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Thursday, April 8, 2010

कोई फर्क नहीं पड़ता

कोई फर्क नहीं पड़ता
कि हम कहाँ हैं
हो सकता है हम
आँकड़े इक्कठा करने वाले
तथाकथित मापदंड पर
ठोक-पीट कर
निष्कर्ष जारी करने वाले
बुद्धिजीवियों के
सरसरी नज़रों से होकर
गुजर सकते हैं
हो सकता है कुछ क्षण के लिए
उनकी संवेदना  तीक्ष्ण जो जाये
ये भी हो सकता है कि
उससे संबंधित कुछ नए विचार
कौंध उठे उनके दिमाग में
समाधान या उसके समतुल्य
ये भी हो सकता है कि
बहुतों का कलम उठ जाये
पक्ष -विपक्ष में लिखने को
अपनी कीमती राय
कर्ण की भांति दान देते हुए
पर जिसका चक्रव्यूह
उसमें फंसा अभिमन्यु वो ही
महारथियों से घिरा
अपना अस्तित्व बचाने को
पल प्रतिपल संघर्षरत
आखिरी साँस टूटते हुए उसे
दिख जाता है
विजय कलयुग का .

मुझे पता है

बेहद सर्द रातें

बर्फीली हवाएं

घने कोहरे को ओढ़े

गहरे पानी में

निर्वस्त्र खरी मैं

छ : महीने की भी

जो होतीं रातें तो

अगले छ : महीने तक

रहता मेरा सूरज

न जाने किस ग्रह पर

बसेरा है मेरा

जहाँ सदियों से केवल

रातें ही हैं

रातें और गहरी रातें

और मैं जिन्दा भी हूँ

मेरे सूरज तुम्हे मैं

उगाये रहती हूँ हरसमय

अपने ह्रदय में

मुझे पता है

तेरी उष्णता मेरे खून को

कभी बर्फ बनने नहीं देगी .





Wednesday, April 7, 2010

तुमने कहा

तुमने कहा -


जिस आवृति से


विभिन्न तरंगढ़ैर्ध पर


उठता गिरता है


तुम्हारा विचार


जिससे आवेशित होती हो


कम्पित होती हो


यथावत ईमानदारी से


रख दो उन विचारों को


कविता का सृजन होगा


पर क्यूँ दिखता है


सबकुछ धुंधला धुंधला


मेरे विचार ओढ़े हैं


मेरी करवाहट को


या मेरी आँखों पर


है काली पट्टी


या आईना पर


चढ़ गया है कल दोतरफा


कैसे दिखेगी कविता


अपनी प्राकृतिक सुन्दरता में

निश्छल निष्कलंक .