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Thursday, December 2, 2010

इतर

कोई परिग्रह नहीं
परिग्रह तो दूर की बात
कोई आग्रह भी नहीं ...
कोई प्रतिबंध नहीं
प्रतिबंध तो दूर की बात
कोई अनुबंध भी नहीं ...
कोई विकांक्षा नहीं
विकांक्षा तो दूर की बात
कोई आकांक्षा भी नहीं ...
कोई परिवर्जन नहीं
परिवर्जन तो दूर की बात
कोई आवर्जन भी नहीं ...
कोई विक्षोभ नहीं
विक्षोभ तो दूर की बात
कोई क्षोभ भी नहीं ...
कोई प्रतिलंभ नहीं
प्रतिलंभ तो दूर की बात
कोई उपालंभ भी नहीं ...
कोई परिसंवाद नहीं
परिसंवाद तो दूर की बात
कोई संवाद भी नहीं ....
प्रिय! इन सबसे इतर यदि
हम एक-दूसरे में
प्रतिपल प्रमत्त हों ...
हमारा रोम-रोम
प्रतिक्षण प्रस्फुटित हो...
और हमारी तरंगें
प्रतिसम प्रसक्त हों ...
तो निःस्संदेह
प्रेम ही है ...

27 comments:

  1. वाह, कितने विशुद्ध प्रेम की चाह की है आपने, परम से ही हो सकता है ऐसा प्रेम जहाँ कोई आकांक्षा नहीं, कुछ शब्द कठिन हैं मगर प्रेम की यह डगर भी तो कठिन है ... आपको ढेरों शुभकामनायें!

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  2. अमृता जी

    निःस्संदेह
    प्रेम ही है ... !

    आपकी कविता पढ़ने के बाद कहना पड़ेगा …

    कोई प्रतिबंध नहीं
    प्रतिबंध तो दूर की बात
    कोई अनुबंध भी नहीं …


    … लेकिन कहना पड़ेगा कि बहुत अलग , मौलिक शैली की रचना है आपकी ।

    "कोई अतिशयोक्ति नहीं
    अतिशयोक्ति तो दूर की बात
    कोई उक्ति भी नहीं"
    … … …
    जिसके सहारे आपकी कविता की यथोचित प्रशंसा कर सकूं … :)


    शुभकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  3. प्रेम की सुंदर परभाषा

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  4. ... bahut sundar .... behatreen rachanaa !!!

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  5. अमृता जी,

    अति सुन्दर हमेशा की तरह ......पर मैं अनपढ़ आदमी..... मैं आज ही आपको अपना हिंदी का अध्यापक नियुक्त करता हूँ......सच बताऊँ तो इसमें बहुत सारे शब्दों का अर्थ मुझे नहीं पता हो सके तो बतायें तो ताकि मैं पूरी तरह से रचना का रस ले सकूं क्योंकि जब तक कुछ समझ न आये तब तक क्या कहूँ हाँ जितना समझ सका वो बहुत बढ़िया लगा -

    परिवर्जन, आवर्जन, प्रतिलंभ, उपालंभ, परिसंवाद, प्रमत्त, प्रसक्त........इन शब्दों का अर्थ नहीं पता

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  6. अमृता जी ,
    बेहतरीन अभिव्यक्ति ..प्रेम को सही अर्थों में समझा दिया है आपने.... उन्मुक्त आकाश की तरह सीमारहित ....बिना किसी संवाद ,आग्रह,अनुबंध ,आकांक्षा ,उपालंभ ,क्षोभ ,के इतर भी अगर स्पंदन महसूस हों ..तो प्रेम है... दिल में सीधे उतर गयी आपकी यह रचना.... आपसे अनुमति लेना चाहूंगी इसे अपने साथियों से बांटने के लिए ..क्या आप यह कविता मुझे मेल कर सकती हैं..आपकी बहुत आभारी रहूंगी...

