मण्यता ढलकर
सतत अनुष्ठान न हो जाए

अति स्वप्न में
बड़ी आशा से
छलक कर मनोबल
साश्चर्य ढलान न हो जाए

आत्म प्रवंचना में
सागर का दंभ भर
भ्रमित तालाब सा
ग्रंथित ज्ञान न हो जाए

अति विनम्रता भी
सम्मान पा कर
अहंकार का
सुसज्जित परिधान न हो जाए

किसी वसंत में
खिलेगा कोई फूल
सोच-सोच कर
भविष्य वर्तमान न हो जाए

और अंत में...

सतयुग के आने की
आहट पाकर
कहीं कलयुगी मानव
सयत्न सावधान न हो जाए .




 

Friday, April 6, 2012

घिर बदरा कारे...


गर्मी  का उत्ताप
धरा  करे विलाप
पड़   गयीं   दरारें
सूखे   ओंठ  सारे
उड़     रहीं   धूल
मूर्झा   गये  फूल
पीड़ा    सी   हूकी
कोयल जब कूकी
अमिया  है उदास
बुझ   रही   आस
मन  विकल खग
बाट   जोहे   जग

घिर  बदरा  कारे
आ रे आ रे आ रे !

अँखियाँ न  मींचो
प्राणों  को   सींचो
कर   बूँदा - बाँदी
तृप्ति  की  आँधी
शीतल  हो अगन
भींगे   तन - मन
बगिया  में  बहार
यौवन  का खुमार
मंगल  बेला आये
घट  - घट    गाये
तेरे     संग   झूले
सब   दुःख   भूले

घिर   बदरा  कारे
आ रे आ रे आ रे  !

Tuesday, April 3, 2012

अनागत कुसुम


हवा के झझकोरे से
बिखरे पत्तों को देखकर
बच्चों की भाँति
ठिठक जाता है - भीरु मन
और चलने से मना करता है
एक भी कदम...
फिर उसी हवा के झोंके में
देखता है भर अचरज - मन
कोरा कोंपल -कलियन
कि प्रस्तुत होता है अप्रस्तुत मन
पूरे अकड़ और जकड़ के साथ...
मजबूर करता है सामने पड़े
धारणाओं के चट्टानों को
मजबूती से परे लुढकाने को...
अपने तले कुचल कर
आती सारी अड़चनों को...
भुलाकर अबतक की सभी
भूलों और पछतावों को
व्यर्थ की शंकाओं एवं दुष्कल्पनाओं को..
अचानक से इसी पल में
न जाने कहाँ से
आ जाती है इतनी शक्ति कि
घुमावदार मोड़ों पर भी
आत्मबल का लेकर छाँव
सीधे पड़ने लगते हैं टेढ़े पाँव....
सधने लगती है दृष्टि भविष्योन्मुख
विषम संघर्ष से अनुभावी सुख.....
शांत हो कहता है - मन
-- यही है जीवन
भला रुकी है हवा किसी क्षण...
माना कि है
अनुभवों का बीहड़ वन
पर इसी में एक दिन
खिल उठते है
अति सौरभ बिखेरता हुआ
अति सुन्दर अनागत कुसुम .

 

