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Wednesday, September 1, 2010

समय जो दिखता तो

समय जो दिखता तो
मैं भी देख पाती समयांतर.....
संभवतः आदम के साथ सेव खाते हुए
या फिर प्रलय प्रवाह में बहती होती
छोटी सी डोंगी में मनु के साथ
एक और सृष्टि सृजन  के लिए......
समय जो दिखता तो
मैं हो जाती समकेंद्रिक
समयनिष्ठ हो करती नाभिकीय विखंडन
सूरज की तरह देती अनवरत उष्मा
समय सारिणी को परे हटाकर
एक सुन्दर जीवन जीते सभी........
समय जो दिखता  तो
मैं बन जाती समदर्शी
देख पाती गेंहूँ गुलाब की उदारता
सभी पेट भरे होते सभी ह्रदय खिले होते
और गलबहियां डाले दोनों गाते
सबों के लिए समानता का गीत .............
समय जो दिखता तो
मैं भी हो जाती समसामयिक
कल की रस्सी पकड़ कल पर कूदने वालों को
खीँच लेती आज में अपनी समस्त उर्जा से
जिससे हो जाता सामूहिक समुदय.........
समय जो दिखता तो
मैं ही समय हो जाती .

6 comments:

  1. कल 21/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  2. कल की रस्सी पकड़ कूदने वालो को
    खींच लेती आज में....
    वाह! सुन्दर लेखन.. सादर बधाई...

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  3. समय जो दिखता तो

    मैं ही समय हो जाती

    बहुत ही बढि़या लिखा है आपने ।

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  4. समय से परे ...जिन्दगी की आहट...

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  5. काश सबकुछ अच्छा होता और समय वहीँ थमा होता ... मगर संभवतः इस आईडीयलिज्म में हम कीमत भूल जाते खुशहाली की, आनंद की ..
    बहरहाल, सुन्दर अभिव्यक्ति.

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