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Tuesday, November 29, 2011

आहों में ..


चलते-चलते थक जाती
पाती  न   पंथ की सीमा
अवरोधों से डिगता धैर्य
फिर भी  न  होता धीमा

प्यासी  आँखे  बहती  है
बूंद-बूंद   में हुआ जीना
चिर अतृप्त  सा जीवन
अंजुरी  भर  चाहूँ  पीना

न मिले  तृप्ति  कणभर
सागर और भी तरसाया
इक आकाश  की चाह ने
मुझको  है बस भरमाया

अंतरदृग  में  वही  छवि
हर  इक  पल   रहती  है
जो वह  कह  नहीं  पाया
वो सबकुछ ही कहती है

हाथ  बढ़ा  छू  लूँ  उसको
भींच  लूँ  अपनी बांहों में
पाने में तो  खो दिया उसे
खोकर पा लिया आहों में  .




Friday, November 25, 2011

म्यान

अपनी तरफ से मैंने
कभी कोई पहल नहीं किया
उसने किया भी तो , मैं
अनजान बन गयी
उसी के साथ म्यान में हूँ
अनजाने , अनचीन्हे रिश्ते लिए
और हमेशा बीच में देती रही
अनबन को ज्यादा जगह....
हालाँकि कोई घोषित दुश्मनी
या कोई धर्मयुद्ध है
ऐसा भी नहीं पर हरवक्त
होती रहती है तलवारबाजी...
सम्मानजनित सामंजस्य
सभ्य सुरक्षित वार
घाव भी ऐसे देना कि
प्रतिरक्षण प्रणाली
आप ही कर ले दुरुस्त....
कोई शर्त या बाध्यता नहीं
रण में डटे रहने की
संवेदनशील भावहीनता
भाषा जनित संवादहीनता
संकेतो या तरंगों के बीच भी
अनजाना अर्थहीनता ....
बस पुतलियाँ बड़ी-बड़ी कर
एक-दूसरे को घूरना
उबन कम करने के लिए
उबासियाँ ले ले कर
थपकियाँ दे दे कर
एक-दूसरे को जगाते रहना...
या फिर मुँह फेरकर
अनजाने रिश्ते में
थोड़ी और खटास घोलना ...
मुझपर हावी है वो और
भारी भी पर , मैं भी
कुछ कम तो नहीं..
ये म्यान मेरा है
उसकी अपनी मजबूरियां है
तो फिर वायदा - कायदा को
तोड़-ताड़ करने में
कुछ जाता भी नहीं है
ज्यादा चिढेगा वो , भागेगा
और इस खोखले म्यान को तो
खाक होना ही है
फिर बांचने वाले बांचते रहेंगे
खोखले म्यान की
खोखली महिमा .
 

Tuesday, November 22, 2011

द्वार तुम्हारा खुला नहीं...


इक  झलक  तेरी  जो  मिली
चली  आई  तेरे  द्वार   तक
बड़ी  देर से साँकल बजा रही
प्राणों से  भी  खूब  थपकाया
पर द्वार तुम्हारा खुला नहीं

जोर - जोर से  तुम्हें  पुकारा
रुंधा गला तो विवश  निहारा
तुमने कैसे  मुझे  सुना  नहीं
या अनसुना कर अस्वीकारा
पर द्वार तुम्हारा खुला नहीं

व्यथा - पुष्पों  से  सजा कर
वेदना का  वंदनवार बनाया
साँसों  की   वेद - ध्वनि   से  
आर्तनाद  कर  तुम्हें बुलाया
पर द्वार तुम्हारा खुला नहीं

आँसुओं का  अर्घ  चढ़ा  कर
नैनों का अखंड दीप जलाया
भावों का  ह्रदय - थाल लिए
विरव समर्पण कर मनुहारा
पर द्वार तुम्हारा खुला नहीं

मैं  अलबेली   हार   न  मानूं
द्वार पड़ी  बस  तुझे  पुकारूं
इक  झलक  पाने   के   लिए
अब तो अपना मान भी वारा
पर द्वार तुम्हारा खुला नहीं

मैं  विरहिणी  आस  न  छोडूं
कर तो  रही  हूँ  सारा  जतन
रूठे  हो   क्यूँ   मेरे   प्रियतम
क्यूँ  तुमने  है  मुझे  नाकारा
पर द्वार तुम्हारा खुला नहीं .