Saturday, March 31, 2012

मेक-ओवर


इस 'आज' की
बौखलाई कविता से
( समाचारवाचिका सी )
संतुलित संवेदना भी जाहिर होती तो
सहनीय होती उसकी बौखलाहट
शब्द वाया भावों की
थोपी जिम्मेदारियों से
कटघरे में घेर कर भी
बरी कर दी जाती
( समाचार सी पढ़ ली जाती )
इस 'आज' के
हालातों - ज़ज्बातों को वह
बिना लाग-लपेट के कहती रहती
ख़ुशी-गम से निकली आह-वाह को
ख़ुशी-ख़ुशी सहती रहती....
पर इस 'आज' की
बौखलाई कविता
एकालाप से त्रस्त कविता
कंठ के आक्षेप से ग्रस्त कविता
अब चुप ही रहना चाहती है
कोई लाख बोलवाये पर
मुँह नहीं खोलना चाहती है....
जबकि इस 'आज' का
बौराया कवि ( मैं भी )
सब रसों का रस चूस-चूस कर
अपना रस टपका-टपका कर
कविता कहता है
और खुद ही इतना बोल जाता है
कि बड़ी मुश्किल से
इस 'आज' की कविता में
ढूंढी गयी रही-सही
खूबसूरती भी
खुद कवि के ही काया-क्लिनिक में
अत्यधिक रंग-रोगन करके
शब्दित मेक-ओवर की
सुलभ शिकार हो जाती है .

Tuesday, March 27, 2012

लिख सको तो...


मेरे प्रेम में
लिख सको तो
महाकाव्य लिखना
आसमानी भाव के
अंतहीन पन्नों पर...
कह सको तो
अपने तप के
बादलों को कहना
झूम-झूम कर
बरसता रहे
अनवरत
अमृत धार बनके
और
हर प्रेमाकुल
तप्त ह्रदय को
सींचता रहे
प्रतिपल
पतित-पावन
संस्कार बनके...
जो केवल
शब्दों की शोभा
न बनकर
शंखनाद सा
बजता रहे
बारबार
प्राणों के तारों पर
शाश्वत ओंकार बनके .
लिख सको तो...

Wednesday, March 21, 2012

बस कोई ...


सत्यश :
जो जैसा है
समर्पित है
स्वयं सत्य को
बस कोई
पूर्ण प्रमाण
देने वाला चाहिए...

सुना है
रोशनी तो
पलक पर ही
विराजती है
बस कोई
दक्ष दस्तक
देने वाला चाहिए....

गिरि पर
गर्भिणी गंगोत्री में
दिखती नहीं गंगा
बस कोई
सूक्ष्म नयन
देखने वाला चाहिए....

कुछ बूंदें
जैसे-तैसे
हाथ तो लगी है
बस कोई
सागर का
पक्का पता
बताने वाला चाहिए...

कहते हैं
काव्य में
मधुरता और
मादकता होती है
बस कोई
संज्ञा सिद्ध
करने वाला चाहिए....

अभी भी
बस एक
जरा सी कड़ी
खोई-खोई सी है
बस कोई
एक आखिरी बात
जोड़ने वाला चाहिए .  

Sunday, March 18, 2012

भीड़


मेरे भीतर
बहुत ही बुरी हालत में
ठेलम-पेल करती हुई
एक बदहवास भीड़
अजीब चाल में मुझे चिढाती हुई
हरवक्त रेंगती रहती है.....
मेरे ही नाक के नीचे
सभाएं आयोजित करती है , रैलियां निकालती हैं
मजे की बात है - मुझे नेता बनाती है
भावुकता के अतिवादी क्षणों में
ऊंचे-ऊंचे वादे करवाती है
आश्वासनों के दीये जलवाती है....
अपने खुले पेट पीट-पीट कर दिखाती है
मांगों की लम्बी फेहरिस्त भी थमाती है
जिसे पूरा करना मेरे बस की बात नहीं
उसी में मैं भी हूँ,कोई मुकुट धारी नहीं...
उम्मीदों के टूटने पर वे मुझे ही
विनष्ट करने की योजना बनाती हैं
और मैं चौबीसों घंटे
पीछे से अनेक -अनेक रूपों में
खुद पर अज्ञात हमलों के डर से
असहाय , निरुपाय महसूसती हूँ....
पूरी हिम्मत जुटाकर उन वादों से
सरेआम मुकर जाना चाहती हूँ
और उस दीये को भी
फूंक मार बुझा देना चाहती हूँ.....
मैंने तो जन्म नहीं दिया है
किसी भी राजशाही या तानाशाही को
बल्कि आत्मबल को थपकियाँ देकर सुलाया है
कमजोरियों के साथ जीना सीखा है
कतार में लगने का अभ्यास किया है
बिना प्रतिवाद के धक्का-मुक्की खाकर
और पीछे होना भी स्वीकारा है
लाल कालीन को घृणा से ही देखा है
जिसके नीचे बहती है खून की नदियाँ....
तो फिर मेरे भीतर
किस क्रान्ति के नाम पर
केवल मशालची ही दिखते हैं
जो मुझे ही मंच पर पटक कर
मेरे हड्डी-मांस-मज्जा से खेलते हैं....
सिर्फ एक वहशत , पागलपन
आशंकाओं का उफनता सैलाब
जैसे कि केवल मैंने ही
उन्हें बना दिया है
बंधुआ मजदूर सा आम आदमी
और धोखे से दिखा दिया है
राजमार्ग के उस छोर का राजमहल.....
मुझमें तो इतनी ताकत नहीं कि
किसी इतिहास को दुहराने से रोक दूँ
या फिर भीड़ को उकसा कर
कोई नया इतिहास रच दूँ.....
विकल्प के अभाव में
अभावों को सहती हूँ
उसी भीड़ के साथ जीती हूँ
और उसी भीड़ में मरती हूँ .




