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Thursday, October 28, 2010

स्वीकार

ठहरने को तो
ठहर जाऊं कुछ पल
तुम्हारे पास
पर मैं रुक नहीं सकती
तबतक , जबतक की तुम
रोकना चाहो मुझे
सँवरने को तो
सँवर जाऊं कई -कई बार
तुम्हारे लिए
पर मैं निखर नहीं सकती
वैसे , जैसे की तुम
निखारना चाहो मुझे
प्रिय ! तब आरोपण क्यों
अगर प्रेम है तो
आओ .......
एक -दूसरे को हम
स्वीकार करें
समग्रता से
सहज रूप में .

11 comments:

  1. अमृता जी,

    इस पोस्ट पर सिर्फ इतना कहूँगा..........
    " आस्था प्रमाणों पर आधारित तथ्य नहीं बल्कि अबोध समर्पण का नाम है"

    कितने कम शब्दों में आप कितनी सहजता से सब कुछ कह देती हैं.....शानदार|

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  2. बहुत बढ़िया कविता.......सच कहा है.....

    एक -दूसरे को हम
    स्वीकार करें
    समग्रता से
    सहज रूप में

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  3. यही एक सही मार्ग है।
    ..प्रेरक कविता।

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  4. this is the most amazing poem , i ever read.....

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  5. asal mein prem ek dusre me sahaj ho kar samahit ho jaane ka hi naam hai...sanwarna aur nikharna to vyaktitwa ki bheetari sundarta par nirbhar karta hai....baahri aavran to matra kshanik hai.

    Aap bahut hi acchaa likhti hain aur aapki lekhni aapke bheetari saundarya ka parichayak to hai hi, sath hi aapke acchhe sanskaron ka dyotak bhi.

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  6. बहुत बढ़िया कविता.

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  7. बहुत बढ़िया कविता.

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  8. बिलकुल सटीक परिभाषा प्रेम की।

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