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Sunday, October 10, 2010

उलझन

कुछ सवाल  सुलझाते हैं
उलझे अभिवृतियों को
हालाँकि इसका कोई
यथोचित जबाव नहीं होता
फिर भी पतली गली के लिए
बहुधा इसे पीसा जाता है
तर्क-वितर्क के सिलवटटे पर
और इसकी संतति बढती जाती है
कुछ जबाव उलझाते हैं
सुलझे अभिकथनों को
जिसके गर्भ में पनपते रहते हैं
कई कई सवाल और उनकी
कर दी जाती है भ्रूणहत्या
मूक वधिरों की जमात
आजीवन अनुगामी बनकर
नैतिकता व मर्यादा की दासता
स्वेच्छा से स्वीकारते हैं
सवाल और जबाव के बीच
उलझी जिंदगी चलती रहती है
जो जितना उलझे होते हैं
वे स्वयं को हिटलर या सिकंदर
घोषित कर लेते हैं
जो सुलझे होते हैं वे
बुद्ध क्राइस्ट की तरह
मुखरित मौन को धारणकर
युगों युगों के लिए
अपने विचारों को छोड़ जाते हैं .

2 comments:

  1. अमृता जी,

    वाह......वाह .......सुन्दर रचना ..........इस रचना में संसार में जो कुछ भी कहा जा सकता है....वो सब बहुत संछिप्त में कह दिया है ........एक बार मैं फिर आपसे पूछता हूँ ........आप ओशो को पढती हैं? .......क्योंकि मुझे आपकी रचनाओ में उनकी झलक दिखती है.......शुभकामनाये |

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  2. बुद्ध क्राइस्ट की तरह.....
    ---------------------------------------
    आपकी तरह भी ....

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