 

Wednesday, March 14, 2012

सृजन बेल


चकित हूँ / चिंतित भी
कलम - कागज़ के बीच
कसमसाती सृजनशीलता को देखकर
जी करता है हरवक्त उसे
हौले - हौले सहलाती रहूँ
विवशताओं की कमजोरियों को
अक्षरों से गुदगुदाती रहूँ........
अब तो इस कलम के सहारे
छोटे - बड़े हर पहाड़ को
जड़ से ही काट लेती हूँ
भूगर्भीय भूकंप के झटकों से
फिर बनते पहाड़ों को भी
झटके में भांप लेती हूँ........
माना कि गेंद बनाकर
शब्दों से खेलते रहना
कोई खूबसूरत शगल नहीं है
पर चोटील दर्द के डर से
चुप्पी की खाई में गिरकर
घुटनों पर घिसटते रहना भी
कोई खुशगवार हल नहीं है......
मन तो ललचता ही है कि
आँखों में जरा खुमार भरकर
सर पर कई-कई पाँव धरकर
अकल्पित/ अपरिचित ओर-छोर को
इस छोटी सी कलम की
छोटी सी नोक से नापती रहूँ
और अति यत्न से संचित
उत्साह को बेझिझक /बेवजह
बस बेहिसाब बांटती रहूँ........
मुझे क्या पता था कि
ये उत्सुकता / आकर्षण ही
सृजन बेल सी लतर जायेगी
और काँटों पर भी ललककर
खुद ही अपना आशय बताएगी .


Wednesday, March 7, 2012

मेरे सांवरे


हाय ! रंगों को भी
कुछ न समझ में आये
मेरा भोला फागुन भी भरमाये..
मैं न जानूं मेरे बावरे
तुझे मेरा कौन सा रंग भाये
जिसमें तू रंग-रंग जाये..
और मुझे भी ऐसे अंक लगाये
कि अंग-अंग केसर बन जाये....
फिर देख पड़ोसन जल-भुन जाये
भरदम कानाफूसी करके
आपस में उलझ-सुलझ जाये.....
सुनो न ! मेरे सांवरे
सब नाजो-नखरा छोड़ कर
तेरी बावरी क्या बोली-
तेरे संग खेलेगी वह होली
और वे झिलमिल तारे
नभ की डोली सजायेंगे
सारे बादल कहार बन जायेंगे
बस तुम मेरे रंग महल में आओ
मदिरा सा अपना प्यार लुटाओ....
मैं भी फागुनी बयार बनके
बेला ,चंपा ,चमेली से
सोलहों श्रृंगार करके
प्राणों से प्रणय की मनुहार करके
खुशबु सी यौवन लिए सकुचाउंगी
और सांस भर-भर कर
मेरे सांवरे
बस तेरे ही रंग में रंग जाउंगी .

