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Saturday, October 16, 2010

खुली मुट्ठी

चुपके से किसी पल को
मुट्ठी में छुपा लेना
हर पल उस पल को
मुट्ठी खोल देखते रहना
समय ! मैंने तुम्हे मात है दिया
दम है तो मेरी खुली मुट्ठी से
छीन लो उस पल को
जिस पल मैंने स्वयं को
समर्पित किया है
अपने प्रियतम को
और मैं कहीं गुम हूँ
अपने प्रियतम में .

9 comments:

  1. अमृता जी,

    समर्पण बहुत सुन्दर शब्द है.......प्रेम का शिखर बिंदु ही समर्पण है.......फिर कोई इच्छा नहीं रह जाती.....बहुत खूब.......

    एक बात कहूँ आप अपनी रचनाओ का संग्रह कर उन्हें प्रकाशित करवाने के बारे में ज़रूर सोचिये|

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  2. very nice....Amrita ji...ek advice deni hai mafi chahti hu...aap setting me jakar word verification hataiye...isse comments easily diye ja sakte hai...thanks Archana

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  3. बहुत पसन्द आया
    हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद
    बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

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  4. बस एक पल ....हाँ जी सब कुछ सिर्फ उस एक पल में ही तो निहित है जी ...आपने इतने कम शब्दों में ही पूर्णता को जीविन्त कर दिया ..

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  5. शब्द सम्मोहन.
    उच्च अवस्था प्रेम की.

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  6. समय से भिड़ता शब्द..

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