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Thursday, April 8, 2010

मुझे पता है

बेहद सर्द रातें

बर्फीली हवाएं

घने कोहरे को ओढ़े

गहरे पानी में

निर्वस्त्र खरी मैं

छ : महीने की भी

जो होतीं रातें तो

अगले छ : महीने तक

रहता मेरा सूरज

न जाने किस ग्रह पर

बसेरा है मेरा

जहाँ सदियों से केवल

रातें ही हैं

रातें और गहरी रातें

और मैं जिन्दा भी हूँ

मेरे सूरज तुम्हे मैं

उगाये रहती हूँ हरसमय

अपने ह्रदय में

मुझे पता है

तेरी उष्णता मेरे खून को

कभी बर्फ बनने नहीं देगी .





16 comments:

  1. soulful poem.. aapne bahut hi acche bimbo ke dwara apni kavita ko ek naya roop diya hai .. aur prem ko ek nayi bhaavabhivyakti ..

    badhayi

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  2. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.सुन्दर शब्द रचना.
    अंतिम आठ लाईनें बहुत ही खूब हैं.
    प्रेम की नयी परिभाषाएं.

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  3. गहरी अभिव्यक्ति ...

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  4. बेहद उम्दा भावो का समन्वय्।

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  5. बहुत खूबसूरती से कही बात ..सुन्दर रचना

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  6. सुंदर अभिव्यक्ति...

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  7. बेहद खूबसूरती से पिरोई दिल को छू जाने वाली रचना.
    सादर,
    डोरोथी.

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  8. कल 31/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  9. सुन्दर प्रस्तुति ...

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  10. बहुत भावनाओं से भरी मार्मिक अभिब्यक्ति /अनोखे प्रेम में डूबी हुई /बेमिसाल रचना / इतनी शानदार प्रस्तुति के लिए बधाई /


    please visit my blog.
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  11. बहुत खूबसूरती से प्यार की परिभाषा को परिभाषित करती खूबसूरत रचना |

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  12. तुम्हे मैं
    उगाये रहती हूँ हर समय
    अपने ह्रदय में
    ------------------------
    विराट .....

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  13. ये सूरज सभी के ह्रदय में यूँही उष्णता प्रदान करता रहे….
    आमीन!

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