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Friday, October 15, 2010

रचना

जब अपना ही मौन
निष्क्रिय कर देता है स्वरतंत्र को
जब अपनी ही सोच
दिखाने लगती है त्रिआयामी चलचित्र
जब अपने ही आँखों में
घूमने लगता है अपना विकृत चेहरा
जब अपनी ही चीख
गूंजने लगती है अपने कानों में
जब अपना ही क्रोध
अंग प्रत्यंग को जलाने लगता है
तब मैं अतिशय कोशिश करती हूँ
सामान्य से सामान्य रहने की
नरम आवरण के अन्दर
बहुत कुछ टूटने लगता है
बार बार होता ये विध्वंस
सृजनात्मक होता तो एक बात होती
पर मेरे विचारों का महल
मलवों में तब्दील होते रहते हैं
मलवे, मलवे ही मलवे
जिसके नीचे दबी मैं
सोच रही हूँ
एक नई सृष्टि की ही
क्यूँ न रचना कर दूँ .

2 comments:

  1. tadpan , chhatpatahat hi karva deti hai kuchh rachna

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  2. नरम आवरण के अन्दर
    बहुत कुछ टूटने लगता है.....
    -----------------------------
    बेबाक ....

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