Thursday, March 1, 2012

लाजवंती


न जाने
किस बात पर आज
उनसे ही उनकी
ठनी हुई है
जो मेरे प्राणों-पंजर पर
विपदा सी बनी हुई है...
उनकी आँखें
इसतरह से है नम
कि बरस रहे हैं
मेरे भी घनघोर घन....
रूठे जो होते तो
बस मना ही लेती
अपने रसबतियों में
उन्हें उलझा ही लेती....
पर हवाओं से भी
वे कुछ न बोले
अपने पीर का भी
घूँघट न खोले.........
कोई बताये किस विधि
उनसे उनकी सुलह कराऊँ
और विह्वलता के
बूँद-बूँद को पी जाऊँ.....
ये ह्रदय -फूल
क्षण-क्षण मुरझाये
प्रस्तर-प्रतिमा से
जब वे हो जाए......
आखिर कब लेंगे
सुधि हमारी
मैं भी तो हूँ
बस उनकी ही प्यारी....
जब प्रीत किया है
तो क्यूँ न उनकी
दीवानी कहाऊँ
और मैं लाजवंती
लाज की हर मर्यादा को
बस उनके लिए ही
लाँघ -लाँघ जाऊँ .

Saturday, February 25, 2012

क्षणिकाएँ...

सुबह से ही
खोल - खोलकर
खाली किताबों को 
बोल - बोलकर 
पढ़ती हूँ
और रात ढलने तक 
अदृश्य लिखाई से 
अपने पन्नों पर 
केवल तुम्हें ही 
भरती हूँ .

    ***

मर्म की बात
ओठों से कहूँ 
या कि न कहूँ
तुम ही कहो
कि कैसे मौन की 
शेष भाषा में 
केवल  तुम्हें ही गहूँ .

      ***

कुछ साधारण से 
शब्दों को 
जोड़ - जोड़कर
अपने गीतों में 
केवल तुम्हें ही 
रचा है 
पर मुझ सीपी में 
गिरने को 
वो स्वाति बूंद
अभी भी बचा है .

     ***

मोतियों की 
मंडी में तो
एक से बढ़ एक 
मोती चमक रहे हैं
पर मेरी 
चुंधियाई आँखें 
केवल तुमसे ही 
दमक रहे हैं .

Tuesday, February 21, 2012

साबूत


सूक्ष्म  उलझाव  की  गलियों  में
तन-मन   भटक-भटक जाता है
देख उद्विग्न  जगत का उपद्रव
अपने  को  असहाय  ही  पाता है

असंग भाव  में  बह-बह कर भी
संगी-साथी  हिल-मिल जाते  हैं
प्रेम-विरह  के  शाश्वत क्रीड़ा में
ठिठक-ठिठक , रुक  से  जाते हैं

प्राणों  को  कौंधाने  वाली  पीड़ा
क्यूँ   तड़क -तड़क  तड़पाती  है
सह-सह  के मर्माघात अनवरत
किंतु अभ्यस्त कहाँ  हो पाती है

बस  एक बवंडर बन के  धूल का
आँखों  में  यूँ  घिर-घिर आता है
शांत - शिथिल  हो  जाने पर भी
गहरे चिह्न  कोई  छोड़ जाता है

लहक-लहक   कर  आग  उसे तो
पूरी तरह  राख नहीं  कर पाती है
वह  आकाश तो  उड़  ही जाता है
बस एक  बंद मुट्ठी  रह जाती है

छोर  नाप-नाप  थके  पल -छिन
कभी भी, चैन  तनिक  न पाते हैं
बढ़ ग्लानि से  गलबहियाँ कर के
सिसक-सिसक  के  सिसकाते हैं

कई-कई  पर्तों में  वही  एक घाव
उभर -उभर कर  चला  आता  है
कई पाटों  में  पिस-पिस कर भी
साबूत  का  साबूत  बच जाता है  .