    मुदिता

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  7. amrita, kavita ka marm to samajh me aaya... magar kuch shabdon ka matlab nahi jaan saka.. rahul

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  8. बहुत शानदार और मोलिक अंदाज में लिखी गयी कविता ...विशुद्ध प्रेम की अनुभूति करवाती है ...
    मरे ब्लॉग पर आने के लिए हार्दिक धन्यवाद ...

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  9. prem ki sundar ki ek alag hi paribhasha hai

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  10. kya kahun.. shabd apne aap me hiu itne poorn hai ki kuch na kaha jaaye to hi is kavita ki sacchi taareeef hai .. prem ke behatreen bhaav liye hue

    badhayi

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  11. Amrita ji,mera nam hi prem sagar singh hai.Is liye aapki bhavnaon ko achhi tarah samajhne mein samarth hun.Ek sher arj kar raha hun. shayad aapko aapne bhav vimbon ka spastikaran mil jaye-
    MUHABBAT KE LIYE KUCHH KHAS DIL MAKHSUS HOTE HAIN,
    YAH WO NAGMA HAI JO HAR SAJ PAR GAYA NAHI JATA.
    MAIN AAPKO SAHARSH AAPNE BLOG PAR AMANTRIT KARATAA HUN.JARUR AIYEGA-INTAJAR RAHEGA.With regards.

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  12. निःसंदेह यह सार्थक अभिव्यक्ति है। आभार।

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  13. अमृता जी
    नमस्कार ....
    "धर्म और दर्शन" ब्लॉग पर टिप्पणी के लिए धन्यवाद ...आपका आभार किस तरह प्रकट करूँ ....व्यस्तताओं के कारण नई पोस्ट नहीं लिख पा रहा हूँ ...परन्तु शीघ्र ही इस ब्लॉग पर भी लेखन नियमित हो जायेगा....बस अपना आशीर्वाद बनाये रखना ....बहुत -बहुत धन्यवाद

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  14. कितना मौलिक है यह लेखन
    नि:सन्देह शब्द सौष्ठव दर्शनीय और भाव अत्यंत मुखर

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  15. मुझे इसमें प्रेम की अध्यात्मिक अभिव्यक्ति लगी नई तरह की सुन्दर प्रस्तुति के साथ

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  16. अमृता जी
    नमस्कार
    आपकी नयी पोस्ट का इन्तजार है ...चलते -चलते पर " एक दिन जिन्दगी " आपके आने का इंतजार कर रही है ...शुक्रिया

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  17. अमृता जी,
    नमस्ते!
    डिफिकल्ट है.
    आशीष
    ---
    नौकरी इज़ नौकरी.

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  18. नि:संदेह,
    यह (कविता) प्रेम ही है !

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  19. bahut hi badiya...

    mere blog par bhi sawagat hai...
    Lyrics Mantra

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  20. सुन्दर शब्दों की बेहतरीन शैली ।
    भावाव्यक्ति का अनूठा अन्दाज ।
    बेहतरीन एवं प्रशंसनीय प्रस्तुति ।
    हिन्दी को ऐसे ही सृजन की उम्मीद ।

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  21. Prem ka isse vishuddh roop aur kya ho sakta hai...jahan shabd chup ho jaayein,jahan dharkanein kabootar ho samwad sunayein...jahan man ek nadi sa bahti jaaye...jahan saansein surbhit ho bikharti jaaye....prem ki anubhooti wahi hai....sachhi....

    Bahut ho saarthak hai prem ki abhivyakti ka yah maun sa mukhrit swar...aapki rachna dharmito ko namaskar..Shabdon ko kuchh iss tarah dhal diya hai aapne kavita mein ki we sawan ki boondon sa man ko tript kar jaate..
    Bahut bahut umda lekhan...

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  22. सुन्दर प्रस्तुति

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  23. आपकी जिन जिन रचनाओं में प्रेम परिभाषित हुआ है- उसने प्रेम की मर्यादा ऊंची कर दी है ... अनकंडीशनल मेटाफिजिकल ..
    बेहतरीन अभिव्यक्ति

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