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Monday, January 31, 2011

विजिगीषा

घनघोर बियाबान
घुप्प अँधेरा
घातक जीव-जन्तु
घड़ी-घड़ी घुटन से  
घिघियाती हुई........  
मैं -एक ठूँठ
अपने आखिरी पत्ते को 
कसकर......पकड़ी हुई
पास पड़े एक
पत्थर को देखकर 
मन-ही-मन
सोचती हुई कि--
कभी तो
किसी के पैर से छूकर
शापमुक्ति संभव है ....
पर मुझे तो
अपने उसी आखिरी
पत्ते के सहारे ही
वसंत की राह देखनी है
ताकि मैं फिर से
हरी -भरी हो सकूँ
उस बियाबान में भी
जिजीविषा से भरी हुई
विजिगीषा का
सन्देश देते हुए .........
 
जिजीविषा -अदम्य जीने की इक्क्षा
 विजिगीषा -विजय पाने की इक्क्षा.

Sunday, January 16, 2011

दावा

जितनी रहस्यमयी है
घर से बाहर की दुनिया
उससे कहीं ज्यादा
रहस्यमय है -ये घर
ऐसा भूलभुलैया
जिसका सबकुछ
कहीं खो गया है...
इसके नक़्शे में तो
सात सौ खिड़की और
नौ सौ दरवाजों का जिक्र है....
मानो समय
पृथ्वी के गर्भ में
छोड़ गया हो
साँस के साथ जनमती आशा 
उसी के साथ मरती भी ....
देह की झुर्रियां गवाही देती
और भी रहस्यमयी ...
घर का कोना -कोना
एक अनसुलझी पहेली
जिसे सुलझाते-सुलझाते ...
उलझती मैं........
वो सुई भी खोई है
इसी घर में
जिससे मैं कभी
सिया करती थी
समय के टुकड़ों को...
अधूरी पड़ी मेरी चादर
थोड़ी ढकी मैं
थोड़ी उघडी...
घर की तरह ही -
रहस्यमयी.......
दावा करती हुई 
कि--------मैं हूँ .

Saturday, January 1, 2011

निजूठा

 निबद्ध पूर्वाग्रहों को
निभृत पूर्वानुमानों को
निःसत्व पूर्व दृष्टियों को
निध्यात पूर्वोपायों को
निधेय पूर्वोक्तियों को
क्यों न हम प्रिय 
पूर्णतः निग्रह करें....
नवागत पलों का
साद्धंत सम्मान करें..
सानंद समालिंगन करें.....
आओ प्रिय !
पुनः नव जाग्रत हो
निजूठे क्षणों का अवकलन करें
निजूठे स्वप्नों का सृजन करें
निजूठे कल्पनाओं का आयोजन करें....
हाँ प्रिय !
प्रति नव क्षण में
क्यों न हम
निजूठे आत्मानंद का संग्रहण करें ?

निजूठा-जो पहले न सोचा गया हो
निबद्ध -बंधा हुआ ...,निभृत -निश्चित ....,निःसत्व -सारहीन ....., निध्यात -विचारित ...,निधेय -स्थापित किये जाने योग्य ..., निग्रह -रोकना ...,साद्धंत -सम्पूर्ण ...,
आशा है कि आप सबों को असुविधा नहीं होगी . मैं अपने प्रिय संग हर  आने वाले पल का स्वागत कुछ इस तरह ही करना चाहती हूँ .आप सबों को भी हार्दिक शुभकामनाये .... कि हर पल मंगलमय हो और कुछ नया हो ...........  जिसे आप आनंद से स्वीकार करें.