Friday, February 17, 2012

द्यूत- बिसात


मन के
हस्तिनापुर में
हमेशा बिछी रहती है
द्यूत - बिसात ..
तार्किक अड़चनों में
उलझा अर्जुन
चुप है
हारे हुए हर दाँव की
लगती ऊँची बोली पर
और शातिर के
पक्ष में घोषित
शापित परिणाम पर ...
फिर भी
इस द्वन्द-युद्ध में
गांडीव उठाकर
कर रहा है वह
कृष्ण की प्रतीक्षा
जो कहीं मगन है
अपने ही रासलीला में .



द्यूत---जुआ 

Monday, February 13, 2012

उसी ढलान पर ...


फिसलन भरी
हर ढलान पर
बस मुस्कुराते हुए तुम
मेरे अनाड़ी किन्तु
अटल अभिमान पर...
हर रुत में मुझसे
करके बाँहाँ-जोड़ी
हलके से उठाकर
मेरी लटकी ठोड़ी
और माथे को चूमकर
तुम कहते हो - यही प्यार है..
संदेह के परे
बड़ी-बड़ी फैलती
भौचक्क मेरी आँखे
देखती है तुम्हें अपलक
और बिजली की गिरती
हर कौंध में
छिटकती है तुमसे
बस मेरी ही झलक...
तुम्हारी मनमोहक निश्छलता
अचंभित करती दृढ़ता
थामे है मुझे
उस ढलान पर भी
जिसपर फिसल रहा है
समय पर सवार जीवन
व सुख-दुःख का हरक्षण.....
अनायास कई बार
उन्हें लपकने को
बढती है मेरी चपलता
पर हर बार
रोक लेती है मुझे
तुम्हारी तीक्ष्ण सतर्कता...
फिर माथे को चूमकर
कहते हो मुझे - यही प्यार है
उसी ढलान पर .

Wednesday, February 8, 2012

गरीबी - रेखा


गरीबी के अंतिम दुर्भाग्य से
पूरी तरह कुचला हुआ
न जाने किस सपनीली उम्मीद पर
हताशा के आखिरी छोर पर भी
मजबूती से टिका हुआ
लिपटे कफ़न में भी जिन्दा गरीब...
चुटकी भर नमक से भी सस्ती
अपनी जान को चुटकी में दबाये
गरीबी के नशे में लड़खड़ाता हुआ
क्यों दिखता है न हमें आपको हर जगह...
जिनके लिए हमने -आपने तो
बिल्कुल ही नहीं ....तो
कहीं इस काल-कुचक्र ने तो नहीं
जबरन खिंचवा रहा है हमसे -आपसे
वही एक रेखा - गरीबी रेखा......
हाँ ! उसी लक्ष्मण रेखा की तरह
हम-आप बातें करते हैं उसे उठाने की
उठ आते हैं कितने ही भाव चुपके से
हमारे ह्रदय के मरघटी कोने में...
जब निकलता है संवेदना के बोल तो
अपने लिए धन्यवाद ज्ञापन उपरवाले को
उनके लिए दिखाते-भींचे ओठ के पीछे
दबा लेते हैं हम राहत की मुस्कान..
चेहरे पर बनाई गयी चिंता-रेखा पर
गुलाबी सुगंध से फड़कते हमारे नथुने..
उपहासी नजरों से खाई को देखना
पुल बनाने का आडम्बर करना
जिसे अँधेरे में गिरा भी देना
इतना काम कम है क्या
अपनी पीठ थपथपाने के लिए....
साथ ही गरीबी-विमर्श से हम
चालाकी से छुपा लेते हैं उस
मारामारी के प्रतिस्पर्धात्मक डर को
जो रेखा मिटने से हो जाएगा बेकाबू
हाँ ! समय बदल गया है
और समय से ज्यादा हम.....
उस रेखा के उस पार हैं वे गरीब
और इस पार हम आधुनिक रावण जो
हरण सा कुकृत्य भला क्यों करने लगे
बस उन्हें थोड़ा खींच कर
उसी गरीबी रेखा पर खड़ा करके
उन्हें यूँ ही जलते देखे .


