Pages

Friday, June 3, 2011

अंगूठा

मेरे बारे में
बहुत कुछ पता रहता है
दूसरों को ......
जो अति गुप्त होता है या
अतिरेक का शिकार होता है...
और मैं
सशंकित रहती हूँ हमेशा
अपने ही बारे में....
न जाने किस
बेतार के तार से
जुड़ें हैं सभी.......
बिंदास होकर
कह देते हैं मुझे ही
मेरे बारे में......
जो दिखता है वो भी
जो नहीं दिखता है,वो भी
और मुझे
चुप होना पड़ता है.....
सोच की मरियल घोड़ी को
थोडा इधर,थोडा उधर
दौड़ना पड़ता है....
वाकई!
क्या वे सही है
जो अपनी राय से
तय करते हैं मुझे.....
फिर मैं ?
मैं क्या करती हूँ
अंगूठा ही तो लगाती हूँ
जो मैं नहीं हूँ
उसपर भी .

50 comments:

  1. नही लगाना चाहिये …………अपनी अहमियत खुद बतानी होगी।

    ReplyDelete
  2. सुन्दर सच्चाई को उकेरती कविता
    अपना भी एक आत्मसम्मान होना चाहिए
    शुभ कामनाएँ !

    ReplyDelete
  3. तो कोई द्रोणाचार्य चाहिए :) :)

    ReplyDelete
  4. एक शाश्वत विवशता को अभिव्यक्त करती रचना....

    परिवर्तन स्वतः नहीं होता , करना पड़ता है .....
    'हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे '

    ReplyDelete
  5. मुख रूपी पायल में सच के घुंघरू पिरोते रहो ,दुनिया की तो आदत ही हे छेड़-छाड़ करने की बस आपनी धन्नो के लगाम पकड़ो और आपना तांगा जोतते रहो ......

    ReplyDelete
  6. मुख रूपी पायल में सच के घुंघरू पिरोते रहो ,दुनिया की तो आदत ही हे छेड़-छाड़ करने की बस आपनी धन्नो के लगाम पकड़ो और आपना तांगा जोतते रहो ......

    ReplyDelete
  7. Amrita,ham sabhi kahin na kahin soch ki mariyal ghori ko idhar udhar daura kar apne aapko angutgha chhaap kahlane layak harkatein kar guzartein hain...sach puchho to ham sabhi apne man ki kahan karte...angutha lagana to ek prakriya hai jo hamari mansikta ko darshata hai...wah vyakti aur vyakti ke beech ek doori paida karta hai jo 'conseince' ka sahara leta hai...intellectualism sirf signature karne se nahi hota...angutha chhap bhi agar yah jaanta ho ki wah kahan aur kyun angutha laga raha to wah sabse buddhiman hai...aur dastkhat karne wale agar bina soche samjhe kagaz kaala kar den to unki buddhimatta shaq ke daayre main aa jayegi...

    Aapne basically apni kavita ke madhyam se un BINDAS logon ki budhhimatta par prashn uthaya jo sab kuch jaan lene ka dawa karte hain...meri soch aapse milti hai aur main bahut khush ho jaata hun jab aapko padhta hun...han aapki kavita ko samjhne ke liye baar baar aana hoga mujhe aapke site par...kyunki jitni baar apki kavitayern padhta hun ,utne rang mujhe sarabor kar jate hain. Aap bahut prabhavi batein saralta se kah jaati aur ham us kavya ki darshnik taralta mein bheeng kar khud ko anandit paate hain...

    Han, aapne pucha fir se ki main kaise likh leta hun...??jawab dene ka mere pas ek matra madhyam yahi hai...kya kahun...man ki baatein bas kalam ko madhyam bana ugal deta hun kagaz ke pannon par bina tarashe huye...meri bhavnaayen angadhi hi mujhe achhi lagti hain...main likhta hun kyunki likhna apne dard se nizat paane ka ekmatra creative raasta ya upaay hai...
    ...par ek satya ye bhi hai ki jab main aur logon ki kavitayen ya aapki kavita padhta hun to apne aapko bilkun kamzor aur aksham kavi manta hun...main likhta hun , par samwad sthapit karne mein shayad utha safal nahi hota...fir bhi aapki sarahna mere liye beej mantra hai...

