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Monday, October 25, 2010

पश्चाताप

जीवन की असारता
पश्चाताप
जिसे सुनने के लिए
केवल मैं या
एकांत तथा शांत प्रकृति
आँखों को दिखता
क्रूर नृत्य
प्रलय की लहरों का
जो बाहुपाश में मुझे
जकड़ती जा रही है
और मैं हो रही हूँ
विलीन तथा विनष्ट
स्वयं में ही ........
पश्चाताप में
निमग्न होकर भी
कोई शक्ति मुझे
देती है प्रेरणा
आभ्यंतर प्रेरणा
कर्मशील होने की
मैं पुनः
आसक्त होती हूँ
जीवन के प्रति
मुझमें संचार होता है
आशा का
सुनहरे तीर बरसाती
अलौकिक सुबह
मुझे आलोकित करती है
जिसमें दिखता है प्रेम
मेरा प्रेम
मंद-मंद मुस्कुराता हुआ
दूर होकर भी
बहुत पास बहुत पास
मेरे पैर स्वतः
बढ़ चलते हैं
धीरे -धीरे
धीरे -धीरे
उसकी ओर .... .

4 comments:

  1. bahut door ya bahut nahin abhinna aur samhit fir brahmand me sirf ham aur kuchh bhi nahin

    bir

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  2. prem divya ehsason ki paawan si yatra hai.
    bemishaal hai aapki kavita
    rahul

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  3. 'कोई शक्ति मुझे
    देती है प्रेरणा
    आभ्यंतर प्रेरणा
    कर्मशील होने की
    मैं पुनः
    आसक्त होती हूँ
    जीवन के प्रति'

    बहुत ही सुन्दर!

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