एक सवाल खुद से ही---- कि हम गरीबी रेखा बढ़ाने के लिए क्या कर रहे हैं ?
 

Saturday, February 4, 2012

मरिचिजल


क्यों भर आता है
उन्मुग्ध नयन
जब ठहर जाता है
शीतल उच्छ्वास भर
उत्कंठित पवन...
घेर लेती है मुझे
कहीं से आकर  
कोई कोमल किरण...
अचानक से
झिलमिला उठता है
बोझिल मन....
धीरे-धीरे पसरता है वही
कुछ अन्तरंग क्षण
जिसमें
खिल उठते हैं असंख्य
व्यथा - सुमन
चहुँ ओर गूँजने लगता है
करुण - कूजन
ओह !
बड़ा बेचैन हो जाता है मन
और वही
यादें हो जाती हैं
इतनी सघन
कि बहने लगती है
व्याकुल नदियाँ बन
तब दृष्टि-परिधि तक
दिखता है केवल
विरह - वन....
और क्या कहूँ ...?
या कैसे कहूँ....
कि मैं विरक्ता
तुम्हारे होने के
हर मरिचिजल पर
भरने लगती हूँ
विकल - कुलाँचे
निरीह मृगी बन .

Wednesday, February 1, 2012

स्वप्नांत


स्वप्नों ने
क्या खोया ,क्या पाया
अपने रंग-बिरंगापन पर
क्या खूब इतराया..
खुद को खींच-खींच कर
न जाने कितना
अजूबा क्षितिज बनाया..
वही भाग-भाग कर
हैरत भरी नजरों से
उसे देख भी आया..
जब पकड़ना चाहा तो
कभी पास तो कभी
बहुत दूर पाया....
तब शायद
खुद पर खूब पछताया
सर पर हाथ रख
घुटनों में मुँह छिपाकर
दो-चार आँसू भी बहाया
तो कभी उस क्षितिज को
धक्का दे-देकर
दूर कहीं अपने ही किसी
अन्तरिक्ष में फेंक आया...
जिसे फिर वह
स्व्प्नगत ही पाया....
स्वप्नों ने
खुद को जिलाया तो
कितना कुछ गंवाया
और वो जो
कितना कुछ बचाया तो
अंतत: स्वप्नांत ही पाया .

Saturday, January 28, 2012

मनतारा


चिड़ियों  की  चीं-चीं , चन-चन
भ्रमरों  का  है  गुन-गुन , गुंजन
कलियों की  चट-चट , चटकन
मानो  मंजरित हुआ  कण-कण

न  शीत की  वह प्रबल कठोरता
न ही  ग्रीष्म की है  उग्र उष्णता
मद्धम- मद्धम   पवन  है  पगता
मधुर- मधुर  है मलय महकता

मधुऋतु का  फैला है सम्मोहन
मंगल- मँजीरा  बाजे  झन-झन
ताल पर  थिरके  बदरा सा तन
मन-मयूर संग नाचे  छम-छम

प्रकृति  से  मुखरित  हुआ गीत
मदिर- मादक  बिखरा   संगीत
अँगराई  लिए  कह  रही है  प्रीत
स्वर साधो , मनतारा  छेड़े मीत .

Tuesday, January 24, 2012

जानती हूँ...