    ReplyDelete
  8. सुंदर पोस्ट सच्चाई से कही गयी दिल की बात..

    ReplyDelete
  9. बहुत ही बढ़िया !
    मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है : Blind Devotion - अज्ञान

    ReplyDelete
  10. एक कटु सत्य को बहुत ही गंभीरता से उकेरा है...पर क्यों हम भूल जायें अपने अस्तित्व को और सीमित करदें अपना अस्तित्व दूसरों के कहे पर अंगूठा लगाने तक? बहुत सारगर्भित प्रश्न उठाती सुन्दर रचना...

    ReplyDelete
  11. angutha lagana kyun ... apne pe bharosa hi zaruri hai

    ReplyDelete
  12. जोरदार -जीना है तो दुनिया को प्यार कर प्यारे ...
    हाथ जोड़ सबको सलाम कर प्यारे ....

    ReplyDelete
  13. अपने प्रति दूसरों की प्रतिक्रिया और व्यवहार को लेकर हम कभी उलझन में पड़ सकते हैं लेकिन दूसरों की बात पर भोलेपन में कभी अंगूठा लगा भी सकते हैं, लेकिन सजग रह कर.

    ReplyDelete
  14. आत्म विश्वास की कमी को ख़ूबसूरती से बयां किया है आपने.
    दूसरे हमारे बारे में क्या सोचते हैं.क्या कहते हैं,अगर हम यही सोचते रहे तो हम भी उनके जैसे हो जायेंगे,अंगूठा छाप हो जायेंगे.
    आभार इस अभिव्यक्ति के लिए.

    ReplyDelete
  15. दुनिया को अंगूठा दिखाने की जरुरत है ,,

    ReplyDelete
  16. अमृताजी

    भावनात्मक द्वंद्व उभरा है आपकी रचना में …
    अपना पक्ष प्रस्तुत करने जितना साहस तो होना ही चाहिए ।

    अच्छी कविता !
    शुभकामनाएं…

    ReplyDelete
  17. कृपया ,
    शस्वरं
    पर आप सब अवश्य visit करें … और मेरे ब्लॉग के लिए दुआ भी … :)

    शस्वरं कल दोपहर बाद से गायब था …
    अभी सवेरे पुनः नज़र आने लगा है ।
    कोई इस समस्या का उपाय बता सकें तो आभारी रहूंगा ।

    ReplyDelete
  18. सुंदर और सच्ची कविता.. पर.. कोई कहे, कहता रहे, हमको जमाने से क्या ? हम तो जो हैं सो हैं....

    ReplyDelete
  19. आपकी रचनाओं का क्या कहना। विषय पर शालीनता से चोट कहें या शब्दों का बेहतर इस्तेमाल। सच में मन को छू लेने वाली रचना है।

    ReplyDelete
  20. दिग्भ्रमित लोग दिग्भ्रमित ही करते हैं. अंगूठा लगाकर प्रोत्साहन क्यों?
    बेहतरीन अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  21. यथार्थ की सुंदर अभिव्यक्ति।
    शुभकामनाएं।

    ReplyDelete
  22. बहुत ही अच्‍छा लिखती हैं आप ... बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

    ReplyDelete
  23. इतने सहज शब्‍दों में बहुत ही गहरी बात कही है आपने ।

    ReplyDelete
  24. .
    .
    .
    अंगूठा ही तो लगाती हूँ
    जो मैं नहीं हूँ
    उस पर भी...

    पर क्यों, यह स्थिति बदलनी होगी, हम सबको ही...

    अच्छा लिखती हैं आप...


    आभार!




    ...

