Pages

Thursday, October 28, 2010

अहंता

विद्वेष
वैमनस्य
विवाद
शीतयुद्ध
न संधि न समाप्ति
एक समान योद्धा
मेरी बनायीं हुई दुनिया
एकतरफ ......
और मैं
दूसरी तरफ
क्या मुझे
मरना पड़ेगा
स्वामी - हंता
अहंता से .

11 comments:

  1. सशक्त लेखन की यह निरंतरता मंत्रमुग्ध कर देती है।
    ,,इमरान की पसंद लाजवाब है।

    ReplyDelete
  2. बहुत सुन्दर ..और गंभीर रचना ..

    ReplyDelete
  3. हमारी बनाई दुनिया का क्या तो वजूद और क्या महत्व, मिटने को ही बनती है पर हम तो अमृत संतानें हैं न, अमर हैं !

    ReplyDelete
  4. सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

    ReplyDelete
  5. छोटी लेकिन सुन्दर रचना.

    ReplyDelete
  6. सुन्दर भाव सम्प्रेषण.. सुन्दर रचना

    ReplyDelete
  7. अच्छी रचना , बहुत - बहुत शुभ कामना

    ReplyDelete
  8. जो आग हमने खुद लगाई है उस आग में जाना ही हमारी नियति है...और हमारी शापमुक्ति का मार्ग भी वहीं से प्रशस्त होता है...
    लघु किन्तु विराट अर्थ वाली कविता के लिए साधुवाद।

    ReplyDelete
  9. ओह ...
    बेहद सशक्त ...

    ReplyDelete
  10. संक्षेप में गहन अभिव्यक्ति।

    ReplyDelete