बन कर मेरी छाया तुमने
अनुराग से दुलराना चाहा
पर उलझा सा बाबरा मन
तुम्हें कहाँ समझ पाया...
भूल मेरी ही है जो
अपना इक जाल बनाया है
तुम्हीं से खिले फूल को
तुमसे ही छुपाया है.....
चाहती तो हूँ कि प्रिय !
तुम्हारे अन्त:करण की तेज़ से
अपनी ही प्रतिमा उकेर लूँ
गहरी धुंध के इस बाँध को
झटके में बिखेर दूँ ....
साहस जगे तो स्वीकार करूँ
और तेरी धारा में बह चलूँ ...
हाँ ! तुमने तो
भरना चाहा झोली मेरी
पर रह गयी मैं कोरी की कोरी
कैसा भराव हुआ है... प्रिय !
खाली-खाली रह गया है कहीं..
स्तब्ध ह्रदय में जब झाँका है
तब निज दुर्बलता को आँका है..
उजियारे में नैन मूंदकर
कौतुक भरा बाल-क्षण जीकर
रह-रह कर आँख डबडबाया है
जानती हूँ...
अनमोल सा इस जीवन में
कैसे अपना मोल घटाया है .


Friday, January 20, 2012

फरमा

एक ही फरमा में
भली-भांति कसकर
कितनी कुशलता से
सभी सम्पादित करते हैं
दैनंदिन दैनिक-चर्या
सेंटीमीटर , इंच से
नाप - नाप कर..
कांटा - बटखरा से
तौल - तौल कर..
रात को शुभरात्रि
कहने से पहले ही
करते हैं हिसाब-किताब
नफ़ा - नुकसान का
वही चित्रगुप्त वाला
बही-खाता पर
वही-वही लेखा-जोखा....
भावी योजना पर विचार
ज़रूरी फेर - बदल
कुछ ठोस उपाय
कुछ तय - तमन्ना
कल को और
बेहतर बनाने का....
आँख लगने के पहले ही
आँख खुलने के बाद के
कार्यक्रम को तय करना...
वाह रे ! माडर्न युगीन
मशीनी मानव
फिर -फिर
खुद को ही
फ़रमान जारी करते रहो
उसी फिक्स फरमा में
फिर से फ़िट होने का .

Tuesday, January 17, 2012

मान


मन की मजबूरियों की
क्या कीमत लगाओगे
या बात-बात पर
नपे-तुले व्यावहारिकता की
चादर ओढाओगे...
ध्रुवों पर कील गाड़कर
आस्था-विश्वास को
बाँध आओगे और
उन्हें जोड़ने के लिए
कच्चा-पक्का पुल बनाओगे
फिर आग्रहों का सहारा लेकर
भारी पाँव को घसीटोगे
तो सारी जुगत भीड़ जायेगी
खुद को बचाते हुए
मुझ तक आने में ही...
जैसे-तैसे आ तो जाओगे
पर सोच लो क्या दोगे
रास्ते का जोखिम भरा ब्योरा
या जुगत का दांव-पेंच
या फिर उसी चादर की
देने लगोगे दुहाई पर दुहाई..
जबकि मैं उसी ध्रुव पर
हर चादर उताड़े खड़ी हूँ
हर कीमत या जुगत को
आग्रहों के अलाव में झोंक कर
बस थोड़ी सी गर्मी के लिए...
जो थोड़ी सी गर्मी
तुम्हारी गर्म साँसों की
और तुम्हारी नर्म बाहों की मिले
तो सदियों तक यूँ ही
यहीं खड़ी रहूँगी
क्योंकि मैंने
मान दिया है
मन की मजबूरियों को
और जान लिया है तुम्हें .

Saturday, January 14, 2012

हैया-हो ...