    ReplyDelete
  25. इस भाव को मै ऐसे कहूगी कि
    मुझे मुझ से ही मिलवाने चली है दुनिया
    मै हूँ क्या...ये बताने चली है ये
    दुनिया

    आपकी कविता दिल को छू गई

    ReplyDelete
  26. अच्छी भावाभिव्यक्ति...

    ReplyDelete
  27. खुबसुरत रचना। बधाई के पात्र है।

    ReplyDelete
  28. अमृता जी, आपकी कविताओं में एक ताजगी, एक बेबक्पाब नज़र अत है और परिपक्वता भी जो ब्लॉग जगत में कम मिलता है ... इतनी सुन्दर रचना के लिए आभार !

    ReplyDelete
  29. अगूंठा ही तो लगाती हूँ ,
    जो मैं नहीं हूँ ,
    उस पर भी ।
    यही तो इस शती की विवशता है -
    पूरी मानवता हो गई है नपुंसक कई सौ सालों से देख रही है बलात -कार ।
    पैनी धार दार रचना !अपने समय को तौलती बोधती!

    ReplyDelete
  30. कटु सत्य सरलता से बयान किया है आपने कविता के माध्यम से. बधाई.

    ReplyDelete
  31. अगूंठा ही तो लगाती हूँ ,
    जो मैं नहीं हूँ ,
    उस पर भी ।


    बहुत ही बढ़िया कविता,
    आभार विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

    ReplyDelete
  32. for the sake of near one's happiness we accept their view. but we know our real self. it is difficult to convey the real view about our self to others but it is more difficult to be understood in same sense. progressive acceptance is the part of that poem.

    ReplyDelete
  33. amrita ji personality development wale approach se ubarne me logon ko abhi bahut samay lag jayega. waise bhi hamara jivan ek talash ki manind hai, jo kisi khanchen me fit baithne ke liye nahin bana hai. light mood me jine wale logon ko ham kitna bhi samjha len wo usse ubarne wale nahin hain. isliye behtar yahi hoga ki aap apni gajah sahin hai iska matlab yah nahin ki hum galat sabit ho jate hain. jisne apne jivan me sab kuch tay kar liya ho , aise khanche me jine wale logon ko bhi unke sandarbh me samjhna chahiye.

    ReplyDelete
  34. बात कहने की सहजता आपकी कविता में विशेष गुण पाया मैंने.

    ReplyDelete
  35. यही तो ........हम हर बात के लिए दूसरे पर निर्भर क्यों हो जाते हैं?
    स्वयं को जान लेने से दूसरों की मोहताजी नहीं रह जाती है......दुःख और सुख हमारा सब दूसरे से जुड़ा है इससे मुक्त होना ही पढ़ेगा.......पोस्ट दिल की गहराई से निकली है और कहीं न कहीं चोट अवश्य करती होगी :-)

    ReplyDelete
  36. अत्यंत भावुक...सुन्दर रचना...

    ReplyDelete
  37. किसी के आदर्शों पर चलने को हमेशा कहा जाता है पर खुद की अलग पहचान बनाना भी उतना ही आवश्यक है अन्यथा हम किसी और कि परछाई में गुम हो जाएँगे..

    ReplyDelete
  38. आप एक समर्थ सर्जक हैं।

    ReplyDelete
  39. आपका स्वागत है "नयी पुरानी हलचल" पर...यहाँ आपके ब्लॉग की किसी पोस्ट की कल होगी हलचल...

    नयी-पुरानी हलचल

    धन्यवाद!

    ReplyDelete
  40. is visham paristhiti se sabko gujarna hota hai... kyonki log khud se adhik doosron per shodh kerte hain

    ReplyDelete
  41. लोगों को अपने से ज्यादा दूसरों क बारे में मालूम होता है...ये सच है...पर क्या हम भी खुद को वही मान लें जो वे सोच रहे हैं...कतई नहीं...

    ReplyDelete
  42. Apki kavitayen achi lagti hai mam. . .
    Jai hind jai bharat

    ReplyDelete
  43. आपके सुंदर अभिव्यक्ति के लिए बधाई
    आपको एक रचना समर्पित

    ReplyDelete