Saturday, November 19, 2011

सर्द राते हैं


कंपकंपाते अधरों पर , तुमसे कहने को
कितनी  ही  बातें  हैं ,    सर्द   राते    हैं

बादल के गीतों पर ,चाँदनी थिरकती है
ओस की बूंदे , जलतरंग  सी  बजती  हैं
हवाओं की थाप से तारे झिलमिलाते हैं
कितनी   ही  बातें  हैं ,    सर्द   राते    हैं

धीरे से कोहरा अपनी चादर फैलाता  है
थरथराते वृक्ष-समूहों को  ढक जाता  है
पत्ते की ओट लिए फूल सिमट जाते हैं
कितनी  ही   बातें   हैं ,   सर्द   राते    हैं

हिलडुल कर झुरमुट कुछ में बतियाते हैं
दूबों को झुकके बसंती कहानी सुनाते  हैं
जल-बुझ कर जुगनू  कहकहा लगाते  हैं
कितनी   ही   बातें   हैं ,   सर्द   राते    हैं

थपेड़ों को थपकी में,नींद उचट जाती है
बिलों में सोई ,  जोड़ियाँ कसमसाती  हैं
नीड़ों में दुबके , पंछी  भी  जग जाते  हैं
कितनी   ही  बातें  हैं ,   सर्द    राते    हैं

ठिठुरी सी नदियाँ ,सागर में समाती  हैं
लहरों के मेले  में ,   ऐसे   खो जाती  हैं
उठता है ज्वार  और  गिरते  प्रपातें   हैं
कितनी   ही   बातें   हैं  ,   सर्द  राते   हैं

कोई नर्म  बाहों का  , घेरा  बनाता   है
गर्म पाशों में,  सर्द और उतर आता  है
घबराते, सकुचाते ,  नैन झुक जाते  हैं
कितनी  ही  बातें  हैं ,    सर्द   राते   हैं

तुमसे  कहने को  ,   जो  भी  बातें    हैं
इन अधरों  से ही ,क्यों लिपट जाते   हैं .
           
 



   

Tuesday, November 15, 2011

उसे जगाओ !

जरा देखो  तो !    ये   अचरज
कहीं ठहरा तो  नहीं है   सूरज
 
मौन  अँधियारे के  उस  छोर पर
सुन्दर  सी  सुबह  लाने  के लिए
अहर्निश,अहैतुक,अक्षय उर्जा को
अहो ! तुममें भर  जाने के  लिए
 
सपनों की   गहरी   सी   नींद में
द्वार - दरवाजे  सब  बंद  किये
और  करवट बदल - बदल  कर
सोया  है  कौन ,   उसे   जगाओ
 
कल्पनाओं  की  छद्म  नगरी  में
चुम्बकीय   मायावी  महल  को
हीरे - जवाहरातों   से  जड़ने  में
खोया है  कौन  ,  उसे  जगाओ
 
बंदी  बन    बाँगुर   में   फँसकर
बुद्धि पर चढ़ाए  मोटा  प्लस्तर
आँखों  में  स्वयं  कील  गड़ाकर
रोया  है  कौन ,    उसे   जगाओ
 
देखो असंख्य फूल खिल रहे है
अनगिनत  खग   चहक  रहे हैं
निज को  दुःख की लड़ियों  में
पिरोया है  कौन,  उसे  जगाओ
 
अब तो जागो  !  जाग भी जाओ
आसमानी मन पर सूरज उगाओ
 
परोक्ष   मार्ग  से   आती  पुकार
ये जीवन  है   अनमोल  उपहार
कण - कण का  ऋण  चुकाकर
कर लो  अपनी  जय - जयकार.

