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Wednesday, October 20, 2010

जतन

मुझमें
तेरा अवतरण
तुझमें
मेरा अवशोषण
हाय ! मुझसे
मेरा ही अवहरण
अब मेरी सांसों में
तेरा ही आवागमन
विरह वेदना में
तेरा अवगाहन
और
मिलन - बेला में
देह को लाँघ
तुम्हे छूने का जतन
क्यों इस पूर्णता में भी
है एक अधूरापन
प्रिय ! यही प्रेम है तो
आओ इसी का
हम लें आलंबन .

5 comments:

  1. बस यही कह सकता हूँ........वाह....वाह.......अमर प्रेम यही है...

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  2. nicely written poem...jaise prem ka pura ek jeevan jee liya...thanks archana

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  3. सुन्दर! खुसरो याद आ गए ..
    'तु मंशुदन मं तनशुदि, मं तन शुदन तु जाँशुदी ..'

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