हर तूफान  से जीत जाना है
हैया-हो  ,  हैया-हो  गाना  है

नहीं गिरने में  क्या  सौरभ
गिर कर  उठने  में है गौरव
जितना  आये  बाधा  रौरव
ललकारे हैया-हो का आरव

विकराल  सा भँवर  का  डर
घेरता   रहे  कहीं  से आकर
जीतना  है  उन से  लड़ कर
हैया-हो  , हैया-हो   गा  कर

लहरों में  बस उतर  आना है
तूफानों के  बीच में  जाना है
सदा  पतवार  को चलाना है
हैया-हो ,  हैया-हो   गाना  है

किनारे पर  है सूखा सौन्दर्य
निर्जीव शांति,निष्क्रिय धैर्य
लहरों से  खेलने  में  है शौर्य
तब  हैया-हो  देता है  ऐश्वर्य

जिसे लहरों में उतरना  आता
उस साहस से सब  है  थर्राता
लहरों  के पार  वही  है  जाता
और झूम के हैया-हो है गाता

हर तूफान  से  जीत जाना है
हैया-हो ,  हैया-हो   गाना   है .



रौरव - भयंकर
आरव - तीव्र ध्वनि



Tuesday, January 10, 2012

नकेल


अतृप्त अतीत ने
परिचय बताने से
क्या इनकार किया
कि भारग्रस्त भविष्य भी
पाला बदल कर हो लिया
अतीत के साथ ...
पहले रंग के पहले का
व सातवें रंग के बाद के रंग को
मिल गया सुनहरा मौका
चाँदी काटने का और
चहक कर भर लिया है
अपने अँधेरे आलिंगन में
इस आज को...
स्पर्श इन्द्रियाँ फड़फड़ा रही है
अपने ही दीवारों के अन्दर..
वीरानी पलकों में ही
सपनों के दर्प टूट रहे हैं..
यादों के हिमखंड भी
हिमरेखा पर पिघल रहे हैं...
सांसों के गाँव में
मरघट सा सन्नाटा है..
संबंधों-अनुबंधों के बीच
स्मृति-धागा टूट सा गया है..
भरे बाज़ार ने खोटे सिक्के को
संदेह की नजरों में घेर लिया है..
जिसे देखकर
उदासी की छाँव भी चुपचाप
अपने में सिमट गयी है..
उफ्फ़ ! मुश्किल हो रहा है
व्यर्थता के बोध को संभालना..
अब क्या करना चाहिए...?
चलो समेटा जाए
सुन्दर भ्रांतियों के सूक्ष्म संवेगों को...
बस मिल तो जाए
ये खोया हुआ ' आज '
तो अतीत-भविष्य को
धोबी-पाट लगा ही देना है
उनका नकेल कसकर
अपने हाथ में करके उन्हें
बस अपने हिसाब से चलाना है .


Saturday, January 7, 2012

तरंगों में...


मेरे आशा के अनुरूप
सुलझाया तुमने
आपस में उलझे
मेरे अव्यक्त विचारों को
न चाह कर भी
उलझ रहे हैं उन्हीं में
मेरे अहसास...
अब न जाने क्यूँ
मौन होकर तुम
सुलझाना चाहते हो मुझे
जबकि उसे भरते-भरते
और भी मैं
उलझ ही रही हूँ...
अभिव्यक्ति दो तो
परिणति चाहता
वो परितप्त विचार
मुक्त हो सके
उन्मुक्त गगन में...
मौन तो होना ही है
चाहे सो जाए
चाँद की गोद में
या छू ले
उस दहकते सूरज को...
पर प्रिय !
रोक सकते हो तो रोक लो
उन तरंगो को
जो तुमसे निकल कर
आती है मुझतक...
तुम मुझे
अपने तरंगो में
इसतरह उलझा कर
कितना सुलझाओगे
या मुझसे भी
निकलती तरंगो में
तुम भी
मेरी तरह ही
उलझ जाओगे..?

Tuesday, January 3, 2012

कर्फ्यु


मेरे मन के
शांत संसार में
कुछ असामाजिक
विचारों ने अनायास
कर दिया है
बम - धमाका
पुनर्शान्ति के लिए
लगा दिया है
मैंने भी कर्फ्यु..
पर कविता तो
छूट गयी है
उन्हीं विचारों के
अभेद्य दुर्ग में..
न जाने कैसे
लुट-पीट रही होगी
और उसे
बचाने के लिए
रोक रही हूँ
मैं भी कलम .