Friday, November 11, 2011

दुर्निवार दर्द

एक तो भीषण मानवता का वीभत्स सत्य
और विचलित करने वाला दुर्निवार दर्द
जिसका विशेषीकरण करने के क्रम में
संभ्रमित संवेदनाओं का पुट तो ठीक है
पर लगाए गये जोरदार छौंक से
जो उठता है दमघोंटू धुँआ
घुस जाता है नथुनों से फेफड़ों में
मरोड़ने लगता है पूरा कलेजा
उलझ जाती है अतड़ियाँ और भी
आने लगती है उबकाई पर उबकाई
नसों में दौड़ता विद्रोही ख़ून भी
रुकने लगता है जहाँ - तहाँ
तापक्रम के अति चरम पर
खलबलाने लगता है खूब
अपनी ही नदियाँ बहाने के लिए 
उताड़ू रहता है बात बात पर
कितना भी समझाया- बुझाया जाए
उल्टा करने लगता है शास्त्रार्थ
अपने सवालों के बवंडर में
कोमल भावनाओं को फँसा कर
तिरोहित कर देता है
इन्द्रधनुषी तृष्णा व तृप्ति को
सहज , सुन्दर आकर्षण को
जीवन के सारे तारतम्य को
जो आकाश-कुसुम सा खिला रहता है
जिलाए रखता है हमें और हम
उसी को ताकते - ताकते
कृत्रिम सुगंधों से ही सही
भरते रहते हैं प्राण - वायु
अपने अस्तित्व के तुरही में...
दर्द और संवेदना जरुरी है
खुशियों का मोल समझने के लिए
पर अति क्यूँ इति सा लगता है ..
सभी इन्द्रियों से तुरही को सुनने पर    
संवेदना का स्वर तो निकलता ही है
साथ ही खुशियों-आशाओं का
ऐसा मधुर गीत भी निकलता है कि
दुर्निवार दर्द बन जाता है
भरपूर जीने की प्रेरणा और शक्ति .

Saturday, November 5, 2011

बातें हैं ...

बातें हैं , बातों का क्या
हवा सी डोलती - फिरती
आड़ी - तिरछी दिशाओं में
उल्टा - सीधा कोण बनाती हुई
ज्यामितीय परिभाषाओं को
तोड़ती-मरोड़ती, बनाती-बिगाड़ती
छूना चाहूँ तो अपने ही केंद्र में
चुपचाप सी दुबकती बातें
पकड़ना चाहूँ तो परिधि पर
घुमती- घामती , नाचती- भागती
मुझे ही लट्टू बनाती बातें
बलात कोई चक्रवात
खींच ले मुझे अपने पाताल में
और उसके परतों का करना पड़े
अध्ययन दर अध्ययन .. ओह !
बातें हैं , बातों का क्या
बादलों की तरह
सर्द होऊं कि बरस जाती है
इतना कि डूबती-उतराती रहूँ और
बनाती रहूँ डोंगी ,नैया ,जहाज
या फिर उसे उलीचती रहूँ
डूबी रहती हूँ पूरी तरह
बातें हैं , बातों का क्या
अटक कर , कुरेदती हुई
बना देती है रिसता घाव
उसे छलनी में डालूँ भी तो
छलनी सी हो जाती है
बात पर जो आऊँ तो
उड़ा देती है अपनी बातों में
बिखरी पड़ी है बरकती बातें
ये भोथरी- बरछी सी बातें
खुलती- गाँठ सी बंध जाती बातें
बातें हैं , बातों का क्या
कितना भी पलट दूँ
फिर भी निकलती हैं बातें .